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Sunday, September 27, 2020

मस्ती से भरल रहीला बनारस के लोग, उहवें के किस्सा पढ़े रउओ हो जाइब मस्त!

मस्ती से भरल रहेला बनारस के लोग, उहवां के किस्सा पढ़के रउओ हो जाइब मस्त!
बनारसी संस्कृति अउर जीवनशैली क जीवनी तत्व मस्ती हौ. बनारसी बिना भोजन के रहि सकयलन, लेकिन मस्ती के बिना नाही रहि सकतन. खांटी बनारसी दूसरे जगह एही के नाते असानी से टिक नाही पउतन.

बनारस में आज भले ही धर्म क बोलबाला होय, लेकिन असल में बनारस धर्म के साथ ही देश क संस्कृति अउर विद्या क राजधानी हौ. संस्कृति भी गंगा-जमुनी. मस्ती बनारसी संस्कृति अउर जीवनशैली क जीवनी तत्व हौ. बनारसी बिना भोजन के रहि सकयलन, लेकिन मस्ती के बिना नाही रहि सकतन. खांटी बनारसी दूसरे जगह एही के नाते असानी से टिक नाही पउतन. बनारस में कहावत चलयला -जवन मजा बनारस में, उ न पेरिस न फारस में. आज भी कवनो बनारसी से पूछा कि आखिर बनारस में अइसन कवन खासियत हौ कि शहर से एतनी मोहब्बत हौ त उ इहय बात कही कि दुनिया में तमाम चीज मिलि सकयला, लेकिन बनारस जइसन मस्ती अउर बनारसिन जइसन अपनत्व नाही मिलि सकत.

बनारस में एक पन्नी गुरु क किस्सा सुना. हलांकि बनारस में सब गुरु हौ. यादव, दूबे, चउबे, मिश्रा, गुप्ता, सिंह, पटेल जइसन टाइटल बनारसी कगरी लगाइके रखयलन. गुरु तखल्लुस हिया बनारसी नागरिकता क पहिचान हौ. त पन्नी गुरु एक ठे पाने के दुकानी पर खड़ा रहलन. खड़ा का, घंटा भर से मुंहे में पान घुलइले जनता जनार्दन के बनारसी में ज्ञान देत रहलन. तबय बीचे में एक अर्द्ध बनारसी टपकि पड़ल -का बात कहत हय गुरु, अमेरिका रोज चांद पर आदमी भेजत हौ अउर तू हिया दुइ घंटा से खाली मुंहे में पान घुलावत हउवा. एतनय में टन्नी गुरु क भेजा गरम होइ गयल. पच्च से मुंहे क पान थूकलन अउर ताव में जवाब देहलन -देखा चाहे चंद्रमा होय या सूरज होय, जे सारे के गरज होई उ हिया आई, टन्नी गुरु टस से मस न होइहय. समझ में आयल कि नाही.
अजगर करय न चाकरी पंछी करय न काम,
दास मलूका कह गए सबके दाता राम.
त हर बनारसी एही सिद्धांत क पालन करयला. अउर बहरी अलंग के बहार क मजा लेवय के नाम पर देवतन तक के जीभी से पानी टपकयला. बहरी अलंग उ स्वर्ग हौ, जहां जाए बदे हर बनारसी मस्त मलंग मचलायल करयला. एकर मतलब इ नाही कि बनारसी लोग साधना करय उहां जालन. अरे बहरी अलंग बनारिसन के मस्ती क अड्डा हौ, पूरी पलटन के साथ रेजगारी (बच्चा लोग) लोगन के लेइके जालन. घरे में चाहे केतनव कचकच होय, लेकिन बहरी अलंग क निश्चय खंडित नाही होइ सकत. चाहे हड़ताल होय, या राष्ट्रपति शासन, राजा मरय चाहे रानी, कवनो भी कारण से अगर दुकान या दफ्तर बंद हौ त बनारसी हर हाल में बहरी अलंग क प्रोग्राम सेट कइ लेई. जवने तरह से व्यापारिन के भीतर हमेशा नफा-नुकसान जोड़य-घटावय क झक सवार रहयला, नेतन के दिमाग में हमेशा हर बाती में राजनीति घुसेड़य क सनक सवार रहयला, ओही तरह हर खांटी बनारसी के भीतर बहरी अलंग क धुन सवार रहयला.
बहरी अलंग कवनो तीर्थस्थल या पर्यटन स्थल नाही हौ. लेकिन बनारसिन बदे इ स्थान हर स्थल से बढ़ि के हौ. बनारसी गुरु लोगन क निच्छद्दम, स्वच्छंद होइके मउज-पानी लेवय क दिव्य स्थान. बनारसी भाषा में एके माचा मारब भी कहल जाला. बहरी अलंग ओही स्थान के कहल जाला, जहां पक्का तलाब होय. तलाब में चैचक पक्का घाट बनल होय, जहां तबीयत से साफा-पानी लगावल जाइ सकय. साफा-पानी मतलब नहाना-धोना, शरीर अउर कपड़ा क साफ-सफाई. अगर तलाब न भी होय त कम से कम बढ़िया क इनारा यानी कुंआ होय. आसपास पेड़-पल्लव, बगइचा, जंगल होेंय. निपटय लायक लंबा-चउड़ा मैदान होय, जवन साफ-सुथरा भी होवय के चाही. वरना गुरु लोग ठीक ओइसय मुंह बनइहय जइसन अफीमची इमली देखि के बनावयलन. बनारसी दरअसल निपटय क अत्यंत प्र्रेमी होलन. भोजन चाहे जइसन मिलय, सूतय क जुगाड़ भले ही गड़बड़ होय, लेकिन निपटय क स्थान दिव्य होवय के चाही. साफा लगावय लायक चैरस जमीन चाही. इहय कारण हौ कि बनारसी लोग जब बनारस के बहरे जालन त निपटय-नहाये क दिव्य स्थान तजबीजयलन.

रामनगर, सारनाथ, राजा तलाब के अलावा अब विंध्याचल अउर चकिया-चंदौली तक बहरी अलंग क विस्तार होइ गयल हौ. बहरी अलंग क खास पहिनावा भी होला. बहरी अलंग क प्रेमी गुरु लोग धोती, गमच्छा, निगोटा अउर दुपट्टा क उपयोेग करयलन. धोती अउर दुपट्टा न रही तबौ चलि जाई, लेकिन गमच्छा अउर निगोटा हर हाल में चाही. जरूरी समाने में बल्टी-लोटा, डोरी, सिल-लोढ़ा, साबुन क बट्टी, तेल क शीशी अउर भांग क पैकेट हर बहरी अलंग प्रेमी अपने संघे रखयला. बहरी अलंग पहुंचतय सबसे पहिले गुरु लोग निगोटा पर आइ जालन. भांग के खूब साफ कइके बूटी तइयार कयल जाला. बूटी छनले के बाद नटई तक पानी डकारिके हाड़ी या बल्टी लेइके लोग निपटय जालन. निपटय क क्रिया एतना खास हौ कि इ शोध करय लायक हौ. घंटा-आध घंटा निपटब त साधारण बात हौ. कुछ अइसन भी बनारसी होलन जवन कई घंटा तक निपटत रहि जालन.
निपटले के बाद अब मालिश क नंबर आवयला. मालिश क दौर तबतक चलयला जबतक कि शरीर क तापमान 100 डिग्री से ऊपर न पहुंचि जाय. एकरे बाद नहान अउर फिर डंड बैइठक. अगर गदा-जोड़ी मिलि गयल त ओहू पर रियाज होई. हर बनारसी अपने परिवार के लेइके साल में कम से कम दुइ दइया बहरी अलंग बदे सारनाथ अउर रामनगर जरूर जाला. गरमी में सारनाथ अउर जाड़ा में रामनगर. इ दूनो स्थान क मेला देखतय बनयला. लेकिन परिवार के संघे रहले के बाद भी गुरु लोगन के कार्यक्रम में कवनो कंजूसी नाही होत. ओही तरह से भांग छनयला, साफा लगयला अउर नहान-निपटान होला. इ कुल काम से फुर्सत भइले के बाद अहरा पर बनावल बाटी, चूरमा, दाल-भात अउर चोखा, तरकारी भिड़ावल जाला. बहरी अलंग क ही प्रभाव हौ कि बनारस में अक्सर दंगल होलन. नागपंचमी देश में चाहे जइसे मनावल जात होय, लेकिन बनारस में छोटे गुरु-बड़े गुरु के रूप में पूजा होला, अउर पूरे बनारस भर में दंगल होला. बनारस में दंगल खाली पट्ठन के बीच नाही होत, जानवरन के बीच भी होला. सड़क पर सांड़ गरजयलन. भइस, भेड़ा अउर पक्षिन क दंगल जाड़ा के मौसम में हर साल होला. बुलबुल, तीतर, बटेर क भी युद्ध होला. मकर संक्रांति पर खासतौर से पक्षिन क दंगल होला. इ कुल दंगल खाली खेल तक सीमित नाही होतन, बल्कि बाजी भी लगयला. अपने-अपने पक्षिन के बनारसी लोग पूरे साल दंगल बदे ट्रेनिंग देलन, तइयार करयलन. कजरी, बिरहा, अउर शायरी क दंगल गरमी के मौसम में होलन.

बहरी अलंग क असली अर्थ विश्वकोश में चाहे जवन भी होय, लेकिन बहरी अलंग के मट्टी में उ बहार हौ, जवन न त बंबई के चैपाटी में हौ, न कनाट प्लेस के नफासत में हौ. बनारसी लोगन के जेतना गर्व बहरी अलंग पर हौ, ओतना अपने नगर पर नाही. बनारस अउर बनारसी लोगन क असली रूप बहरी अलंग में ही देखल जाइ सकयला. बिना बहरी अलंग देखले इ समझब कठिन हौ कि बनारसी लोगन के अपने बनारस से एतना मोहब्बत काहे हौ. बहरी अलंग खाली दिल बहलाव क क्षेत्र नाही हयन, बल्कि अध्यात्म अउर साधना क क्षेत्र भी हयन. बनारस के तीनों लोक से न्यारी नगरी क सर्टिफिकेट देवावय में बहरी अलंग क महत्वपूर्ण योगदान हौ. मृत्युलोक के मारा गोली, स्वर्ग तक में बनारस के बहरी अलंग क मिसाल नाही हौ. लेकिन सरकार आधुनिकता अउर नियोजन के चक्कर में कई ठे बहरी स्थानन के भीतरी यानी शहरी रंग में रंगले जात हौ, जवन बनारसी लोगन बदे बड़ी समस्या बनल जात हौ.



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Tuesday, September 1, 2020

सांडा...मर्दाना कमज़ोरी के नाम पर जान गंवाने वाला

 #सांडा...मर्दाना कमज़ोरी के नाम पर जान गंवाने वाला
मासूम जानवर

पाकिस्तान से लेकर राजस्थान के गरम रेगिस्तानी इलाक़ों में रेत पर रेंगता ये मासूम सा जानवर सांडा कहलाता है.शिकारी और परिंदों से बचते इसके दिन गुज़रते हैं लेकिन ये ख़ुद को इंसान से नहीं बचा पता. इसका वैज्ञानिक नाम युरोमेस्टिक हार्डवीकी है. छिपकली जैसा दिखने वाला ये सरीसृप परिवार का प्राणी है. शक़्ल से भले शक्ति कपूर जैसा डरावना हो लेकिन होता है सीधा आलोक नाथ जैसा. इसी सीधेपन का फायदा उठा कर शिकारी इनको धर लेते हैं.दूसरे हर जानवर की तरह इसमें भी चर्बी पाई जाती है इसकी चर्बी पर इंसान की ख़ास नज़र है. इसलिए ये आपको लाहौर की गलियों, चौराहों में सड़क किनारे या फिर ठेलों, दुकानों पर बैठा मिलेगा. मगर सांडा वहां ख़ुद से नहीं आता है. रेगिस्तान से पकड़ कर लाया जाता है.यहां ये चल फिर नहीं सकता क्योंकि इसकी कमर की हड्डी तोड़ दी जाती है. इसके बाद इसकी ज़िंदगी के दिन गिने चुने होते हैं.फ़ुटपाथों पर मजमा लगाए या फिर बड़ी-बड़ी दुकानों पर 'सांडे के शुद्ध तेल' की शीशियां सजाए सांडे के उन शिकारियों को ग्राहक मिलने की देर है, वो चाकू की मदद से इसका नरम पेट चीरते हैं और अंदर मौजूद चर्बी निकाल लेते हैं.ये सब कुछ ग्राहक की नज़रों के सामने किया जाता है. ताकि उसको तसल्ली हो की ये 'असली तेल' है.

ये शाकाहारी सरीसृप है ये कभी भी कीटों का शिकार नही करता है। ये बिना पानी पीये कई बर्षो तक जीवित रह 


सकता है ये पानी पीता है तो सिर्फ बरसाती ताज़ा पानी...बारिश आने से पहले अपने बिलों को ढक देता है जिससे हम ग्रामीण लोग बारिश होने की संभावना व्यक्त करते है...यदि इसकी गर्दन को काट भी दिया जाता है तो भी ये कुछ घंटों तक जीवित रहता है...ये सांडा नर लगभग 2 फ़ुट तक होता है और मादा इससे कम होती है...ये अपने मज़बूत पैर से किसी को नुक़सान नही पहुँचाते बल्कि ये बिलों को खोदने में काम लेते है...इनके पास तीन दाँत होते है एक ऊपर और दो नीचे...ये अप्रेल माह के आसपास संभोग करते है और मादा 10–15 तक अंडे देती है इनमें से आधे ये कम ही बच पाते है। इसके अन्दर दोनों पैरों के बीच में दो वसा की थैलियॉ होती है जिसके इसके पेट में चीरा लगाकर निकाला जाता है इस थैली की चर्बी को गरम कर दो तीन बूंद तेल निकल आता है बस. इतनी सी बात के लिए बेचारे को जान गंवानी पड़ती है. अब सुनो असली बात. यह लिंग के सेंटीनेंस के लिए दवाई है या नहीं है इसका तो पता नही लेकिन इसमें होता है पॉली अन्सेच्युरेटेड फैटी एसिड, जोड़ो और मांसपेशियों के दर्द में राहत देता है ये. तेल का उपयोग माँसपेशियों और नब्ज में रक्त संचार का काम करता है क्योकि ये बहुत ही गर्म तेल होता है लेकिन ज्यादातर इसका उपयोग लोग मर्दाना कमजोरी को दूर करने में करते है । बहुत सारे लोग सांडे को खा लेते है क्योकि इससे भी मर्दाना ताक़त और जोश का संचार होना एक कारण मानते है। बात करे इसके काम करने की तरीक़े की तो आप लोग अक्सर देखते हो पाकिस्तान के बाजारो में इन मासूम से सरीसृप की ढ़ेरो हकीमों के दुकानो पर अधमरे स्थिति में मिल जाते है हालाँकि भारत और पाकिस्तान दोनों में इसका मारना और तेल निकालना ग़ैर क़ानून है।

अब बात करते मर्दाना ताक़त की तो ये बात कुछ सच साबित होती है लेकिन जितना लोग सोचकर इसको ख़रीदते है उनके मुक़ाबले बहुत ही कम है...ये मालिस करने से रक्त संचार तो करता है लेकिन इसके साइंड इफ़ेक्ट भी हो सकते है क्योकि इसके मालिस से लिंग में अतिरिक्त माँस बनने लगता जो आपको परेशानी में डाल सकता है और मूत्र तक बंद कर सकता है...ये ना ही कोई लिंग वृद्धि करता है ना ही ताक़त उत्पन्न करता है क्योकि ये दोनों कार्य हार्मोन के कारण होते है न कि तेल के कारण। ये राजस्थान के इलाक़ों और कुछ हरियाणा पंजाब के इलाक़ों में भी पाया जाता है...इनको पकड़ना बड़ा आसान होता है क्योकि ये अपने बिलों को ताज़ा मिट्टी से ढककर रखते जिससे शिकारी लोग इन्हें आराम से खोज लेते है...फिर शिकारी लोग बिलों में धुआँ करते है जिससे इस मासूम को बाहर आना पड़ता है और शिकार जाल बिछाकर रखते है इनके बाहर आते ही इसकी कमर तोड़ देते है जिसके बाद ये भाग तो नही पता लेकिन कई महीनों तक ज़िंदा रहता है बाद में जैसे जैसे तेल लेने वाले आते है उनके सामने मारकर ताज़ा वसा का तेल निकालकर देते है। तेल को निकालने के लिए पहले साँडे के पेट पर चीरा लगाकर उसकी अन्दर की वसा निकाली दी जाती है ...ये वसा एक सांडे के अन्दर से दो थैलियाँ निकलती है फिर इनको निकालकर गर्म करने पर वसा से तेल निकलता है...एक सांडे से लगभग 1–5 ml तक प्राप्त होता है यानि 4–5 बूँद यदि आपको 100 ml तक चाहिए तो 50–60 सांडे मारने होगे...जो लोग बोतल भर कर देते है 3–4 सांडे मारकर वो सही नही है उसमें कुछ मिलाया जाता है...कुछ साँड़ों की वसा ज़्यादा होती है तो ज़्यादा भी मिल सकता है।

अन्ततः अगर आप सांडे के तेल में निकलने वाली चर्बी की मेडिकल जांच करें तो आपको पता चलेगा कि ये किसी भी जीव में पाई जाने वाली दूसरी चर्बी की तरह है और इसमें कोई ख़ास बात नहीं है'.सच तो यह है तेल में भी कोई ऐसी ख़ासियत नहीं है जो किसी भी तरह की यौन कमज़ोरी का इलाज कर सके. सांडे को बिना वजह मार दिया जाता है और ले दे कर ये सब पैसे का खेल है'.लोग इसको आलू की सब्जी की तरह खुल कर बेंच रहे हैं जबकि सांडा मारना अब गैरकानूनी है. इसको विलुप्तप्राय प्रजाति घोषित कर दिया गया है. अगली बार मर्द बनने के लिए किसी मजबूर का निकाला तेल लगाने की बजाय अमिताभ की फिल्म देख लीजिए और गाना गाइये- मैं हूं मर्द तांगे वाला. मैं हूँ मर्द तांगे वाला।।।

 Dharmendra Kumar Singh जी पोस्ट

 

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Saturday, September 30, 2017

Khajuraho Group of Monuments : खजुराहो की यात्रा

खजुराहो की यात्रा 30 September 2017
 
तो सुबह ५ बजे ही पत्नी जी की मधुर आवाज सुनाई दी, उठो चाय आ चुकी है, चाय पि लो कितने बजे खजुराहो की टैक्सी आएगी ? मैंने कहा ९ बजे यहाँ से ब्रेकफास्ट कर के निकलेगे.. १ घंटे में नाहा धो अपन तैयार हुवे आउर निकल पड़े खजुराहो की तरफ, सुबह ९ बजे अपन की टैक्सी आ चुकी थी, एक दम नयी बिना नंबर की अपन दोनों पति पत्नी सामान रख टैक्सी में बिराज हुवे , टैक्सी चालक से पता चला की करीब १४० किलोमीटर की दुरी है जो करीब ४ घंटे लगेगे.. मैहर - उचेहरा – पन्ना – खजुराहो वाया NH 39, हम मैहर से बाहर निकले हमारी टैक्सी दौड़ रही थी,इस नक्से के आधार पर ४० किलो मीटर चलने के बाद तो लगा की किसी गाव में आ गए है, उजड़ी सड़के, धुल मिटटी, खैर जाना तो था तो चुप चाप चल रहे थे

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Thursday, September 28, 2017

Maihar Yatra मैहर यात्रा

मैहर यात्रा 28 September 2017
हिन्दु धरम में सबसे बड़ी परेशानी है की मेहरारू के साथ धरम करम करना पड़ता है, इस साल कही पत्नी जी को ले कर कही निकले नहीं थे समाधी में, मने मेडिटेशन में क्यों की पत्नी जी के साथ मेडिटेशन करने से शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से हम स्वस्थ्य रह सकते हैं। मेडिटेशन तनाव और चिंता जैसी गंभीर समस्याओं के समाधान में भी लाभदायक है। तो सोचा था इस साल कुछ तूफानी करते है, चुकी पत्नी जी संघी मिजाज की है तो धार्मिक आस्था की बवासीर हर समय चपका रहता है आउर हम रहे सम्भोग से समाधी वाले, यही मामला नहीं मिलता है हर दिन किसी न किसी बात पर पत्नी जी से पंगा हो जाता है, लेकिन हिन्दू धरम में दहेज़ एक बुरी प्रथा है जो पैसे के लालच में मा बाप अपने बेटे के बेच देते है रोज सुनना पड़ता है .. एकदम्मे चूतिया हो का बे ???????? 

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Tuesday, June 27, 2017

Seema Subedi : सीमा सुवेदी विवाद

दुनिया चल रही है लोग खोज रहे है लेकिन इधर बीच नेपाल से वेब की खोज में सीमा सुवेदी टाप पर है उसके खिलाफ नेपाल की मिडिया में काफी नाराजगी दिख रही है जो  फेसबुक न्यूज़फ़ीड, ट्विटर, यूट्यूब और सभी सामाजिक प्लेटफार्मों पर है।



लेकिन वास्तव में क्या मामला है ? क्यों इतनी खोज बिन हो रही है सीमा सुवेदी की वह रातों रात क्यों इतनी
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Thursday, April 27, 2017

मदर्स डे (मातृ दिवस)

आज नेपाली बैशाख महिना का आमवस्या (वैशाख कृष्णऔँसी ) मतलब माता जी का मुख देखने का दिन, नेपाल का त्यौहार मुझे बहुत अच्छा लगता है , बस इसके पीछे एक सिंपल लोजिक है की माँ ने नौ महिनातक अपने गर्भ में रख कर जन्म दिया है


इस सम्मान में आज ये त्यौहार मनाया जाता है जिसे नेपाली में कहा जाता है “आमाको मुख हेर्ने दिन”
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Thursday, April 13, 2017

Vinay kull विनय कुल

हम ठहरे खांटी बनारसी, दिमाक से वही तन्नी गुरु स्टाइल, आप समझ सकते है, २००३ में भारत से बाहर निकले तो एक नयी दुनिया देखी, लोग कितने ब्यस्त है, कितनी क्रिएटिविटी है, उनकी सोच कुछ अलग है है, लेकिन वो एक समाज के ऐसे कोने में है की लोगो की नजरे ही नहीं जाती, लेकिन हम सुनते सबकी है, करते अपने मन का, लोगो की सोच में मंथन करने का, ये बनारसियो की आदत है, जो दुनिया नहीं करती वो बनारसी करते है क्यों की बनारस में हर बिद्या के गुरु है, बनारसी हु, लेकिन बनारस गुरु लोगो की ही नगरी है, मस्ती का शहर, उसी क्रम में एक बनारसी मस्ती का अंदाज “ विनय कुल जी “ अब का तो पता नहीं, आज से २० साल पहले बनारस में संध्या कालीन अख़बार “ गांडीव “ जिसमे विनय जी के कार्टून “जवाब नहीं” नियमित रूप से बनारसियो का एक नशा था “ छान घोट के गांडीव पड़ना और दिन भर के थकान को विनय कुल जी के कार्टून के माध्यम से राहत .. उस समय चुकी आज जैसे मिडिया का जमाना तो था नहीं, बस पत्र पत्रिकाए, जिसमे विनय जी के हास्य ब्यंग दिख जाते ... अब मिडिया का जमाना आया तो एक दिन फेसबुक के एक पेज में साल २०१२ में धरा गए, जिन्होंने हम जैसे बनारसियो जो बनारस को प्रतक्ष्य नहीं देख सकते थे “सुबहे बनारस“ “हमारी काशी “ के भी दर्शन आप के माध्यम से होने लगा  डरते डरते उनको फेसबुक पर निवेदन भेजे, स्वीकार हो गया, तो हमहू फुल के कुप्पा हो गए की आज पहली बार किसी दिब्य बनारसी के हम मित्र सूचि में जगह पाए है.. अब तो विनय जी की विधा पुरे सोसल मिडिया में छितरा रहा है, पुरे बनारस के सटीक जानकारी के एन्साक्लोपीडिया है, ३-४ बार मिलना हुवा, जो हास्य विधा में मालिक है, वो असल जिन्दगी में बहुत गंभीर, नपी तुली बात करने वाले और अपने उसूलो के कट्टर, नो एहर होहर, उनके साथ बनारस की और भी छुपी विधा के दर्शन हुवे, जिसे मैंने गूगल पर लिखने की कोशिश की है, क्यों की ये बनारस की प्रतिभा सिर्फ बनारस में ही न रह जाये, दुनिया के लोग जाने इसी क्रम में विनय कुल जी.
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Saturday, March 25, 2017

आखिर ये धर्म है क्या ?

अभी बेटे का एग्जाम ख़तम हुवा, परेशान हो गया था वो ,हफ्ता हो गया अब उने वापसी का टाइम तो तो कल पशुपति नाथ मंदिर मंदिर गया था दीवाल पर एक नया वाल तो माँ मने मेरी धर्म पत्नी के साथ आ गए काठमांडू. एक  पेंटिंग लगा था ।। धर्म के लिए जीना सीखिए ।।  चुकी हाथ में पूजा का सामान पकडे थे नहीं तो फोटो खीच लेता लेकिन ये बात पड़ के सर चकरा गया। अब चूकि धर्म पत्नी साथ में थी तो धर्म पे वार्तालाप हो नहीं सकता था । ये सोच के की जब धर्म साथ में ही है तो क्या सीखे , मन मसोस के रह गए तो चुपचाप रहना ही उचित समझा । खैर शांत मन से मंदिर के अन्दर घुसा, लाईन लम्बी थे तो लग गए सबसे आगे धर्म पत्नी जी बिच में सुपुत्र जी पीछे है सिर्फ "पति" जिसमे कोई धर्म का सरोकार नहीं , लगे शिव जाप करने
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Sunday, May 22, 2016

फ्री सेक्स का होता !!

गुरू !! ई फ्री सेक्स का होता है हमको नहीं पता न पता करने की इक्षा है, हा अभी सोशल मीडिया पर ये मुद्दा उठाया है ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमन एसोसिएशन की सेक्रेटरी और सीपीएम (एमएल) पोलित ब्यूरोकी सदस्य कविता कृष्णन और उनकी मां लक्ष्मी कृष्णन ने। इस पोस्ट में उन्होंने जेएनयू के शिक्षकों को भी निशाने पर लिया है। जेएनयू के शिक्षकों ने २०१५ में एक दस्‍तावेज तैयार किया था, जिसमें यूनिवर्सिटी के छात्रों को सेक्‍स और शराब से भरे जीवन के बारे में बताया गया था। पोस्‍ट में दावा किया गया है कि कविता ने एक टीवी चैनल की डिबेट में कहा कि यह अफसोस की बात है कि कुछ लोग ‘फ्री सेक्‍स’ (अपनी मर्जी से किसी भी व्‍यक्ति से शारीरिक संबंध बनाना) से डरते हैं। इए कुल तो बड़े लोगो की बड़ी बाते है मै तो बस इतना ही जानता हूँ कि कुछ लोग बहुत ही सदाचारी होते हैं जो शादी से पहले सेक्स
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Thursday, April 14, 2016

बनारस का खाना

बनारस के खान पान पर एक सीरीज़ लिखने की इच्छा बहुत दिनों से थी लेकिन “जाए दा” के आलस्य के बनारसी महामंत्र के कारण लिखना संभव नहीं हो पा रहा था. फिलहाल अचानक आज बनारस बेतरह याद आया और थोड़ा जोड़ तोड़ कर बनारसी कचौड़ी-जलेबी पर ये पहला आलेख तैयार हो गया. यहां की कचौड़ी, लौंगलता, जलेबा और भांग वाली ठंडई जैसी तमाम खाने-पीने वाली चीजें लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बनारस का पान. बनारस का नाम जुबां पर आते ही सबसे पहले 'बनारसी पान' की तस्वीर सामने आ जाती है।

बनारस का खाना
जिसने न जाना
रह गया बेगाना:
उड़द की दाल की पीसी हुई थोड़ी मसालेदार पीठी को आटे में भर कर बनाई देशी घी से भरे कड़ाहे में नाचती वो लाल लाल कचौड़ी और थोड़ा हल्का सुगंध का फ्लेवर लिए मोटा जलेबा. ये है बनारस का राजसी नाश्ता.
कचौरी शब्द बना है कच+पूरिका से। क्रम कुछ यूं रहा- कचपूरिका > कचपूरिआ > कचउरिआ > कचौरी जिसे कई लोग कचौड़ी भी कहते हैं। संस्कृत में कच का अर्थ होता है बंधन, या बांधना। दरअसल प्राचीनकाल में कचौरी पूरी की आकृति की न बन कर मोदक के आकार की बनती थी जिसमें खूब सारा मसाला भर कर उपर से लोई को उमेठ कर बांध दिया जाता था। इसीलिए इसे कचपूरिका कहा गया।
दूसरी और जलेबी मूल रूप से अरबी लफ्ज़ है और इस मिठाई का असली नाम है जलाबिया । यूं जलेबी को विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वाले भी हैं। शरदचंद्र पेंढारकर (बनजारे बहुरूपिये शब्द) में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं। वे रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं जिसमें इस व्यंजन के बनाने की विधि का उल्लेख है। भारतीय मूल पर जोर देने वाले इसे ‘जल-वल्लिका’ कहते हैं । रस से परिपूर्ण होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका रूप जलेबी हो गया। फारसी और अरबी में इसकी शक्ल बदल कर हो गई जलाबिया।
फिलहाल बात करते हैं बनारस की कचौड़ी और जलेबी की!

जब बाकी की दुनिया बेड-टी का इंतजार कर रही होती है, सयाने बनारसी सुबह छह बजे ही गरमा-गरम कचौड़ीऔर रसीली जलेबी का कलेवा दाब कर टंच हो चुके होते हैं। इस रसास्वादन अनुष्ठान के कर्मकांड रात के तीसरे पहर से ही शुरू हो जाते हैं। भठठी दगाने और कड़ाहा चढ़ाने के बाद चार बजते-बजते शहर के टोले मुहल्ले भुने जा रहे गरम मसालों की सोंधी खुशबू से मह-मह हो उठते हैं। एक ऐसी नायाब खुशबू जो नासिका रंध्रों को उत्तेजित कर भूख को आक्रमक बना दे। इस सुगंध से आप वंचित हैं तो समझिये आप स्वाद के एक भरे पुरे अहसास को मिस कर रहे हैं। सुबह के पांच बजते न बजते तो खर कचौडि़यों की व्रत डिगा देने वाली सोंधी गंध, सरसों तेल की बघार से नथुनों को फड़का देने वाली कोहड़े की तरकारी की झाक और खमीर के खट्टेपन और गुलाबजल मिश्रित शीरे में तर करारी जलेबियों की निराली गंध से सुवासित आबो हवा स्वाद का जादू जगा चुकी होती हैं। एक ऐसा जादू जो सोये हुए को जगा दे। जागे हुओं को ब्रश करा कर सीधे ठीयें तक पहुंचा दे। सात बजते-बजते तो विश्वेश्वरगंज के विश्वनाथ साव, चेतगंज के शिवनाथ साव, हबीबपुरा के मम्मा,डेढ़सी पुल वाली दोनो दुकानों, जंगमबाड़ी के बटुकसरदार, लोहटिया में लक्ष्मण भंडार, सोनारपुरा के वीरू और लंका वाली मरहूम चचिया की दुकान पर नरम-गरम कचौडियों की आठ दस घानी उतर चुकी होती है।
सो बनारस में भोजन की शुरुआत होती है सुबह के नाश्ते से .........ऐसा बताते हैं की पुराने ज़माने में कोई बनारसी कभी घर पे नाश्ता नहीं करता था ......वहां जगह जगह दुकानों पे और ठेलों पे कचौड़ी जलेबी बिका करती थी ....आज भी बिकती है ....एक पूरी गली है बनारस में ....नाम है कचौड़ी गली ......वो केंद्र था कभी बनारसी नाश्ते का ........अब ये कचौड़ी असल में पूड़ी है जिसे थोडा अलग ढंग से बनाते हैं .........उसमे उड़द की दाल की पीठी भरते है और उसे करारा कर के तलते है .........पहले देसी घी में बनती थी ...अब refined में बनाते हैं .......साथ में सब्जी .....आज भी दोने और पत्तल (पेड़ के पत्तों से बनी (use and throw plates ) में ही परोसते हैं .....फिर उसके बाद जलेबी ........


ये कचौड़ी और जलेबी का combination है ....जैसे coke और चिप्स का है ........अब जलेबी तो दुनिया जहां में बिकती है ....पर बनारस की जलेबी की तो बात ही कुछ और है. 'बनारसी हलवाई जलेबी बनाने वाली मैदानी पर बेसन का हल्का-सा फेंट मारते हैं. जलेबियां कितनी स्वादिष्ट बनेंगी, यह फेंटा मारने की समझदारी पर निर्भर करता है. कितनी देर तक और कैसे फेंटा मारना है यह कला बनारसी हलवाई अच्छी तरह जानते हैं. 

शहर बनारस का स्वादिष्ट कलेवा खर कचौड़ी और तर जलेबी, आपाधापी के इस दौर में भी मजबूती से अपनी जगह बनाए हुए है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले यह कलेवा झपोलियों में भरकर घर आया करता था। जल्दी भागो के इस दौर में यह नाश्ता भी अब फास्ट फूड से टक्कर लेने लगा है। चार कचौडिय़ों के साथ जलेबी फटाफट मुंह में डाली और चल पड़े अपने काम पर। 

हालांकि स्पर्धा की होड़ में बनारस के इस पुराने व्यंजन के साथ अब इडली व डोसा भी टक्कर लेने लगे हैं। बावजूद इसके अपने अनूठे स्वाद के दम पर जलेबी-कचौड़ी की बादशाहत कायम है

यह बात अलग है कि स्वास्थ्य के प्रति सर्तकता बढ़ जाने के कारण कुछ लोग अब नाश्ते की फेहरिस्त में ओट्स और दलिया को प्रमुखता देने लगे हैं। टोस्ट और आमलेट भी जोर आजमाइश में है लेकिन बनारस की जीवन शैली में शामिल हो चुके जलेबी कचौड़ी को अब उसकी जगह से हटाना संभव नहीं है।
आज भी बनारस का आदमी बगल की दुकान पर अल सुबह भूने रहे मसाला की सुगंध से ही जागता है और नित्य काम से निबटने के बाद सीधे कचौड़ी.जलेबी की दुकान पर भागता है। जाड़ा, गर्मी या हो बरसात जतनवर के विश्वनाथ साव भोर में जब कचौड़ी के साथ चलने वाली सब्जी की बघार देते हैं तो पास.पड़ोस के बाशिंदों की नथुने फड़क उठते हैं। इसके बाद तो सारा आलस्य काफूर हो जाता है और लोग कचौड़ी.जलेबी के कतार में लग जाते हैं।

अंत में बनारसी कचौड़ी के बारे में बेढब बनारसी नें अपने हास्य उपन्यास लफ्टन पिगसन की डायरी में जो वर्णन किया है उसे पढ़ लेना भी बनारसी कचौड़ी जलेबी के स्वाद सा मनभावन है!
एक मिठाई की दुकान पर मैंने देखा कि एक आदमी बड़े-बड़े घुँघराले बाल रखे हुए बेलन से आटे की गोल-गोल गेंद बनाकर बेल रहा है और फिर एक कड़ाही में उसे डालता है। कड़ाही में घी खौल रहा था। वह झूम-झूमकर बेलना बेल रहा था। उसके श्यामल मुख पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं जैसे नीलाम्बर नक्षत्र में कभी-कभी तारे आकाश से टूटकर गिरते हैं वैसे ही पसीने की बूँदें नीचे गिरती थीं जो उसी आटे की गेंद में विलीन हो जाती थीं। पूछने पर पता चला कि यह दो प्रकार की होती हैं। एक का नाम पूरी है जिसका अर्थ है कि इसमें किसी प्रकार की कमी नहीं है। इसे खा लेने से फिर भूख में किसी प्रकार की कमी नहीं रह जाती। दूसरी को कचौरी कहते हैं। इसके भीतर एक तह आटे के अतिरिक्त पिसी हुई दाल की रहती है। पहले इसका नाम चकोरी था। शब्दशास्त्र के नियम के अनुसार वर्ण इधर से उधर हो जाते हैं। इसीसे चकोरी से कचोरी हो गया। चकोरी भारत में एक चिड़िया होती है जो अंगारों का भक्षण करती है। कचौरी खानेवाले भी अग्नि के समान गर्म रहते हैं, कभी ठण्डे नहीं होते। गर्मागर्म कचौरी खाने का भारत में वही आनन्द है जो यूरोप में नया उपनिवेश बनाने का

विश्व की प्राचीन नगरी काशी मंदिरों और घाटों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां का रहन-सहन, अक्खड़पन, खुशमिजाजी और सुकून लोगों को काफी पसंद है। बनारस की एक और चीज है, जो लोगों को इस शहर की तरफ खींच लाती है। वो है यहां का खान-पान। बनारसी पान हो या फिर टमाटर चाट, भांग वाली ठंडाई हो या फिर कचौड़ी, जो एक बार यहां के लजीज व्यंजनों का स्वाद चखता है, वो वाराणसी का और भी मुरीद हो जाता है।
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Monday, February 15, 2016

वैलेंटाइन रे वैलेंटाइन

अभी ऑफिस में वर्क लोड कुछ ज्यादा ही है, तो कुछ कम ही लिख पाते है... लेकिन इस साल कुछ खास सोचा था की इस साल हम संत वैलेंटाइन जरुर बनेगे.. इस लिए बनारस गया था पत्नी जी के साथ कुछ रोमांटिक फोटो खीचने के लिए, वैसे इस बार का थीम सोचा था " गोरी तेरा गाव बड़ा प्यारा " घाट किनारे बेटे की सायकिल ले कर उस पत्नी जी को बैठा कर कुछ रोमांटिक अंदाज में फोटो खिचाने का .. लेकिन कहते है न किस्मत थी .गांडू.. तो हम आ गए काठमांडू.. जाने दीजिये साहेब अब ज़िन्दगी में इतने मुक़दमे हैं .. एक मुकदमा मुहब्बत का भी सही ।

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Friday, February 5, 2016

वाराणसी-बानारसी-बनारस अविमुक्त क्षेत्र, महाश्मशान, आनंदवन, हरिहरधाम, मुक्तिपुरी, शिवपुरी, मणिकर्णी, तीर्थराजी, तपस्थली, काशिका

भारत को धर्म और दर्शन की धरा के रूप में जाना और माना जाता है। भारत अनेकता में एकता की सजीव प्रतिमा है। इसी भारतीयता का समग्र चरित्र किसी एक शहर में देखना हो तो वह होगा बनारस। बनारस को काशी और वाराणसी नामों से भी जाना जाता है। बनारस/वाराणसी/ काशी को जिन अन्य नामों से प्राचीन काल से संबोधित किया जाता रहा है वे हैं – अविमुक्त क्षेत्र, महाश्मशान, आनंदवन, हरिहरधाम, मुक्तिपुरी, शिवपुरी, मणिकर्णी, तीर्थराजी, तपस्थली, काशिका, काशि, अविमुक्त, अन्नपूर्णा क्षेत्र, अपुनर्भवभूमि, रुद्रावास इत्यादि। इसी का आभ्यांतर भाग वाराणसी कहलता है। वरुणा और अस्सी नदियों के आधार पर वाराणसी नाम पड़ा ऐसा भी माना जाता है। कहते हैं, दुनिया शेषनाग के फन पर टिकी है पर बनारस शिव के त्रिशूल पर टिका हुआ है। यानी बनारस बाकी दुनिया से अलग है।
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Monday, July 8, 2013

लिंग का साइज़

पिछले पोस्ट में मैंने लिंग की साइज़ के बारे में लिखा था , बहुत दिन हो गया कुछ लिखा नहीं था, तो आज शादी की एक और वर्ष गांठ तो सोचता हु कुछ हो सकता है क्या, तो इस बार कुछ प्रयास किया जाय की कुछ हो सकता है क्या , तो सबसे बड़ी समस्या ये है की शरीर के बनावट से महिलाये ही नहीं सबसे ज्यादा पुरुष ही परेसान है महिला का ब्रेस्ट छोटा तो फोम की ब्रा, हिप छोटा तो टाईट जींस यानि उनका ये प्रयास होता है की पुरुष उन्हें देख ही ले, ये स्थिति ही कुछ विचित्र है..   कामुक कहानियो का दौर है, हर जवान होता बच्चा पोर्न की खोज में, अभी जब से सन्नी भौजी आई है तो समाज में कुछ ज्यादा ही खुला पन आया है, पिछले ही दिनों बनारस गया था, ससुराल में कुछ आयोजन था तो वैसे ही रात में किसी चैनल में सन्नी भौजी का अन्तरवार्ता चल रहा था तो हमरे पत्नी जी के साथ एक गरम चर्चा कर रहे थे सन्नी के बारे में, तब मुझे लगा कुछ परिवर्तन तो है, समाज में, लोग इन दबी हुई कहानियो के बारे में चर्चा तो कर रहे है, हमारे ज़माने में कहा ये सब , उस समय ही हिन् भावना तो यही थी लडको में की पेनिस का साइज़ कैसे बढे... मैंने अपना प्रोयोग किया है, अब इसका कोई डाक्टरी आधार तो नहीं

क्या लिंग का साइज़ 5 इंच का होना पत्नी को करता है संतुष्ट
तो मेरे हिसाब से तो पहले तो आपको यह बता देना ज़रूरी है कि आपके लिंग का साइज बिल्कुल ठीक है और इसके लिए आपको वैवाहिक जीवन में कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय पुरूषों के लिंग का साइज 5 से 6 इंच का होता है। अच्छी तरह से सेक्स लाइफ का आनंद उठाने के लिए दिल के एहसास की ज़रूरत होती है लिंग के साइज की नहीं।
अब जानकारी के तौर पर आपको यह बताना ज़रूरी है कि लिंग के साइज को बढ़ाने का कोई भी तरीका सुरक्षित नहीं होता है। बाजार में बहुत तरह से जेल, क्रिम, और दवाईयाँ मिलती हैं जो सिर्फ नाम की ही होती है। यहाँ तक कि व्यायाम भी इस मामले में कोई प्रभावकारी काम नहीं कर पाता है। इस क्षेत्र में पीनिस इन्लार्ज्मन्ट सर्जरी ( penis enlargement surgery) कुछ हद तक काम करता है। लेकिन यह इरेक्ट अवस्था में लिंग के साइज़ को बढ़ाने में मदद नहीं करता है। किसी-किसी को सर्जरी के बाद इरेक्शन में असुविधा होती है। एक ही चीज आपके इस समस्या का समाधान कर सकता है, वह है सेक्स एजुकेशन। इसके द्वारा आपको सेक्स ऑर्गन के बारे में सही जानकारी भी मिलेगी और सेक्स करने का सही तरीके का भी पता चलेगा। मेरे किसी भी लेख का आधार गूगल बाबा ही है, पहले जड़ की तरफ पहुचे की ये सेक्स की शुरुवात हुई कहा से लैब न साला लिंग के साइज़ का लफड़ा आएगा, तो पता चला की ऋषि वात्सायन ने ये पुनीत ग्रन्थ लिखा था तो काम-सूत्र का ज्ञान कुछ ऐसा है :

ऋषि वात्सायन  दूारा लिखित काम-सूत्र शरीरिक सुखों के विषय पर सम्पूर्ण गृन्थ है। हिन्दू धर्म में वैवाहिक काम सम्बन्ध किसी ‘ईश्वरीय-आज्ञा’ का उलन्धन नहीं माने जाते। वह ईश्वर के प्रति मानव कर्तव्यों के निर्वाह के निमितहैं और सृष्टि के क्रम को चलाये रखने की श्रंखला के अन्तर्गत आते हैं। कामदेव को देवता माना जाता है ना कि शैतान। काम-सूत्र गृन्थ का लग भग सभी विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और भारतीय अध्यात्मिकता की तरह अपने क्षेत्र में यह गृन्थ भी सर्वत्र प्रेरणादायक है। इस से प्रेरणा ले कर शिल्पियों और चित्रकारों ने अपनी कला से विश्व भर के पर्यटकों को चकित किया है। चन्देल राजाओं दूारा निर्मित खजुरोहो के तीस मन्दिर काम-कला कृतियों को ही समर्पित हैं जो इस विषय में मानव कल्पनाओ की पराकाष्ठा दर्शाती हैं। काम को धर्म शास्त्रों की पूर्ण स्वीकृति है अतः शिल्प कृतियों में अधिकतर देवी – देवताओ को ही नायक नायकाओं के रूप में दिखाया गया है।

हिन्दू समाज में कोई ‘तालिबानी ’ ढंग का अंकुश नहीं है। केवल धर्म और सार्वजनिक स्थलों पर सामान्य शिष्टाचार का निर्वाह करना ही आवश्यक है। खजुरोहो कृतियों के पीछे छिपा अध्यात्मवाद और इतिहास शायद तथाकथित ‘ओवर-लिबरल’ विदेशी पर्यटकों को समझ नहीं आये गा फिर भी उन्हें स्वीकारना पडे गा कि काम-कला प्रदर्शन में भी आज से दस शताब्दी पूर्व भारतवासी योरूप्यिन लोगों से कहीं आगे थे।

काम का क्षेत्र केवल शरीरिक सम्बन्धों तक ही सीमित नहीं है। इस के अन्तर्गत सहचर्य के अतिरिक्त अच्छा भोजन, वस्त्र, आभूषण, रहन-सहन, कला, मनोरंजन, आराम, सुगन्धितवातावरण आदि जीवन के सभी भौतिक ऐश्वर्यों के आकर्षण आ जाते हैं। धर्म की सीमा के प्रतिबन्ध के अन्तर्गत सभी कुछ हिन्दू समाज में स्वीकृत है। यही वास्तविक ‘लिबरलज़िम ’ है।

वाल्मीकि रामायण में कई भौतिक सुखों की परम्पराओ के उल्लेख देखे जा सकते हैं। ऱाजा दशरथ को प्रातः जगाने का विधान अयोध्या नगरी की भव्यता तथा ऐश्वर्य का भान कराता है। ऋषि भारदूाज चित्रकूट मार्ग पर राजकुमार भरत तथा अयोध्या वासियों के सत्कार में ऐक भोज का प्रबन्ध अपने आश्रम में ही करते है जो किसी भी पाँचतारा होटल की ‘बैंक्विट’ से कम नहीं। ऱावण के अन्तःपुर में सीता की खोज में जब हनुमान प्रवेष करते हैं तो वहाँ के वातावरण का चित्रण अमेरिका के किसी भी नाईट-कल्ब को पीछे छोड दे गा। किन्तु ऋषि वालमीकि कहीं भी वर्णन चित्रण करते समय भव्यता और शालीनता की रेखा को नहीं लाँघते।

फिर भी आप से कौनो मैच करता है तो

वात्स्यायन ने लिंग के आकार के आधार पर पुरुष को तीन वर्ग में बांटा है
1. शश (खरगोश के समान छोटे व पतले लिंग वाला)
2. वृष (बैल के समान लंबाई व मोटाई में मंझोले लिंग वाला)
3. अश्व (घोड़े के समान लंबे और मोटे लिंग वाला)

योनी के आकार व गहराई के आधार पर स्त्रियों को भी तीन श्रेणियों में रखा गया है
1. मृगी (हिरनी के समान उथली योनि वाली)
2. बड़वा (घोड़ी के समान मझोली गहराई की योनि वाली)
3. हस्तिनी (हथिनी के समान गहरी योनि वाली)

समान व लिंग वाले स्त्री-पुरुष के बीच संभोग को समान मैथुन मान
गया है। समान मैथुन को सर्वोत्तम माना गया है। इसके तीन प्रकार हैं

1 शश पुरुष का मृगी नारी के साथ
2 वृष पुरुष का बड़वा नारी के साथ
3 अश्व पुरुष का हस्तिनी नारी के साथ

योनि व लिंग की असमानता वाले स्त्री-पुरुष के संभोग को विषम संभोग माना गया है। इसके छह प्रकार हैं

1 शश पुरुष का बड़वा नारी से
2 शश पुरुष का हस्तिनी नारी से
3 वृष पुरुष का मृगी नारी से
4 वृष पुरुष का हस्तिनी नारी से
5 अश्व पुरुष का मृगी नारी से
6 अश्व पुरुष का बड़वा नारी से

वात्स्यायन के मुताबिक विषम में भी संभोग का आनन्द मिल सकता है, लेकिन...

1. अश्व पुरुष का बड़वा नारी से एवं वृष पुरुष का मृगी नारी से संभोग हो
2. अश्व पुरुष का मृगी नारी से संभोग कष्टकर हो जाता है।
3 .शश पुरुष का हस्तिनी नारी से संभोग सबसे निम्न दशा है।
4 .शश पुरुष का बड़वा नारी से, वृष पुरुष का मृगी नारी से एवं वृष पुरुष का हस्तिनी नारी से संभोग की दशा मध्यम दशा है
5 . विषम संभोग में भी नारी योनि की गहराई की अपेक्षा पुरुष लिंग की लंबाई वाला संभोग उस संभोग से श्रेष्ठ है, जिसमें नारी योनि पुरुष के लिंग से बड़ी होती है

लिंग: पांच बड़े तथ्य लिंग बहुत सारे आकार और साइज़ के होते हैं: सीधा, टेढ़ा, मोटा, पतला, लम्बा, खतना करा हुआ और बिना खतना...लेकिन इसमें से नोर्मल क्या है ? और क्या आप सचः क्या हम किसी पुरुष की नाक देखकर उसके लिंग की लम्बाई का पता लगा सकते हैं ? क्या सभी पुरुषों के लिंग एक ही तरह से तना हुआ होता है ? और वीर्यपात क्या होता है ?

चलिए, बात करते हैं साइज़ की। जब लिंग तना हुआ नहीं होता,तो उसकी नोर्मल लम्बाई होती है - 6 से 13 सेंटीमीटर। जब लिंग तना हुआ होता है, तो उसका साइज़ होता है 7 से 17 सेंटीमीटर के बीच। लम्बे लिंग के मुकाबले, छोटे लिंग अधिकतर तना हुआ होने पर ज़्यादा लम्बे हो जाते हैं। आपके लिंग का साइज़ आपकी प्रजातीय वर्ग और नस्ल पर भी निर्भर करता है। अफ्रीका के वंशज के लिंग यूरोप के पुरुषों के मुकाबले ज्यादा लम्बे और मोटे होते हैं। अगर आप एशियाई नसल के हैं, तो आपका थोड़ा छोटा और पतला लिंग हो सकता है, ऐसा वर्ल्ड हेल्थ ओर्गनइजेशन का कहना है। तो क्या आप वाकई किसी पुरुष की नाक देखकर यह बता सकते हैं की उसका लिंग कितना बड़ा है? या उसके पैर देखकर? अगर वाकई आप किसी पुरुष के लिंग का नाप जानने की इच्छा रखते हैं तो उसकी हथेली पर नज़र डालिए।जितनी बड़ी रिंग फिंगर (अनामिका) होती है, उतना ही बड़ा उसका लिंग होने की संभव है, ऐसा दक्षिण कोरेया में करे गए एक शोध में पाया गया। जितना ज़्यादा टेस्टास्टरोन (वृषणि) किसी पुरुष को मिली होगी, जब वो अपनी माँ के गर्भ में था, उतनी बड़ी ही उस पुरुष की रिंग फिंगर होती ही। लेकिन इसका असर उसके लिंग के साइज़ पर भी पड़ता है। लम्बी रिंग फिंगर (अनामिका), लम्बा लिंग पर और जानकारी लेकिन...क्या वाकई साइज़ से फर्क पड़ता है ? तो अब आप शायद अपनी उँगलियों को देखकर सोच रहे होंगे की क्या सच में साइज़ से कोई फ़र्क पड़ता है। ऐसा पाया गया है की लिंग की मोटाई अपने साथी को संतुष्ट करने के लिए ज़्यादा ज़रूरी होती है, क्यूंकि इस से योनी में ज़्यादा उतेजना होती है। और लिंग के साइज़ को एक तरफ कर दे तो, महिलाएं एक स्थायी रिश्ता और अपने साथी की बाकि शारीरिक चीज़ों को भी - जैसे बालों को, संतुष्ट सेक्स का ज़रूरी हिस्सा मानती हैं ! क्या साइज़ से फ़र्क पड़ता है ? उतेजित होकर तन जाना जब आप कामुकता से उतेजित होते हैं, आपका लिंग तन जाता है और बड़ा भी हो जाता है -इसको इरेक्शन कहते हैं। पुरुषों के लिए अनचाहे भी और स्वाभाविक तौर से भी इरेक्शन होना, यानी लिंग का तनजाना बहुत आम है। शायद यह थोडा शर्मनाक लगे, लेकिन यह बिलकुल नोर्मल है। यह रात में भी हो सकता है, कभी कभी रात में तीन से पांच बार तक शुक्राणु और वीर्यपात जब आप बहुत उतेजित हो जाते हैं, तब आपको ओर्गास्म (चरम आनंद) और वीर्यपात हो सकता है। इसका मतलब है की एक चिपचिपा, सफ़ेद रनग का वीर्य लिंग से बाहर आता है। यह हस्तमैथुन और सेक्स के दौरान भी होता है। और आपके सोते हुए भी, जिसको स्वप्नदोष बोलते है। हस्तमैथुन की तरह, स्वप्नदोष भी बिलकुल नोर्मल है और इस से कोई नुक्सान नहीं होता - सिर्फ यह की आप जब उठते हैं तो चिपचिपा लगता है जैसे जैसे उम्र बढती है, उतना ही ज़्यादा शुक्राणु आपका शरीर बनाने लगता है। तो जब पहली बात आपका वीर्यपात होता है, तो बहुत थोड़े शुक्राणु बाहर निकलते हैं। कुछ सालों के बाद तो कुछ 900 मिलियन शुक्राणु हर वीर्यपात पर बाहर निकलते हैं। क्या आपके लिंग में कड़ापन नहीं आता क्या आप संभोग के दौरान सफल नहीं हो पाते हैं, क्या आपके लिंग में कड़ा पन नहीं आता या आप के अंदर उत्तेजना काफी देर से पैदा होती है ? पुरुषों की लव लाइफ के लिए लिंग में कड़ा पन नहीं आना खतरनाक साबित हो सकता है। इसे अंग्रेजी में इलेक्टाइल डाइस्फंशन कहते हैं। सीधे शब्दों में इसे नपुंसकता कहा जाता है। अगर ऐसा है, तो आप कुछ जरूरी बातों का पालन कर इससे काफी हद तक कम या खत्म कर अपनी पार्टनर को संतुष्ट कर सकते हैं। सबसे पहले हम बात करेंगे इसके पीछे के कारणों की। लिंग में कड़ा पन नहीं आने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

1. पत्नी से बिगड़ते संबंध: यदि आपकी पत्नी से आपके संबंध अच्छे नहीं हैं और आप दोनों के अंदर संभोग की चाहत खत्म हो चुकी है,तो धीरे-धीरे लिंग में कड़ापन आना कम होने लगता है। एक समय ऐसा आता है, जब आप चाह कर भी संभोग नहीं कर पाते। लिहाजा सेक्स लाइफ को लंबे समय तक बनाये रखने के लिए पति- पत्नी के बीच मधुर संबंध होना जरूरी है।

2. संभोग नहीं करना: मधुर संबंध होते हुए भी यदि आपने पत्नी से संभोग करना बंद कर दिया है या कम कर दिया है, तो टेस्टोस्टीरोन का बनना कम हो सकता है, जिस वजह से लिंग में कड़ापन आने में दिक्कत होने लगती है।

3. अन्य कारण: धूम्रपान करने, शराब पीने, जरूरत से ज्यादा मानसिक तनाव, जरूरत से ज्यादा आलस्य, अवसादग्रस्त होने, आदि से भी लिंग में कड़ापन कम हो जाता है। इसके अलावा डायबटीज़, कोलेस्ट्रॉल, किडनी संबंधी बीमारियां और हाई व लो ब्लड प्रेशर भी नपुंसकता के कारण हो सकते हैं। नपुंसकता का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव शादी-शुदा जीवन पर पड़ता है। सबसे ज्यादा तलाक भी इसी के कारण होते हैं। यदि लिंग में कड़ापन आने से पहले, या कड़ापन आते ही वीर्य निकल जाता है, यदि संभोग शुरू करते ही वीर्य निकल जाता है, तो यह सभी नपुंसकता की निशानी हैं। यदि संभोग के दौरान आपका वीर्य निकलने से पहले ही आपके ब्लैडर में वापस चला जाता है, तो भी यह खतरनाक है। यदि आपके साथ ऐसा होता है, तो घबराने की बात नहीं है। आप बिना किसी संकोच के सीधे किसी अच्छे गुप्तरोग विशेषज्ञ की सलाह लें। इरेक्टाइल डाइस्फंशन में वियाग्रा या लेविट्रा जैसी दवाएं दी जाती हैं। ऐसा होने पर पत्नी के भरपूर सहयोग की जरूरत पड़ती है। यदि आपके पति के साथ ऐसी समस्याएं हैं, तो उनके मनोबल को गिरने मत दें। आप पहले की तरह ही उत्तेजक कपड़ों में उनके सामने जायें और उन्हें सेक्स के लिए प्रेरित करें। किस, फोरसेक्स, आदि जारी रखें। हो सकता है शुरू में विफलता हाथ लगे, लेकिन सही इलाज के बाद आपको सफलता जरूर मिल सकती है।

लेकिन ये बाते तो काम सूत्र के साथ लोगो के विचार है, जो काम लगे वो हथिया लीजिये... वैसे नए दौर का कामसूत्र वात्स्यायन के बताए पुराने कामसूत्र को मौजूदा दौर में कैसे इस्तेमाल किया जाए? नई जीवनशैली को अपना चुके लोग इससे कैसे फायदा उठा सकते हैं? यही बताती है एएनडी हकसर की नई किताब. य आधुनिक कामसूत्र है.

प्रकाशन गृह पेंग्विन इस किताब को अगले साल फरवरी तक दुनियाभर की किताबों की दुकानों तक पहुंचा देगा. किताब नए जमाने की भागदौड़ में जी रहे लोगों को सेक्स के कामयाब तरीके बताएगी. अखबार संडे टेलिग्राफ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक सेक्स के आसनों और पुराने कामसूत्र के अनुवाद से अलग पॉकेट बुक्स के आकार में छपी यह किताब प्यार और रिश्तों के हर पहलू तक पहुंचने की कोशिश करती है.

इससे पहले जब भी कामसूत्र की बात हुई तो 19वीं सदी में सर रिचर्ड फ्रांसिस बर्टान की किताब का जिक्र ही आया जिसमें तस्वीरें और प्राचीन कामसूत्र का अनुवाद किया गया है. इसकी भाषा भी पुराने जमाने वाली ही है.

हर रोज़ पूरी ऊर्जा के साथ कैसे करें संभोग?

कौन होगा जो हर रोज़ संभोग नहीं करना चाहेगा, लेकिन कई बार ऊर्जा साथ नहीं देती या फिर क्‍लाईमैक्‍स तक पहुंचने में दिक्‍कत आती है। या यूं कहिये कि सेक्‍स की चरम सीमा तक आप रोज़ रोज़ नहीं पहुंच पाते हैं, जिस वजह से रोज संभोग करने का मन नहीं करता। हम यहां बतायेंगे कुछ ऐसी टिप्‍स जिन्‍हें फॉलो करने से आप हर रोज़ पूरी ऊर्जा के साथ संभोग कर सकेंगे। वो भी बिना मूड को खराब किये।

1. कंट्रोल-
कई पुरुषों में संभोग से पहले ही रतिनिष्‍पत्ति की समस्‍या होती है। उनका वीर्य संभोग से पहले ही स्‍खलित हो जाता है। इस वजह से वो संभोग नहीं कर पाते हैं। वैसे यह कोई बीमारी नहीं होती है। यह सिर्फ आपके मूड पर निर्भर करता है। कई बार आप संभोग से पहले ही इतने ज्‍यादा उत्‍तेजित हो जाते हैं कि आपका वीर्य डिस्‍चार्ज हो जाता है। इसके लिये जरूरी है खुद पर कंट्रोल।
अगर आप खुद पर कंट्रोल रखते हैं, तो आप जितनी देर चाहें, उतनी देर संभोग कर सकते हैं। खुद पर कंट्रोल करने के लिये संभोग से आधे घंटे पहले मैथुन कर लें। उसके बाद संभोग के दौरान जैसे ही क्‍लाईमैक्‍स तक पहुंचने वाले हों, वैसे ही रुक जायें। अपने ध्‍यान को दूसरी बातों की ओर ले जायें। अगर आप रुकना नहीं चाहते हैं, तो संभोग करते वक्‍त अपने दिमाग में उन बातों को सोचें जिनसे आपको तनाव हो सकता है। ऐसा करने से आप तुरंत डिस्‍चार्ज नहीं होंगे।

2. फोर प्‍ले-
जितनी ज्‍यादा देर तक आप फोर प्‍ले करेंगे, संभोग का मज़ा उतना ज्‍यादा होगा। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को फोर प्‍ले ज्‍यादा अच्‍छा लगता है। फोर प्‍ले का फायदा भी उन्‍हें ही ज्‍यादा मिलता है। ऐसा इसलिये क्‍योंकि पुरुष तो तीन-चार मिनट के अंदर डिस्‍चार्ज हो सकते हैं, लेकिन महिलाओं को चरम सीमा तक पहुंचने में समय लगता है। ऐसा करके आप अपनी पार्टनर को ज्‍यादा खुश रख सकते हैं।

3. संभोग की गति-

संभोग के वक्‍त अपनी गति को नियंत्रित रखने से आप ज्‍यादा देर तक संभोग कर सकते हैं। जोश में आकर होश खो देने से मज़ा किरकिरा हो सकता है। महिला अथवा पुरुष दोनों में जो भी व्‍यक्ति ऊपर होता है, उसी की जिम्‍मेदारी होती है गति पर नियंत्रण रखने की।

4. पार्टनर की मदद-
कई बार होता है कि पुरुष पहले ही स्‍खलित हो जाते हैं, जिस वजह से उनकी पार्टनर को कई बार निराशा हाथ लगती है। इसलिये बेहतर होगा यदि आप ऊपर की तीन टिप्‍स को अपनाते हुए संभोग करें। ऐसा करने से आपकी पार्टनर आपके साथ-साथ डिस्‍चार्ज होगी और संभोग का मज़ा कई गुना ज्‍यादा होगा।


<< पहले भी लिखा था लिंग पुराण के ही बारे में, मन करे तो  या ये जरुर याद रखियेगा ये १८+ का ही मसाला है..;)
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Saturday, June 8, 2013

गरुण पुराण: मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता ।

आज जहा भी देखो लोग सिर्फ हिन्दू धर्म को छोड़ हिन्दू लोग दुसरे धर्म की ब्याख्या करने लगे है... पर 
शास्त्रों  के अनुसार... ४ वेद और १८  पुराण...जिसमे सबसे खतरनाक मुझे गरुण पुराण लगता है.. हे भगवान .... क्या  लीला है तेरी.... ये सुनना भी कब पड़ता है .. जब जीवन के आधार दाता  .. माँ या बाप हमको छोड़ के चले जाये.... कैसे डेर्वाते है पंडित जी.... मृत्यु एक ऐसा सच है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता ।

रूड़ पुराण वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बन्धित है और सनातन धर्म में मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला माना जाता है। इसलिये सनातन हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद गरुड़ पुराण के श्रवण का प्रावधान है। इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान विष्णु हैं। इसमें भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्म की महिमा के साथ यज्ञ, दान, तप तीर्थ आदि शुभ कर्मों में सर्व साधारणको प्रवृत्त करने के लिये अनेक लौकिक और पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें आयुर्वेद, नीतिसार आदि विषयोंके वर्णनके साथ मृत जीव के अन्तिम समय में किये जाने वाले कृत्यों का विस्तार से निरूपण किया गया है। आत्मज्ञान का विवेचन भी इसका मुख्य विषय है।


अठारह पुराणों में गरुड़महापुराण का अपना एक विशेष महत्व है। इसके अधिष्ठातृदेव भगवान विष्णु है। अतः यह वैष्णव पुराण है। गरूड़ पुराण में विष्णु-भक्ति का विस्तार से वर्णन है। भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों का वर्णन ठीक उसी प्रकार यहां प्राप्त होता है, जिस प्रकार 'श्रीमद्भागवत' में उपलब्ध होता है। आरम्भ में मनु से सृष्टि की उत्पत्ति, ध्रुव चरित्र और बारह आदित्यों की कथा प्राप्त होती है। उसके उपरान्त सूर्य और चन्द्र ग्रहों के मंत्र, शिव-पार्वती मंत्र, इन्द्र से सम्बन्धित मंत्र, सरस्वती के मंत्र और नौ शक्तियों के विषय में विस्तार से बताया गया है। इसके अतिरिक्त इस पुराण में श्राद्ध-तर्पण, मुक्ति के उपायों तथा जीव की गति का विस्तृत वर्णन मिलता है'गरूड़ पुराण' में उन्नीस हजार श्लोक कहे जाते हैं, किन्तु वर्तमान समय में कुल सात हजार श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस पुराण को दो भागों में रखकर देखना चाहिए। पहले भाग में विष्णु भक्ति और उपासना की विधियों का उल्लेख है तथा मृत्यु के उपरान्त प्राय: 'गरूड़ पुराण' के श्रवण का प्रावधान है। दूसरे भाग में प्रेत कल्प का विस्तार से वर्णन करते हुए विभिन्न नरकों में जीव के पड़ने का वृत्तान्त है। इसमें मरने के बाद मनुष्य की क्या गति होती है, उसका किस प्रकार की योनियों में जन्म होता है, प्रेत योनि से मुक्त कैसे पाई जा सकती है, श्राद्ध और पितृ कर्म किस तरह करने चाहिए तथा नरकों के दारूण दुख से कैसे मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन प्राप्त होता है।

कथा एवं वर्ण्य विषय

महर्षि कश्यप के पुत्र पक्षीराज गरुड़ को भगवान विष्णु का वाहन कहा गया है। एक बार गरुड़ ने भगवान विष्णु से मृत्यु के बाद प्राणियों की स्थिति, जीव की यमलोक-यात्रा, विभिन्न कर्मों से प्राप्त होने वाले नरकों, योनियों तथा पापियों की दुर्गति से संबंधित अनेक गूढ़ एवं रहस्ययुक्त प्रश्न पूछे। उस समय भगवान विष्णु ने गरुड़ की जिज्ञासा शांत करते हुए उन्हें जो ज्ञानमय उपदेश दिया था, उसी उपदेश का इस पुराण में विस्तृत विवेचन किया गया है। गरुड़ के माध्यम से ही भगवान विष्णु की श्रीमुख से मृत्यु के उपरांत के गूढ़ तथा परम कल्याणकारी वचन प्रकट हुए थे, इसलिए इस पुराण को ‘गरुड़ पुराण’ कहा गया है। श्री विष्णु द्वारा प्रतिपादित यह पुराण मुख्यतः वैष्णव पुराण है। इस पुराण को 'मुख्य गारुड़ी विद्या' भी कहा गया है। इस पुराण का ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्माजी ने महर्षि वेद व्यास को प्रदान किया था। तत्पश्चात् व्यासजी ने अपने शिष्य सूतजी को तथा सूतजी ने नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषि-मुनियों को प्रदान किया था।

इस पुराण में सबसे पहले पुराण को आरम्भ करने का प्रश्न किया गया है, फ़िर संक्षेप से सृष्टि का वर्णन है। इसके बाद सूर्य आदि की पूजा, पूजा की विधि, दीक्षा विधि, श्राद्ध पूजा नवव्यूह की पूजा विधि, वैष्णव-पंजर, योगाध्याय, विष्णुसहस्त्रनाम कीर्तन, विष्णु ध्यान, सूर्य पूजा, मृत्युंजय पूजा, माला मन्त्र, शिवार्चा गोपालपूजा, त्रैलोक्यमोहन, श्रीधर पूजा, विष्णु-अर्चा पंचतत्व-अर्चा, चक्रार्चा, देवपूजा, न्यास आदि संध्या उपासना दुर्गार्चन, सुरार्चन, महेश्वर पूजा, पवित्रोपण पूजन, मूर्ति-ध्यान, वास्तुमान प्रासाद लक्षण, सर्वदेव-प्रतिष्ठा पृथक-पूजा-विधि, अष्टांगयोग, दानधर्म, प्रायश्चित-विधि, द्वीपेश्वरों और नरकों का वर्णन, सूर्यव्यूह, ज्योतिष, सामुद्रिकशास्त्र, स्वरज्ञान, नूतन-रत्न-परीक्षा, तीर्थ-महात्म्य, गयाधाम का महात्म्य, मन्वन्तर वर्णन, पितरों का उपाख्यान, वर्णधर्म, द्रव्यशुद्धि समर्पण, श्राद्धकर्म, विनायकपूजा, ग्रहयज्ञ आश्रम, जननाशौच, प्रेतशुद्धि, नीतिशास्त्र, व्रतकथायें, सूर्यवंश, सोमवंश, श्रीहरि-अवतार-कथा, रामायण, हरिवंश, भारताख्यान, आयुर्वेदनिदान चिकित्सा द्रव्यगुण निरूपण, रोगनाशाक विष्णुकवच, गरुणकवच, त्रैपुर-मंत्र, प्रश्नचूणामणि, अश्वायुर्वेदकीर्तन, औषधियों के नाम का कीर्तन, व्याकरण का ऊहापोह, छन्दशास्त्र, सदाचार, स्नानविधि, तर्पण, बलिवैश्वदेव, संध्या, पार्णवकर्म, नित्यश्राद्ध, सपिण्डन, धर्मसार, पापों का प्रायश्चित, प्रतिसंक्रम, युगधर्म, कर्मफ़ल योगशास्त्र विष्णुभक्ति श्रीहरि को नमस्कार करने का फ़ल, विष्णुमहिमा, नृसिंहस्तोत्र, विष्णवर्चनस्तोत्र, वेदान्त और सांख्य का सिद्धान्त, ब्रह्मज्ञान, आत्मानन्द, गीतासार आदि का वर्णन है।

मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन है। किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेता है।

* जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है । उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है । पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं ।

* मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं । वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं । वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दांतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं । यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं । उनका मुंह टेढ़ा-मेढ़ा होता है । नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है।

* यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बांधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं । ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं ।

* इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है । वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है । उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। उसको अंधकारमय मार्गसे ले जाते हैं।

* यमलोक . पापी जीव को दो- तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद उसे भयानक यातना देते हैं। यह भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।

* घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।

* जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।

• शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है । वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है । यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है ।

* यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है । इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है । उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है । इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुंचता है । मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर यमराज के घर जाता है।

* इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है - सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति । इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है । ( मरने के बाद क्या होता है , श्री गरुण पुराण कि यह बात -.-

मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है, इसका विस्तृत वर्णन है । )


मृत्यु जीवन का सत्य है लेकिन एक सत्य, मृत्यु के बाद शुरु होता है। इस सच के बारे में, बहुत कम लोग जानते हैं। क्या वाकई, मृत्यु के समय व्यक्ति को कोई दिव्य दृष्टि मिलती है? आखिर मृत्यु के कितने दिनों बाद, आत्मा यमलोक पहुंचती है? गरुण पुराण में, भगवान के वाहन गरुण, श्रीहरि विष्णु से मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति को लेकर प्रश्न उठाते हैं। वह पूछते हैं कि मृत्यु के बाद, आत्मा कहां जाती है? इसका उत्तर भगवान विष्णु ने, गरुण पुराण में दिया है। गरुण पुराण में, मृत्यु के पहले और बाद की स्थिति के बारे में बताया गया है। 

क्या होता है मृत्यु से पहले?

गरुण पुराण के अनुसार, मृत्यु से पहले, मनुष्य की आवाज चली जाती है। जब  अंतिम समय आता है, तो मरने वाले व्यक्ति को दिव्य दृष्टि मिलती है। इस दिव्य दृष्टि के बाद, मनुष्य, सारे संसार को, एक रूप में देखने लगता है। उसकी सारी इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं।
क्या होता है मृत्यु के समय?

गरुण पुराण के अनुसार, मृत्यु के समय 2 यमदूत आते हैं। इनके भय से अंगूठे के बराबर जीव, हा हा की आवाज़ करते हुये, शरीर से बाहर निकलता है। यमराज के दूत, जीवात्मा के गले में पाश बांधकर, उसे यमलोक ले जाते हैं। इसके बाद, जीव का सूक्ष्म शरीर, यमदूतों से डरता हुआ आगे बढ़ता है।
कैसा है मृत्यु का मार्ग?

मृत्यु का रास्ता अंधेरा और गर्म बालू से भरा होता है। यमलोक पहुंचने पर, पापी जीव को यातना देने के बाद, यमराज के कहने पर, उसे आकाश मार्ग से घर छोड़ दिया जाता है। घर आकर वह जीवात्मा, अपने शरीर में, फिर से घुसना चाहती है। लेकिन यमदूत के पाश से मुक्त नहीं हो पाती है। पिंडदान के बाद भी, वह जीवात्मा तृप्त नहीं हो पाती है। इस तरह भूख प्यास से बेचैन आत्मा, फिर यमलोक आ जाती है। जब तक उस आत्मा के वंशज, उसका पिंडदान नहीं करते, तो आत्मा दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय यातना भोगने के बाद, उसे विभिन्न योनियों में नया शरीर मिलता है। इसीलिये मनुष्य की मृत्यु के 10 दिन तक, पिंडदान ज़रुर करना चाहिए। दसवें दिन पिंडदान से, सूक्ष्म शरीर को चलने की शक्ति मिलती है। मृत्यु के 13वें दिन फिर यमदूत उसे पकड़ लेते हैं। उसके बाद शुरू होती है वैतरणी नदी को पार करने की यात्रा। वैतरणी नदी को पार करने में पूरे 47 दिन का समय लगता है। उसके बाद जीवात्मा यमलोक पहुंच जाती है। 

क्या है गरुण पुराण?
गरुण पुराण के अधिष्ठाता भगवान विष्णु हैं। इसमें 19 हजार श्लोक थे, लेकिन अब सिर्फ 7 हज़ार श्लोक ही हैं। गरुण पुराण 2 भागों में है। पहले भाग में श्रीविष्णु की भक्ति, उनके 24 अवतार की कथा और पूजा विधि के बारे में बताया गया है। दूसरे भाग में, प्रेत कल्प और कई तरह के नरक के वर्णन है। मृत्यु के बाद मनुष्य की क्या गति होती है? उसे किन-किन योनियों में जन्म लेना पड़ता है? क्या प्रेत योनि से मुक्ति पाई जा सकती है? श्राद्ध और पिंडदान कैसे किया जाता है? श्राद्ध के कौन-कौन से तीर्थ हैं? मोक्ष कैसे मिल सकता है? इस बारे में विस्तार से वर्णन है।

गरुण पुराण की कथा
महर्षि कश्यप के पुत्र पक्षीराज गरुड़ भगवान विष्णु के वाहन हैं। एक बार गरुड़ ने भगवान विष्णु से मृत्यु के बाद जीवात्मा की स्थिति के बारे में प्रश्न किया था। तब विष्णु जी ने, मृत्यु के बाद की जीवात्मा की गति के बारे में, गरुण को बताया था। इसीलिए इसका नाम गरुण पुराण पड़ा।

गरुण पुराण का विषय
गरुण पुराण की शुरुआत में सृष्टि के बनने की कहानी है। इसके बाद सूर्य की पूजा की विधि, दीक्षा विधि, श्राद्ध पूजा, नवव्यूह की पूजा विधि के बारे में बताया गया है। साथ ही साथ भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार और निष्काम कर्म की महिमा भी बताई गयी है। श्राद्ध में गरुण पुराण के पाठ से आत्मा को मुक्ति और मोक्ष मिलता है। इसीलिये श्राद्ध के 15 दिनों में जगह जगह गरुण पुराण के पाठ का आयोजन होता है। अपने पितरों और पूर्वजों को मुक्ति दिलाने के  लिये, ज़रूर पढ़ें गरुण पुराण।
गरुड़ पुराण में वर्णन है 36 नर्क का,

हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में 36 तरह के मुख्य नर्कों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग कर्मों के लिए इन नर्कों में सजा का प्रावधान भी माना गया है। गरूड़ पुराण, अग्रिपुराण, कठोपनिषद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। आज हम आपको उन नर्कों के बारे में संक्षिप्त रूप से बता रहे हैं- :


1. महावीचि- यह नर्क पूरी तरह रक्त यानी खून से भरा है और इसमें लोहे के बड़े-बड़े कांटे हैं। जो लोग गाय की हत्या करते हैं, उन्हें इस नर्क में यातना भुगतनी पड़ती है।

2. कुंभीपाक– इस नर्क की जमीन गरम बालू और अंगारों से भरी है। जो लोग किसी की भूमि हड़पते हैं या ब्राह्मण की हत्या करते हैं। उन्हें इस नर्क में आना पड़ता है।

3. रौरव- यहां लोहे के जलते हुए तीर होते हैं। जो लोग झूठी गवाही देते हैं उन्हें इन तीरों से बींधा जाता है।

4. मंजूष- यह जलते हुए लोहे जैसी धरती वाला नर्क है। यहां उनको सजा मिलती है, जो दूसरों को निरपराध बंदी बनाते हैं या कैद में रखते हैं।

5. अप्रतिष्ठ- यह पीब, मूत्र और उल्टी से भरा नर्क है। यहां वे लोग यातना पाते हैं, जो ब्राह्मणों को पीड़ा देते हैं या सताते हैं।

6. विलेपक- यह लाख की आग से जलने वाला नर्क है। यहां उन ब्राह्मणों को जलाया जाता है, जो शराब पीते हैं।

7. महाप्रभ- इस नर्क में एक बहुत बड़ा लोहे का नुकीला तीर है। जो लोग पति-पत्नी में फूट डालते हैं, पति-पत्नी के रिश्ते तुड़वाते हैं वे यहां इस तीर में पिरोए जाते हैं।

8. जयंती- यहां जीवात्माओं को लोहे की बड़ी चट्टान के नीचे दबाकर सजा दी जाती है। जो लोग पराई औरतों के साथ संभोग करते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।

9. शाल्मलि- यह जलते हुए कांटों से भरा नर्क है। जो औरत कई पुरुषों से संभोग करती है व जो व्यक्ति हमेशा झूठ व कड़वा बोलता है, दूसरों के धन और स्त्री पर नजर डालता है। पुत्रवधू, पुत्री, बहन आदि से शारीरिक संबंध बनाता है व वृद्ध की हत्या करता है, ऐसे लोगों को यहां लाया जाता है।

10. महारौरव- इस नर्क में चारों तरफ आग ही आग होती है। जैसे किसी भट्टी में होती है। जो लोग दूसरों के घर, खेत, खलिहान या गोदाम में आग लगाते हैं, उन्हें यहां जलाया जाता है।

11. तामिस्र- इस नर्क में लोहे की पट्टियों और मुग्दरों से पिटाई की जाती है। यहां चोरों को यातना मिलती है।

12. महातामिस्र- इस नर्क में जौंके भरी हुई हैं, जो इंसान का रक्त चूसती हैं। माता, पिता और मित्र की हत्या करने वाले को इस नर्क में जाना पड़ता है।

13. असिपत्रवन- यह नर्क एक जंगल की तरह है, जिसके पेड़ों पर पत्तों की जगह तीखी तलवारें और खड्ग हैं। मित्रों से दगा करने वाला इंसान इस नर्क में गिराया जाता है।

14. करम्भ बालुका- यह नर्क एक कुएं की तरह है, जिसमें गर्म बालू रेत और अंगारे भरे हुए हैं। जो लोग दूसरे जीवों को जलाते हैं, वे इस कुएं में गिराए जाते हैं।

15. काकोल- यह पीब और कीड़ों से भरा नर्क है। जो लोग छुप-छुप कर अकेले ही मिठाई खाते हैं, दूसरों को नहीं देते, वे इस नर्क में लाए जाते हैं।

16. कुड्मल- यह मूत्र, पीब और विष्ठा (उल्टी) से भरा है। जो लोग दैनिक जीवन में पंचयज्ञों ( ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) का अनुष्ठान नहीं करते वे इस नर्क में आते हैं।

17. महाभीम- यह नर्क बदबूदार मांस और रक्त से भरा है। जो लोग ऐसी चीजें खाते हैं, जिनका शास्त्रों ने निषेध बताया है, वो लोग इस नर्क में गिरते हैं।

18. महावट- इस नर्क में मुर्दे और कीड़े भरे हैं, जो लोग अपनी लड़कियों को बेचते हैं, वे यहां लाए जाते हैं।

19. तिलपाक- यहां दूसरों को सताने, पीड़ा देने वाले लोगों को तिल की तरह पेरा जाता है। जैसे तिल का तेल निकाला जाता है, ठीक उसी तरह।

20. तैलपाक- इस नर्क में खौलता हुआ तेल भरा है। जो लोग मित्रों या शरणागतों की हत्या करते हैं, वे यहां इस तेल में तले जाते हैं।

21. वज्रकपाट- यहां वज्रों की पूरी श्रंखला बनी है। जो लोग दूध बेचने का व्यवसाय करते हैं, वे यहां प्रताड़ना पाते हैं।

22. निरुच्छवास- इस नर्क में अंधेरा है, यहां वायु नहीं होती। जो लोग दिए जा रहे दान में विघ्न डालते हैं वे यहां फेंके जाते हैं।

23. अंगारोपच्य- यह नर्क अंगारों से भरा है। जो लोग दान देने का वादा करके भी दान देने से मुकर जाते हैं। वे यहां जलाए जाते हैं।

24. महापायी- यह नर्क हर तरह की गंदगी से भरा है। हमेशा असत्य बोलने वाले यहां औंधे मुंह गिराए जाते हैं।

25. महाज्वाल- इस नर्क में हर तरफ आग है। जो लोग हमेशा ही पाप में लगे रहते हैं वे इसमें जलाए जाते हैं।

26. गुड़पाक- यहां चारों ओर गरम गुड़ के कुंड हैं। जो लोग समाज में वर्ण संकरता फैलाते हैं, वे इस गुड़ में पकाए जाते हैं।

27. क्रकच- इस नर्क में तीखे आरे लगे हैं। जो लोग ऐसी महिलाओं से संभोग करते हैं, जिसके लिए शास्त्रों ने निषेध किया है, वे लोग इन्हीं आरों से चीरे जाते हैं।

28. क्षुरधार- यह नर्क तीखे उस्तरों से भरा है। ब्राह्मणों की भूमि हड़पने वाले यहां काटे जाते हैं।

29. अम्बरीष- यहां प्रलय अग्रि के समान आग जलती है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, वे इस आग में जलाए जाते हैं।

30. वज्रकुठार- यह नर्क वज्रों से भरा है। जो लोग पेड़ काटते हैं वे यहां लंबे समय तक वज्रों से पीटे जाते हैं।

31. परिताप- यह नर्क भी आग से जल रहा है। जो लोग दूसरों को जहर देते हैं या मधु (शहद) की चोरी करते हैं, वे यहां जलाए जाते हैं।

32. काल सूत्र- यह वज्र के समान सूत से बना है। जो लोग दूसरों की खेती नष्ट करते हैं। वे यहां सजा पाते हैं।

33. कश्मल- यह नर्क नाक और मुंह की गंदगी से भरा होता है। जो लोग मांसाहार में ज्यादा रुचि रखते हैं, वे यहां गिराए जाते हैं।

34. उग्रगंध- यह लार, मूत्र, विष्ठा और अन्य गंदगियों से भरा नर्क है। जो लोग पितरों को पिंडदान नहीं करते, वे यहां लाए जाते हैं।

35. दुर्धर- यह नर्क जौक और बिच्छुओं से भरा है। सूदखोर और ब्याज का धंधा करने वाले इस नर्क में भेजे जाते हैं।

36. वज्रमहापीड- यहां लोहे के भारी वज्र से मारा जाता है। जो लोग सोने की चोरी करते हैं, किसी प्राणी की हत्या कर उसे खाते हैं, दूसरों के आसन, शय्या और वस्त्र चुराते हैं, जो दूसरों के फल चुराते हैं, धर्म को नहीं मानते ऐसे सारे लोग यहां लाए जाते हैं।

हे प्रभु इन मूर्खो को ज्ञान दो... हमारे ही धर्म में बू सी बाते लिखी है... जो एक जीवन में सफल होने के मंत्र है... ये मुर्ख अपने धर्म को छोड़ दुसरे के धर्म में घुसते है.... ज्ञान दे प्रभु... त्राहि माम.... 








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Monday, December 31, 2012

कहीं मेरा लिंग छोटा तो नहीं ?

18 + के लिए उचित

"कहीं मेरा लिंग छोटा तो नहीं?"  ये सवाल हर पुरुष कभी न कभी अपने आप से ज़रूर पूछता है।

१० साल हो गए शादी को, बस दिमाक हर पल येही सोचता, समझ में ही नए.. इस लिए मै अपनी पत्नी से हमेशा कुछ न कुछ खुरापात करता, बस येही झगडे की वहज अधिकतर समय ऐसे ही मिल जाता, थे तो बचपने के हरामी न, बी ग्रेड की मूवी तो बचपने में देखते थे, अब इन्टरनेट का युग है, हर समय यू ट्यूब में तैराकी करता तो आज में एक चैप्टर मिल गया औरत में सेक्स की इच्छा जगाने के तरीके | ये है लिंक : Female Frigidity Treatment | Sex Education Short Movie   अब तो ज्यादा ही विडियो अपडेटेड, आप को जरुरत है तो देख लीजियेगा, हम कोनो फ़ोर्स नहीं कर रहे है  हा तो मै बात कर रहा था बड़े लिंग की.. बचपन से मुझे शौक था लंगोट पहनने का, घाट किनारे वाली से शादी हुई तो लगा की अब तो सपना साकार.. लेकिन उसको तो फ्रेंची चाहिए था, पूछता उससे को कहती फ्रेंची में फुला फुला रहता है, फिर लग गया खोज में फुला फुला का रहस्य.. 
बचपन से बनारस के लडको का ये क्रेज रहा.. क्यों की शहर में कम से कम १० गुप्त रोग के डाक्टर तो हयिये है उसमे से तो टकसाल के सामने वाले राना डाक्टर... प्रचार भी उनका अजीब था " शादी से पहले या शादी के बाद ;) रोगी का नाम पता भी गुप्त रखा जायेगा.. अगर आप ट्रेन से दिल्ही या बम्बई जाये तो अमरोहा वाले हासमी दवाखाना: अभी का लिंक ये है अरे बाप रे.. उस समय लगता था दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी यही है , यो इस समस्या को समझने की कोशिस की , तो शुरुवात 

बड़ा लिंग: क्या महिलाओं की पसंद होता है? इसका अब विडियो भी है  ;)
हाल की रिसर्च छोटे आकार वालों के लिए बुरी खबर बनकर आई है- इस रिसर्च के निष्कर्ष के अनुसार महिलाओं को लम्बा, मजबूत लिंग ज्यादा पसंद आता है। तो किस पर भरोसा किया जाये? क्या टेक्नीक ज्यादा ज़रूरी है? मोटाई ज़रूरी है या लम्बाई? एक बात तो तय है- महिलाओं से ज्यादा लिंग के आकार के बारे में खुद पुरुष चिंतित रहते हैं।

हाल ही के एक ऑस्ट्रालिई अध्यान के अनुसार महिलाएं गठीले शरीर और लम्बे लिंग वाले पुरुषों के लिए आकर्षण महसूस करती हैं। रिसर्च में 13 इंच तक के लिंग दिखाए गए- लेकिन महिलाओं इससे बड़े आकार के लिए भी आकर्षित थी। "आकर्षण के मापदंड पर हमारा ग्राफ 13 इंच के आकार पर भी नीचे नहीं गया", एक रिसर्चर ने बताया। पढ़िए हमारा लेख - (प्रेस में सेक्स: साइज़ मैटर्स)

लेकिन ये अध्यन सिर्फ ऑस्ट्रेलिया की महिलाओं पर ही किया गया था। क्या केवल उनकी राय के आधार पर हम किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं? इतना ही नहीं, दिखाए गए शरीर कंप्यूटर एनिमेटेड थे, जिनका चेहरा या बाल नहीं थे। यदि इन् बुतों की बजाय ज़रा सोचिये की आकर्षक आँखों और घुंगराले बालों वाला असली पुरुष हो तो क्या उसके आकर्षण का आधार केवल लिंग का आकार ही होगा?

लम्बाई, मोटाई या दोनों?
क्रोएशिया में की गयी एक स्टडी में महिलाओं से बड़े लिंग की अहेमियत के बारे में पुछा गया। और रिजल्ट जानकर पुरुषों को निश्चित रूप से ख़ुशी होगी, और शायद महिलाओं को आश्चर्य नहीं होगा। आधे से ज्यादा महिलाओं ने कहा की लम्बाई और मोटाई दोनों ही ख़ास मेटर नहीं करती। केवल 18 फीसदी महिलाओं ने कहा की बड़ा आकार अधिक आकर्षक है।

लेकिन इसमें भी एक संदेह है। महिलाओं से लिंग के आकार के बारे में सच कहलवाना उतना आसान नहीं। अपनी असली पसंद बताने की बजाय वो कह सकती है की लिंग का आकार कोई महत्व नहीं रखता। वो अपने आप को सेंसर कर लेती हैं।

इसीलिए ऑस्ट्रेलियाई रेसेअर्चेर अपने अध्यान को सही और अलग मानते हैं। उन्होंने महिलों से सीधे उनकी राय नहीं पूची बल्कि एनिमेटेड तस्वीरों के ज़रिये उनसे जानने की कोशिश की, की उन्हें क्या पसंद है। उनके अनुसार इस तरीके से उन्हें असली पसंद का पता चल पाया।

ढीला या सख्त?
एक और सवाल जो ऑस्ट्रलियाई रिसर्च में सामने आया वो ये था की महिलाओं को ढीला लिंग को रेटिंग देने को कहा गया। जिन लोगों ने लिंग देखा है, वो ये जानते हैं की ढीला से सख्त होने की प्रक्रिया में लिंग का आकार काफी बदल जाता है और इसलिए ढीला लिंग को देखकर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है की सख्त अवस्था में लिंग कैसा और कितना बड़ा दिखेगा? तो क्या सेक्सुअल आकर्षण की रेटिंग देने के लिए सिर्फ ढीला लिंग की तस्वीर काफी है? महिलाओं के लिए ज्यादा आकर्षक क्या है? वीडियो देखने

एक और बात, बहुत सदियों पहले लोग गुफाओं में रहते थे और कपडे नहीं पहनते थे तब बात कुछ और रही होगी, लेकिन आज के युग में कितनी महिलाएं अपने होने वाली साथी के लिंग को देखकर रिश्ते की पहेल करती हैं?
असल में बात आकार की नहीं है, ऑस्ट्रलियाई रिसर्च का कहना है। सबसे आकर्षक वो पुरुष होते हैं जो सम्पूर्ण पैकेज हों: लम्बे, गठीले शरीर और बड़े लिंग के आकार वाले।

संतुष्टि!
लुक्स को छोड़कर ज़रा कुछ और बात की जाये- क्या बड़े लिंग का अर्थ है अधिक संतुष्टि? बहुत से अध्यानो के अनुसार ये सही नहीं है। योनि की बनावट किसी भी आकार के लिंग के लिए उपयुक्त ही होती है, तो लम्बाई या मोटाई का असर असल में नहीं पड़ना चाहिए। लेकिन एक अमरीकी अध्यन के अनुसार मोटा लिंग क्लाइटोरिस को बेहतर स्तिमुलेट करने में सक्षम है।

इस स्टडी में 90 फीसदी महिलाओं ने लम्बाई की बजाय मोटाई को अधिक मेहेत्वपूर्ण मन, क्यूंकि उनके अनुसार मोटा लिंग से उन्हें ज्यादा अच्छा एहसास हुआ। किन्तु आनंद की अनुभूति का ये नजरिया असल में शारीरिक संतुष्टि और उत्तेजना से अलग हो सकता है। तो इस आधार पर  निष्कर्ष निकलना सही नहीं।

दिमाग का फितूर
और कुछ हो न हो, इस बात के ठोस सबूत हैं की महिलाओं से ज्यादा लिंग के आकार का महत्व पुरुषों के दिमाग पर हावी रहता है. कई अध्यन इस बारे में दर्शाते हैं. अब तक की सबसे बड़ी रेसेअर्चोन में से एक ये दर्शाती है की 85 फीसदी महिलाएं अपने पुरुष साथी के लिंग के आकार से संतुष्ट थी। जबकि अपने लिंग के आकार से संतुष्ट पुरुषों की संख्या 55 फीसदी ही थी। तो आखिर ये शंका कहाँ से उत्पन्न होती है? मीडिया, खासकर पोर्न शायद ये सन्देश देता है की पुरुषों की असली मर्दानगी बड़े लिंग से ही है। और पोर्न विडियो बड़े लिंग के बारे में महिलाओं की बनावटी प्रतिक्रिया इस असुरक्षा को और हवा देती है।

और क्यूंकि ये सुरक्षा बहुत से पुरुषों के दिमाग में में घर करती रही है, लिंग के आकार को बढाने वाले उत्पादों का बाज़ार भी निरंतर गर्म होता जा रहा है- बावजूद इसके की असल में इन् उत्पादों से कोई असर नहीं पड़ता। तो क्या साइज़ सचमुच मेटर करती है? जी हाँ- पुरुषों के लिए। महिलाएं अपने पुरुषों के लिंग के आकार को लेकर सहज ही रहती हैं।

लिंग आकार और लंबाई
लिंग कई आकार और लंबाई के होते हैं। और वे सभी अलग-अलग दिखते हैं: सीधा, टेढ़ा, लंबा, मोटा, पतला, खतना किया हुआ, बिना खतना के। इनमें से कोई किसी अन्य से बेहतर नहीं होता है। लिंग किसी भी एक तरफ़ झुका या तिरछा हो सकता है।

बिना तनी हुई अवस्था में अक्सर लिंग की लंबाई 6 से लेकर 13 से.मी. तक हो सकती है। तना हुआ लिंग लगभग 12 से 21 से.मी. तक लंबा हो सकता है। बड़े लिंगों की तुलना में छोटे लिंग तनाव में आने पर अधिक बढ़ते हैं।

कुछ लड़के अपने या दूसरे लोगों के लिंगों के आकार को लेकर काफी मज़ाक करते हैं। अक्सर ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे अपने-आपको असुरक्षित महसूस करते हैं, या वे अपने को बलवान जताना चाहते हैं, या अपने आपको ज़्यादा जानकार दिखाना चाहते हैं।

क्या आकार से कुछ फर्क पड़ता है?
यदि आपका लिंग बड़ा है, तो ज़रूरी नहीं कि आप अच्छे प्रेमी बन जाते हैं, और इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप बेहतर सेक्स कर सकते हैं।

लड़कियां या महिलाएं सेक्स से पहले की जाने वाली छेड़छाड़ (फोरप्ले) और रिश्तों की संतुष्टि को भी अपने साथी के लिंग के आकार जितना ही महत्व देती हैं।

क्या आप लिंग को बड़ा या मोटा करवा सकते हैं?
ऐसी कोई गैर-शल्य (बिना ऑपरेशन वाली) तकनीक नहीं है जिससे किसी लिंग को स्थायी रूप से बड़ा बना सकें। लिंग बढ़ाने के दूसरे तरीके (उत्पाद) जैसे कि गोलियां, वजन और खींचने वाले उपकरण अक्सर काफी समय के लिए कारगर नहीं होते हैं। सबसे बुरी बात तो यह है कि वे आपकी सेहत के लिए काफी खतरनाक हो सकते हैं।

क्या आप किसी व्यक्ति के हाथों और पैरों के आकार से उनके लिंग की लंबाई बता सकते हैं?
नहीं, जूते के बड़े आकार या बड़े हाथ होने का लिंग के बड़े होने से कोई संबंध नहीं है। 

क्या कुछ जातियों या प्रदेशों के लोगों (एथ्निक समूह) के लिंग दूसरों से बड़े होते हैं?
यह साबित करने के लिए ऐसे कोई पक्के सबूत नहीं हैं कि कुछ जातियों (एथ्निक समूह ) के सदस्यों के लिंग दूसरों से बड़े होते हैं।

हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे कुछ संगठनों ने पुरुषों के तने हुए औसत लिंग के आकार में थोड़ी भिन्नता बताते हुए कहा है किः

    अफ्रीकी मूल के पुरुषों का लिंग कुछ बड़ा और मोटा होता है
    यूरोपीय मूल के पुरुषों का लिंग मध्यम आकार का होता है
    एशियाई मूल के के पुरुषों का लिंग कुछ पतला और छोटा होता है

सब लिखने पड़ने के बाद यही भुझाया की पेट का फैट कम करिएः ज्यादा भारी भरकम पेट से पेनिस (लिंग) छोटा लगने लगता है। भले ही पेनिस (लिंग) बड़ा भी है लेकिन आपके भारी भरकम पेट के सामने वह छोटा ही नजर आएगा। इसलिए पेट के फैट को कम करिए। 

लेकिन इतना उपर से निचे आप पड़े और आप के काम की सही बात न मिले तो आप तो ...;) तो कुछ दिखा है इन्टरनेट पर तो आप से साँझा कर रहा हु.. 

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