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Thursday, June 18, 2015

'मोहल्ला अस्सी'

काशी नाथ सिंह के 'उपन्यास' पर आधारित फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

अभी मिडिया में शोर है की मशहूर लेखक काशी नाथ सिंह के 'उपन्यास' पर आधारित और वाराणसी की 
पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' इसी वर्ष अक्टूबर-नवंबर में रिलीज़ होगी.. "सन्नी देओल फिल्म में एक गरीब ब्राह्मण की भूमिका में हैं, जो संस्कृत के शिक्षक हैं. वह बनारस आने वाले विदेशियों और यहां घाटों पर उनके 'गांजा-भांग' पीने-खाने से दुखी हैं. बनारस को हम पवित्र मानते हैं, लेकिन ऐसा विदेशी पर्यटकों के साथ नहीं है."
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Saturday, May 9, 2015

मुंबई-दिल्ली-वाराणसी

 ९ मई २०१५ (शनिवार ) -अब यात्रा समाप्ति और घर वापसी 

अब मुंबई के बाद दिल्ली के बारी थी, मन में एक सपना था.. माता जी को भारत के बेहतरीन तस्वीर दिखाई जाय इस लिए माता जी के लिए मुंबई से दिल्ली के लिए एयर इंडिया के विमान 809 जो मुंबई राची वाया दिल्ली से यात्रा का प्रोग्राम बनाया था,घर से एअरपोर्ट के लिए मुंबई में "सवारी" नामक कंपनी है तो स्थानिय स्तर पर टैक्सी उपलब्ध कराती है तो मुंबई एअरपोर्ट जाने के लिए और दिल्ली में
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Thursday, May 7, 2015

मुंबई दर्शन

मुम्बई दर्शन (मुम्बई भ्रमण) ८ मई २०१५- शुक्रवार ..(टैक्सी के द्वारा) 

आज का प्रोग्राम था मुम्बई दर्शन तो सुबह ही नहा धो कर तैयार हो गए और १० बजे टैक्सी आने वाली थी खैर पूरा मुंबई घुमने का सोच रखा था लेकिन माता जी के लिए पहले सिद्धि- विनायक मंदिर और मुम्बा देवी था, तो हम माता जी के ले मामा जी और मामी जी के साथ चल पड़े मुंबई दर्शन के लिए हमारी टैक्सी निकल पड़ी भयंदर से मुंबई सेंट्रल वाया.

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Wednesday, May 6, 2015

मुंबई दर्शन

(६ मई २०१५- बुधवार, यात्रा का नौवा दिन)
आज नौ दिन सिर्फ अम्मा के साथ, शायद अपने होसो हवास में ४२ साल की इस उम्र में पहली बार, जो इतना समय बिताया माँ के संग, मन उदास हो चूका था की अब ये यात्रा ख़त्म होने के कगार पर, मेरी हालत ऐसे ही, जैसे किसी मुजरिम को फासी की सजा.. कैसे बीत गया ये नौ दिन, मै अपने को तो एकदम बच्चा ही समझ रहा था क्यों की माँ थी न मेरे पास, खैर अब तो चलना ही था, तो अम्मा को ले चल पड़े द्वारका स्टेशन, अगली ट्रेन जो थी मुंबई की .. उदास मन आज लगा की भगवान भी कोई चीज है.. 
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Tuesday, May 5, 2015

द्वारकाधीश मंदिर

(५ मई २०१५-मंगलवार, तीर्थ यात्रा का आठवा दिन) : यह पवित्र नगरी कई मायनों में अति महत्त्वपूर्ण है जैसे हिन्दू धर्म के मुख्य चार धामों में से एक, हिन्दू पुराणों के अनुसार सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में से एक तथा आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों दिशाओं में स्थापित मठों में से एक श्री शारदा मठ यहीं पर स्थित है. यह नगर भगवान श्री विष्णु के १०८ दिव्य देसम में से भी एक है. हिन्दू पुराणों के अनुसार द्वारका सात मोक्षदायी तथा अति पवित्र नगरों में से एक है. गरुड़ पुराण के अनुसार- 

अयोध्या,मथुरा, माया, कासी, कांची अवंतिका,
पूरी, द्वारावती चैव सप्तयिता मोक्षदायिकाः

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नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

(५ मई २०१५-मंगलवार, तीर्थ यात्रा का आठवा दिन) ४ मई शाम को चल दिए सोमनाथ - द्वारका ट्रेन # 19251 SMNH OKHA EXP दुरी 408 किलो मीटर, रात में माता जी खाना खा कर सो चुकी थी.. तो हम भी गूगल बाबा के मदत से समझने लगे क्या है.. द्वारिका 
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Monday, May 4, 2015

सोमनाथ मंदिर

सोमनाथ मंदिर, प्रभास पतन, वेरावल, सौराष्ट्र, गुजरात

(४ मई २०१५-सोमवार, तीर्थ यात्रा का सातवा दिन) निर्धारित समय रात के १० बजे अहमदाबाद से हमारी ट्रेन खुल चुकी थी... ट्रेन में हमारा बोगी भी करीब खाली ही था, बोगी तो हमारी वतानुकिलित थी लेकिन गर्मी का एहसास ही था , १० बजे खाना खा लिया, माता जी बिस्तर पर, नींद नहीं आ रही थी.. तो लगे वेद पुराणों के बारे में चर्चा करने.. बात करते करते रात का १ बज गया ... फिर सो ही गए.. सुबह माता जी ने जगाया देखा सोमनाथ आ गयल.. "अम्मा हम लोग से वेरावल उतरे के हव .. उठ.. पाहिले कहा पहुचल ट्रेन, पूछ ताछ करने पर पता चला की अभी ट्रेन वेरावल से एक स्टेशन पहले "चोर्वाद रोड" क्रास की है करीब ६.३० तक पहुच जाएगी .. बोगी पूरी ही खाली हो चुकी थी, १५ मिनट का समय बाकी था तो सामान ले गेट पर आ गए.. २० मिनट बाद ६.४० पर हम पहुच ही गए वेरावल स्टेशन .. कोई कुली भी नहीं था वहा तो सारा सामान उठाकर प्लेटफोर्म ब्रिज क्रॉस कर के बाहर निकले
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Sunday, May 3, 2015

अहमदाबाद

(३ मई २०१५ ) २ मई की शाम पूना से अहमदाबाद रात्रि ९ बजे की Train No : 12298, दुरी ६६५ किलो मीटर,
अहमदाबाद यानी गुजरात की राजधानी। भीड़ भाड़ वाला अतिव्यस्त शहर. ३ मई की सुबह 0६:१५ पर अहमदाबाद पहुच ही गए, मुख्य रेलवे स्टेशन अहमदाबाद जंक्शन को यहां लोग कालूपुरा भी कहते हैं, जैसे बनारस के मुख्य स्टेशन को कैंट कहा जाता है।
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फोटो गैलरी

फोटो गैलरी  

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Saturday, May 2, 2015

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग

२ मई २०१५ -शनिवार, तीर्थ यात्रा का छटवा दिन
औरंगाबाद-श्री भीमशंकर
तो सुबह ५ बजे हम ही उठ गए.. क्यों की आज की यात्रा लम्बी थी औरंगाबाद से भीमा शंकर, सुबह ९ बजे भीमशंकर के लिए प्रस्थान करना था, क्यों की दुरी–२८५ किलो मीटर थी, अम्मा अभी सो रही थी, क्यों की कल की औरंगाबाद की यात्रा से थक चुकी थी, सुबह ही २ चाय बोल दिया, और कमरे के बाहर एक सिगरेट जला कर टहलने लगा, २० मिनट के बाद चाय भी आ गया कमरे में, ६ बज चूका था, तो अम्मा को जगाया, ब्रश कर अम्मा चाय पि.. गयी बाथरूम तो मै लग गया अपने सामान की पैकिंग में, क्यों की ६ दिन का कपडा धुलवा दिया था, तो उसकी पैकिंग, तब तक अम्मा नहा धो के रेडी.. फिर हम भी तैयार हो लिए नहा धो कर, अम्मा भी अपना पूजा पाठ कर सामान पैक कर चुकी थी.. वैसे भीमा शंकर में पूजा का समय ३ बजे से ५ बजे तक सोच रखा था बिना भीमा शंकर के पूजा के अम्मा कुछ खाती नहीं तो, बाहर जा कर महारास्ट्र का प्रसिद्ध श्रीखंड ले लिया, कब तक अम्मा भूखे रहती भीमाशंकर मंदिर महाराष्ट्र के भोरगिरि गांव, जो की खेड़ तालुका से ५० कि.मि. उत्तर-पश्चिम तथा पुणे से ११० कि.मी. में स्थित है। यह पश्चिमी घाट के सह्याद्रि पर्वत पर ३२५० फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहीं से भीमा नदी भी निकलती है जो की दक्षिण पश्चिम दिशा में बहती हुई आंध्रप्रदेश के रायचूर जिले में कृष्णा नदी से जा मिलती है। यहां भगवान शिव के भारत में पाए जाने वाले बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग है, तब तो यात्रा में ४ से ५ घंटे तो लगना ही था, अब ९.२० पर अपनी टैक्सी भी आ गयी, तो टैक्सी में सामान रख होटल से बिदा लिए और अपनी टैक्सी से चल पड़े माता जी को ले भीमा शंकर के दर्शन के लिए हमारा मार्ग था औरंगाबाद-मंचर-शिनोली-घोडगांव होते हुवे भीमा शंकर के लिए
   
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Friday, May 1, 2015

औरंगाबाद दर्शन

(१ मई २०१५) अब आगे की यात्रा में हम पहुचे एलोरा की विश्वप्रसिद्ध गुफाओ के देखने.घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से कुछ ५०० मीटर की दुरी पर एलोरा की गुफाएं स्थित हैं. यूनेस्को विश्व विरासत स्थल (Unesco World Heritage Site) का दर्जा प्राप्त है. वस्तुतः ये गुफा मंदिरों का एक समूह है जिसमें हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों के मन्दिर तथा मूर्तियाँ स्थित हैं.एलोरा में कुल ३४ गुफाएं हैं जिनमें से क्रमांक १ से १२ गुफाएं बौद्ध धर्म की हैं, अगली १६ गुफाएं हिन्दू धर्म से सम्बन्धित हैं तथा क्रमांक ३० से ३४ गुफाएं जैन धर्म का प्रतिनिधित्व करती हैं. ये गुफाएं ५०० -७०० ए.डी. में राष्ट्रकूट राजाओं ने बनवाई थीं.

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घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन

१ मई २०१५ (शुक्रवार), तीर्थ यात्रा का पाचवा दिन

औरंगाबाद- श्री घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (२५ किलो मीटर) 

*छोटे भ्राता संजीव के जन्मदिन की विशेस पूजा श्री घुश्मेश्वर में

*दर्शन पूजा का समय सुबह ९ बजे से १२ बजे तक

*२-५ बजे तक अजंता एलोरा गुफा घूमघाम

तो हम लोग भी ८ बजे नहा धो कर निचे उतर गए थे टैक्सी के इंतजार में मैनेजर ने सलाह दी की घ्रश्नेश्वर, परली वैजनाथ और औंढा नागनाथ यह तीनों ज्योतिर्लिंग क्षेत्र एक ही मार्ग में होने के कारण एक साथ ही इन तीनों क्षेतों कि यात्रा कि जा सकती है लेकिन ये प्लान में नहीं था ..खैर १५ मिनट बाद टैक्सी भी आ गयी तो चल पड़े माता जी को ले औरंगाबाद के ही समीप स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर तथा एलोरा की प्रसिद्द गुफाओं के दर्शन कराने के लिए वैसे औरंगाबाद बस स्टेंड से वेरुल के लिए भारी मात्र में एस. टी. बसें उपलब्ध हैं. औरंगाबाद में मध्यवर्ती बस स्थानक से वेरुल ट्रिप (घ्रश्नेश्वर, एलोरा, दौलताबाद, खुलताबाद, भद्र मारुती, पैठन दर्शन ) के लिए सुबह ७.३० से प्रारंभ होने वाली बस कि सुविधा गाइड के साथ उपलब्ध है जो कि शाम ५ बजे वापस लौटती है.

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Thursday, April 30, 2015

शनि मंदिर, शिंगणापुर

३० अप्रैल २०१५ (गुरुवार ), तीर्थ यात्रा का चोथा दिन 

तो अगली यात्रा के लिए हम निकल पड़े शनि शिंगणापुर, शिर्डी से शिंगणापुर की दूरी - 70 किमी,सुबह ११ बजे चले आराम से, यहाँ से एक नयी टैक्सी मिल गयी थी जो; महाराष्ट्र के पूरी यात्रा के लिए बुक थी .. वैसे शिर्डी से शनि मंदिर के लिए छोटी गाड़िया/ बस भी मिलती है जो १०० से १८० तक ले ली है जैसा मुर्गा फस जाये ..देश में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर।
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Wednesday, April 29, 2015

त्रयम्बकेश्वर दर्शन

२९ अप्रैल २०१५ (बुद्धवार), नासिक यात्रा का तीसरा दिन
नाशिक शक्तिशाली सातवाहन वंश के राजाओं की राजधानी थी। मुगल काल के दौरान नासिक शहर को गुलशनबाद के नाम से जाना जाता था। इसके अतिरिक्त नाशिक शहर ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष में भी अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ॰ आम्बेडकर ने १९३२ में नाशिक के कालाराम मंदिर में अस्पृश्योंको प्रवेश के लिये आंदोलन चलाया था। पौने बारह बजे होटल पहुचे थे तो थक चुके थे रात में देर में सोये थे तो सुबह ७ बजे से ही अम्मा चिल्लाना शुरू की .. उठ नहा धो के तैयार हो जा.. आख मलते मलते उठे.. माता नहा धो के तैयार हो चुकी थी.. बैग का सामान मिलाने में ब्यस्त.. तो मै निचे उतर कर बिना चीनी के चाय के खोज में लग गया ...
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शिर्डी दर्शन

(२९ अप्रैल २०१५) तो नीता टूर की "Mumbai To Shirdi (Seating)(2X2) Volvo Multi-Axle & Mercedes-Benz"  शानदार बस भी आ गयी , चुकी टिकट पहले ही बुक कर चुके थे तो बस में सिर्फ बैठना ही था, भारत में तो सरकारी बसों के अलावा कोई अनुभव नहीं था लक्जरी का .. तो येही चुनाव किया था .. खैर बस शानदार थी मस्त वातानुकूलित, भीड़ ज्यादा नहीं थी हमारी सिट भी आगे की ही थे माता जी को ले कर बिराज लिए .. चल पड़ी बस .. शिर्डी के लिए , रस्ते में एक अच्छे ढाबे में रोका था.. लेकिन माता जी ने कुछ खाने से मना कर दिया तो एक बोतल ठंडा पानी पि कर ही फिर बस पर बैठ गए.. खैर सवा सात बजे हम शिर्डी पहुच ही गए.. जहा बस रुकी उसके पास ही अपना होटल बुक था.. चुकी दर्शन का प्रोग्राम कल सुबह का था, लेकिन बस से उतरते ही होटल के दलालों की भीड़ उसी में मिल गया एक फुल वाला
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त्र्यंबकेश्वर से पंचवटी

(२९ अप्रैल २०१५) त्र्यंबकेश्वर से नासिक पंचवटी जाने के लिए हम माता श्री को ले कर बैठ गए चल दिए पंचवटीदर्शन के लिए,टैक्सी वाले ने बताया की वह हमें रामघाट पर उतार देगा। बीच में आंजनेरी पर्वत और अंजनी माता का मंदिर भी पड़ता है और वह हमें वहां भी रोकेगा। हालांकि मैं जानता था कि आंजनेरी पर्वत पर हम नहीं जा पाएंगे क्योंकि एक तो पर्वत कुछ दूर है तथा ऊंचा है। दूसरी बात कि माता जी इतना पैदल भी नहीं चल पायेगी साथ ही हमारे पास इतना समय नहीं कि रुक-रुककर चढ़ जाएं। आज ही शिरडी भी पहुंचना है, अतः आंजनेरी पर्वत फिर कभी। हां, अंजनी माता का मंदिर सड़क से सटा हुआ है, वहां आसानी से दर्शन हो सकता है।नासिक को नाशिक के नाम से भी जाना जाता है। यह शहर प्रमुख रूप से हिन्दू तीर्थयात्रियों का प्रमुख केन्द्र है। नासिक पवित्र गोदावरी नदी के तट पर स्थित है।समुद्र तल से इसकी ऊंचाई ५६५ मीटर है। गोदावरी नदी के तट पर बहुत से सुंदर घाट स्थित है। इस शहर का सबसे प्रमुख भाग पंचवटी है। इसके अलावा यहां बहुत से मंदिर भी है। नासिक में त्योहारों के समय में बहुत अधिक संख्या में भीड़ दिखलाई पड़ती है।

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Tuesday, April 28, 2015

ओंकारेश्वर ममलेश्वर दर्शन

२८ अप्रैल २०१५ (मंगलवार )यात्रा का दूसरा दिन 

इंदौर से ८२ किलो मीटर सुबह ८ बजे टैक्सी से
इंदौर- ओंकारेश्वर/ ममलेश्वर- खंडवा
दर्शन पूजा का समय सुबह ११ बजे से ३ बजे तक
ओंकारेश्वर / ममलेश्वर
 
अपनी इस यात्रा में आज चलते हैं ओंकारेश्वर नगरी. नर्मदा क्षेत्र में यह ओंकारेश्वर सर्वश्रेष्ठ तीर्थ माना जाता मध्य प्रदेश के खंडवा जिले को दक्षिण भारत का प्रवेशद्वार कहा जाता है. यह जिला नर्मदा और ताप्‍ती नदी घाटी के मध्य बसा है. इंदौर शहर से ८२ किलोमीटर दूर, खंडवा जिले में स्थित यह स्थान नर्मदा के दो धाराओं में विभक्त हो जाने से बीच में बने एक टापू पर है, इसे मान्धाता पहाड़ी भी कहा जाता है. नदी की एक धारा इस पर्वत के उत्तर और दूसरी दक्षिण होकर बहती है.
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खंडवा से नासिक

(२८ अप्रैल २०१५) ख़तम हुवा ओम्कारेश्वर / ममलेश्वर का दर्शन पूजन, भोजन भी हो गया, अब निकले खंडवा स्टेशन जहा से नासिक की ट्रेन 12144 / SLN LTT SF SPL शाम ६.५५ पर  रात्रि १० बजेनासिक, रात्रि विश्राम "नासिक " का प्रोग्राम था ... धुप तेज थी तो गाड़ी का ऐ सी भी काम नहीं कर रहा था .. माता जी को ले कर चल दिए खंडवा के लिए ..खाना भी इतना खा लिया था ..कार में ही सोने की कोशिस कर रहा था लेकिन हाय  रे गर्मी... तब सोचा मता जी से ही कुछ बतियाया जाये... तो माता जी के साथ यात्रा के दौरान भोलेनाथ के संदर्भ में चर्चा का विषय .... बस
#टाइम_पास
करता क्या ओम्कारेश्वर से खंडवा रेलवे स्टेशन मोटी मोटा ७५ किलो मीटर, तो समय भी सवा घंटे लगना था
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Monday, April 27, 2015

उज्जैन दर्शन

(२७ अप्रैल २०१५ ) महाकाल के दर्शन के बाद गर्भ गृह से बाहर निकले, मंदिर के साथ ही बहुत से लगे हुवे छोटे बड़े मंदिर है .. सभी मंदिरों के दर्शन करते हुवे आगे बढते गए क्यों की सभी मंदिर महाकाल के दरबार में ही थे तो हाजिरी लगाते गए माता श्री के साथ, क्यों की कहा जाता है की जो महाकाल का भक्त है उसका काल भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

महाकाल के बारे में तो यह भी कहा जाता है कि यह पृथ्वी का एक मात्र मान्य शिवलिंग है। महाकाल की महिमा का वर्णन इस प्रकार से भी किया गया है - 

     आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् । भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते॥
 
इसका तात्पर्य यह है कि आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। मन्दिर घुमने के बाद पिछले गेट से बाहर निकले माता जी को चाय नास्ता कराने के लिए, तभी घूमते घूमते एक आटो वाला लग गया उज्जैन दर्शन कराने के लिए,
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उज्जैन से इंदौर

(२७ अप्रैल २०१५) तो दोपहर के २.३० पर हम पहुच ही गए इन्दौर शहर, भूख तो चप्पक के लगी थी, पर माता श्री खाने को तैयार नहीं तो अपुन भी बस से उतर कर ऑटो पकड़ के पहुच गए होटल. चुकी होटल की बुकिंग पहले ही कर चुके थे तो वहा सिर्फ बुकिंग वाउचर देने पर ही कमरा मिला गया, कागजी खाना पूर्ति करने के बाद चौथे मंजिल के कमरे में पहुच कर पहले ऐ सी चलाया क्यों की बाहर का तापमान ३८ था... दिमाक गर्म, २ बोतल ठंडा पानी पिया १० मिनट आराम किया फिर माता जी के लिए टी वी चला कर निकल पड़ा इन्दौर शहर को समझने और कल की यात्रा ओम्कारेश्वर की तयारी करने.. 


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महाकालेश्वर दर्शन

२७ अप्रैल २०१५ (सोमवार) की सुबह से..जय महाकाल जय महाकालेश्वर

'ऊँ महाकाल महाकाय, महाकाल जगत्पते। महाकाल महायोगिन्‌ महाकाल नमोऽस्तुते॥
महाकाल स्त्रोत (महाकाय, जगत्पति, महायोगी महाकाल को नमन)

आज माता जी की तीर्थयात्रा में सबसे पहले महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए चलते हैं. मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित 'दक्षिणमुखी' इस ज्योतिर्लिंग को स्वयंभू माना जाता है. सुबह ४ बजे होटल से नहा धो कर महाकाल के दरबार में... थोड़ी देर तो हो गयी थे लेकिन होटल से ऑटो पकड़ कर पहुच ही लिए महाकाल के दरबार में .. अपने महाकाल की भस्म आरती की टिकट ओल्ड हाल की थी मतलब आगे है... लेकिन देरी के कारण एक दम पीछे से दर्शन .. मंदिर भी काफी बड़ा है.. गर्भ गृह में जाने के लिए रास्ता भी काफी घूम फिर के जाना पड़ता है ... पहुच तो गए... गर्भ गृह के पास लेकिन अब आरती की शुरुवात हो चुकी थी तो जलाभिषेक करने नहीं मिला .. फ़िलहाल भस्म आरती दर्शन के लिए नए हॉल में प्रवेश .. वैसे महाकालेश्वर मंदिर एक विशाल परिसर में स्थित है, जहाँ कई देवी-देवताओं के छोटे-बड़े मंदिर हैं। मंदिर में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार से गर्भगृह तक की दूरी तय करनी पड़ती है। इस मार्ग में कई सारे पक्के चढ़ाव उतरने पड़ते हैं परंतु चौड़ा मार्ग होने से यात्रियों को दर्शनार्थियों को अधिक ‍परेशानियाँ नहीं आती है। गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए पक्की सीढ़ियाँ बनी हैं। ..

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Sunday, April 26, 2015

यात्रा का शुभारम्भ

२६ अप्रैल २०१५ रविवार.. माता जी के यात्रा का शुभारम्भ . 
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Monday, March 16, 2015

वेद पुराण का सारांश


ब्रह्म पुराण
पुराणों की दी गयी सूची में इस पुराण को प्रथम स्थान पर रखा जाता है, इस पुराण में सृष्टि की उत्पत्ति, पृथु का पावन चरित्र, सूर्य एवं चन्द्रवंश का वर्णन, श्रीकृष्ण-चरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनि का चरित्र, तीर्थों का माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानों की सुन्दर चर्चा की गयी है। भगवान् श्रीकृष्ण की ब्रह्मरूप में विस्तृत व्याख्या होने के कारण यह ब्रह्मपुराण के नाम से प्रसिद्ध है।  इस पुराण में साकार ब्रह्म की उपासना का विधान है। इसमें 'ब्रह्म' को सर्वोपरि माना गया है। इसीलिए इस पुराण को प्रथम स्थान दिया गया है। पुराणों की परम्परा के अनुसार 'ब्रह्म पुराण' में सृष्टि के समस्त लोकों और भारतवर्ष का भी वर्णन किया गया है। कलियुग का वर्णन भी इस पुराण में विस्तार से उपलब्ध है।  ब्रह्म के आदि होने के कारण इस पुराण को आदिपुरण भी कहा जाता है। व्यास मुनि ने इसे सर्वप्रथम लिखा है। इसमें दस सहस्र श्लोक हैं। प्राचीन पवित्र भूमि नैमिष अरण्य में व्यास शिष्य सूत मुनि ने यह पुराण समाहित ऋषि वृन्द में सुनाया था। इसमें सृष्टि, मनुवंश, देव देवता, प्राणि, पुथ्वी, भूगोल, नरक, स्वर्ग, मंदिर, तीर्थ आदि का निरूपण है। शिव-पार्वती विवाह, कृष्ण लीला, विष्णु अवतार, विष्णु पूजन, वर्णाश्रम, श्राद्धकर्म, आदि का विचार है।
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Sunday, March 15, 2015

वेद पुराण है क्या ?

पुराण
पुराण, हिंदुओं के धर्मसंबंधी आख्यानग्रंथ हैं जिनमें सृष्टि, लय, प्राचीन ऋषियों, मुनियों और राजाओं के वृत्तात आदि हैं। ये वैदिक काल के काफ़ी बाद के ग्रन्थ हैं, जो स्मृति विभाग में आते हैं। भारतीय जीवन-धारा में जिन ग्रन्थों का महत्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण भक्ति-ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अठारह पुराणों में अलग-अलग देवी-देवताओं को केन्द्र मानकर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की गाथाएँ कही गई हैं। कुछ पुराणों में सृष्टि के आरम्भ से अन्त तक का विवरण किया गया है। इनमें हिन्दू देवी-देवताओं का और पौराणिक मिथकों का बहुत अच्छा वर्णन है।
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Thursday, March 12, 2015

शिव तांडव स्तोत्र

वह स्तोत्र जो आपको सबकुछ देगा

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र
 
॥ अथ रावण कृत शिव तांडव स्तोत्र ॥


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Wednesday, March 4, 2015

शैव मत (Shaivism)

शैव मत / शैव संप्रदाय

हिंदुओं के संप्रदाय माने गए हैं- शैव, वैष्णव, शाक्त, नाथ, वैदिक और चर्वाक। इसमें से चर्वाक संप्रदाय तो लुप्त हो गया लेकिन बाकी सभी संप्रदाय प्रचलन में हैं। सबसे प्राचीन संप्रदाय शैव संप्रदाय को ही माना जाता है। शैव मत का मूल रूप ॠग्वेद में रुद्र की आराधना में है। १२ रुद्रों में प्रमुख रुद्र ही आगे चलकर शिव, शंकर, भोलेनाथ और महादेव कहलाए। इनकी पत्नी का नाम है पार्वती जिन्हें दुर्गा भी कहा जाता है। शिव का निवास कैलाश पर्वत पर माना गया है। इनके पुत्रों का नाम है कार्तिकेय और गणेश और पुत्री का नाम है वनमाला जिन्हें ओखा भी कहा जाता था।
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Monday, March 2, 2015

मन की बात

बात उन दिनों की है जब मै शायद क्लास ७-८ में पड़ता था.. पापा बड़ी बुवा के यहाँ लखनऊ गए थे , घर में हम संजू टूसी और अम्मा... पापा के लखनऊ जाने के ४-५ दिन बाद माता जी ने पिता श्री का हाल खबर 
लेने की लिए मुझे २० रूपया दिया , इन दिनों संचार के साधन बहुत महगे थे , अपने चौराहे पर तो कोई फोन बूथ भी नहीं था , उन दिनों घर में लैंड लाइन फोन एक स्टेटस सिम्बल होता था , अपने घर में भी फोन नहीं था , तो मै २० रूपए ले कर नाटी इमली चौराहे पर काशी के दुकान पर गया , काशी को २० का नोट दे कर बुवा के घर का नंबर लगाने को कहा , फोन की घंटी गयी , उधर से किसी ने उठा , मैंने कहा , मै काटन मिल से राजू बोल रहा हु , मेरे पापा से बात करा दीजिये, पापा लाइन पर आये ..” पापा हम राजू बोलत हई..., कब घरे अइबा , अम्मा पूछत हइन ... उधर से पापा.... “ हा बोलो बेटा , कैसे हो तुम, घर में सब लोग कैसे है, मै
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Sunday, March 1, 2015

हमारे धर्म का आधार शैव मत

माता जी की तीर्थ यात्रा में धर्म से सम्बंधित जानकारी खंगालने पर पता चला की वेदान्त सिद्धान्त हमारे जीवन का आधार है। सिद्वान्त हमारी संस्कृति की आत्मा है। वेदान्त का उदघोष है- ब्रम्हा ही जीव बन गया है। ब्रम्ह ही जगत बन गया है। 
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Thursday, February 26, 2015

माता श्री की द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा

हिंदू धर्म के चार संप्रदाय हैं- 1.वैष्णव 2.शैव, 3.शाक्त और 4.ब्रह्म (अन्य)। चारों के तीर्थ हैं।

तीर्थ से ही वैराग्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। तीर्थ यात्रा का समय संक्रांति के बाद माना गया है जबकि सुर्य उत्तरायण होता है। तीर्थ में सबसे प्रमुख कैलाश मानसरोवर को माना गया है। इसके बाद क्रमश: चार धाम, द्वादश ज्योतिर्लिंग, शक्तिपीठ, सप्तपुरी का नंबर आता है।
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Friday, February 20, 2015

मेरा ४१वा जनम दिन..

आज २० फ़रवरी है... तो खास क्या है.. आज मै ४१ साल पूर्ण कर ४२ साल में प्रवेश कर रहा हु ...

जिन्दगी में सिर्फ माँ बाप से लड़ाई के सिवा किया क्या है मैंने... अब तो पापा भी नहीं रहे... माँ अकेली , छोटा भाई तो है साथ में लेकिन फिर भी माँ शायद उदास है , ऐसा मुझे लग रहा है.. क्या किया है मैंने अपने इस ४१ साल के जीवन में, आज तो शर्म से माँ को फ़ोन भी नहीं कर पा रहा हु... शायद मै ही इसका जिम्मेदार हु.. चलो कोई बात नहीं , ले आया एक अद्धा खोला बोतल... रात के १० बजे   ....

माता जी काशी छोड कभी बाहर नहीं गयी, लेकिन अभी छोटी बहन “टूसी” के पास है रामपुर में.. मै २० 

फ़रवरी १९७४ को पैदा हुवा था, उस दिन शिवरात्रि थी... तो दादा जी ने मेरे नाम के बिच में शंकर लगा दिया, पापा ने राजीव, उस समय कुछ रेयर ही नाम था राजीव.. आज तो १०० में से २७ मिलते है राजीव... तो मै बन गया “राजीव शंकर मिश्र” बुद्धि प्रकाश भारती देवी का पहला पुत्र... लेकिन मेरा अनुभव ये कहता है की मै ज्यादा लाड प्यार में लतखोर हो चूका हु... माँ पापा जो कहते मै उसका उल्टा... इसी वजह से पापा तो बहुत दूर चले गए मुझे छोड़ कर, बस माँ है लेकिन मै उससे दूर... मै दो भाई एक बहन में सिर्फ मेरे पास ही बाप का साया नहीं है अभी चाहे घर से चाहे ससुराल से... हर कुछ अकेले ही करना पड़ता है.. थक चूका हु मै... इस लिए सोचता हु कुछ पल माँ के साथ गुजार लू....   

माँ का फ़ोन उठा... माँ प्रणाम ... कौन .. राजू .. हा का हाल चाल हव तोहार... आज त तोहार जनम दिन हव न.. का करत हए....माँ को याद है क्यों की वो माँ है न... हाल चाल क्या बताता.. “ ए माँ .. एक ठे बात कही ... “का” माँ बोली... हम सोचत हाई तोहके ले के कही बहरे घुमे चली... “ और के चली” माँ पूछती है... धर्म संकट... नशा काफूर... केहू नहीं . खाली हम और तू... तब माता जी के आवाज में थोड़ी नरमी आयी... “ कहा चलबा...” माँ ने पूछा... कुछ भी प्लान नहीं दिमाक में... क्या जवाब दू... लेकिन हमेशा मेरे साथ मेरे आराध्य देव भोले ... जिनकी तीसरी नेत्र चालू हो गए..  फटा फट मुख से आवाज निकली... “ अम्मा ज्योतिर्लिंग और धाम का दर्शन “ कब चले के हव ... माँ ने कहा .. शायद ये शब्द मेरे लिए दुनिया के सबसे खुबसूरत सब्दो में थे... , पहिले “ हा “ कहा तब प्रोग्राम करी... .. माँ ने कहा चला .. चलब ... विश्वास हो गया माँ चलेगी क्यों की आज तक बनारस छोड़ कर कभी बाहर भी नहीं गयी क्यों की शायद  

चना चबेना गंगजल जो पुरवै करतार।
काशी कबहूं न छोड़िए विश्वनाथ दरबार।।


जब भक्त ही कहीं नहीं जाना चाहते तो तुम अपने भक्तों को छोड़कर भला कहां जाओगे ?

मगर भोले, आज के समय में ये अल्पसन्तोष की फिलासफी ठीक नहीं।... फ़ोन रखा ... उस ख़ुशी के नापने का कोई मशीन होती तो जरुर नापता ... फ़िलहाल माँ को सुभ रात्रि कहा ... १-२ दिन में प्रोग्राम फाइनल कर के बताइला... प्रणाम... शायद ये जन्म दिन मेरे जीवन का सबसे खुबसूरत तोहफा....

>>शुरुवात जोतिर्लिंग यात्रा की 
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Saturday, August 16, 2014

बनारस विद्रोह

घोड़े पर हौदा-हाथी पर जीन/ चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग. ये कहावत आज भी बनारस क़ी गलियों में पुराने लोगों के बीच लोकप्रिय है। इसके पीछे एक कहानी है। कहते हैं कि आज से लगभग दो सौ तीस साल पहले काशी राज्य क़ी तुलना देश क़ी बड़ी रियासतों में क़ी जाती थी। भौगोलिक दृष्टिकोण से काशी राज्य भारत का ह्रदय प्रदेश था। जिसे देखते हुए उन दिनों ब्रिटिश संसद में यह बात उठाई गई थी कि यदि काशी राज्य ब्रिटिश हुकूमत के हाथ आ जाये तो उनकी अर्थ व्यवस्था तथा व्यापार का काफी विकास होगा।

इस विचार विमर्श के बाद तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग को भारत पर अधिकार करने के लिय भेजा गया। काशी राज्य पर हुकूमत करने के लिये अग्रेजों ने तत्कालीन काशी नरेश से ढाई सेर चीटीं के सर का तेल या फिर इसके बदले एक मोटी रकम क़ी मांग रखी। अंग्रेजों द्वारा भारत को गुलाम बनाने क़ी मंशा को काशी नरेश राजा चेतसिंह ने पहले ही भांप लिया था। अतः उन्होंने रकम तक देने से साफ मना कर दिया लेकिन उन्हें लगा कि अंग्रेज उनके राज्य पर आक्रमण कर सकते हैं, इसी को मद्देनजर रखते हुए काशी नरेश ने मराठा, पेशवा और ग्वालियर जैसी कुछ बड़ी रियासतों से संपर्क कर इस बात कि संधि कर ली थी कि यदि जरुरत पड़ी तो इन फिरंगियों को भारत से खदेड़ने का पूरी कोशिश करेंगे।

14 अगस्त 1781, दिन शनिवार, जनरल वारेन हेस्टिंग एक बड़े सैनिक जत्थे के साथ गंगा के जलमार्ग से काशी पहुंचा। उसने कबीरचौरा के माधव दास का बाग को अपना ठिकाना बनाया। कहते हैं कि राजा चेतसिंह के दरबार से निष्काषित औसान सिंह नाम के एक कर्मचारी कलकत्ता जा कर वारेन हेस्टिंग से मिला और उसका विश्वासपात्र बन बैठा, जिसे अंग्रेजों ने "राजा" क़ी उपाधि से भी नवाजा था। उसी के मध्यम से अंग्रेजों ने काशी पहुँचने के बाद काशी नरेश राजाचेत सिंह को गिरफ्तार करने क़ी साजिश रची . दिन रविवार, तारीख १५ अगस्त १७८१ क़ी सुबह वारेन हेस्टिंग ने अपने एक अंग्रेज अधिकारी मार्कहम को एक पत्र दे कर राजा चेतसिंह के पास से ढाई किलो चीटी के सर का तेल या फिर उसके बदले एक मोटी रकम लाने को भेजा. उस पत्र में हेस्टिंग ने राजा चेतसिंह पर राजसत्ता के दुरुपयोग और षड्यंत्र का आरोप लगाया। पत्र के उत्तर में राजा साहब ने षड्यंत्र के प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट क़ी. उस दिन यानि १५ अगस्त को राजा चेतसिंह और वारेन हेस्टिंग के बीच दिन भर पत्र व्यवहार चलता रहा

दूसरे दिन १६ अगस्त को सावन का अंतिम सोमवार, हर साल क़ी तरह राजा चेत सिंह अपने रामनगर किले क़ी बजाय शंकर भगवान क़ी पूजा अर्चना करने गंगा के इस पार छोटे किले शिवालाघाट आए थे। इसी किले में उनकी तहसील का छोटा सा कार्यालय भी था। कहतें हैं कि जिस समय काशी नरेश शिवपूजन से निवृत हो कर अपने दरबार में कामकाज देख रहे थे, कि उसी समय गवर्नर वारेन हेस्टिंग क़ी सेना उनके दरबार में प्रवेश करने की कोशिश करने लगी लेकिन काशी के सैनिकों ने उनके नापाक मंसूबो को कामयाब नहीं होने दिया। तब एक अंग्रेज रेजीडेंट ने राजा साहब से मिलने क़ी इच्छा जाहिर क़ी और कहलवाया कि वो गवर्नर साहब का एक जरुरी सन्देश ले कर आया है, लेकिन सैनिकों ने ये संदेह प्रकट किया कि वो इतनी सेना साथ क्यों लाया है? इसके जवाब में रेजिडेंट ने ये कहकर नई चाल चली कि सेना तो वैसे ही उसके साथ चली आई है, किले में केवल हम दो-तीन अधिकारी ही आएंगे. इस पर राजा साहब क़े आदेश पर उन्हें अन्दर किले में भेज दिया गया।

बातों ही बातों में दोनों ओर से तलवारें खिंच गईं, इसी दौरान एक अंग्रेज अधिकारी ने राजा चेत सिंह को लक्ष्य कर बन्दूक तानी, जब तक उसकी अंगुली बन्दूक के ट्रिगर पर दबती कि उसके पहले काशी के महशूर गुंडे बाबू नन्हकू सिंह क़ी तलवार के एक ही वार से उस अंग्रेज अधिकारी का सर कट कर दन से जमीन पर आ गिरा, चारों ओर खून ही खून बिखर गया, जिसे देख कर खून से सने अंग्रेज अधिकारी चीखते-चिल्‍लाते उल्‍टे पांव बाहर भागे. उधर किले के बाहर चारों तरफ छिपे किन्तु सतर्क काशी के वीर रणबांकुरों ने देख कर ये समझ लिया कि अन्दर किले में मार-काट मच गई है। फिर क्या था सभी बाज क़ी तरह गोरी चमड़ी वालों पर टूट पड़े, लेकिन किस ने किस को मारा ये तो आज तक पता नहीं चल सका, लेकिन शिवाला घाट पर बने किले के बाहर लगे शिलापट्ट पर अंग्रेजों ने ये जरुर अंकित करवा दिया कि इसी जगह पर तीन अंग्रेज अधिकारियों लेफ्टिनेंट स्टॉकर, लेफ्टिनेंट स्कॉट और लेफ्टिनेंट जार्ज सेम्लास समेत लगभग दो सौ सैनिक मारे गए थे।

इस घटना के तुरन्त बाद राजा काशी नरेश के मंत्री बाबू मनियर सिंह ने गवर्नर वारेन हेस्टिंग को गिरफ्तार करने क़ी सलाह राजा साहेब को दी, लेकिन उनके दीवान बक्शी सदानंद ने उन्हें ऐसा कराने से मना कर दिया। उधर वारेन हेस्टिंग अपने पकडे़ जाने के डर से "माधव दस बाग" के मालिक पंडित बेनी राम से चुनार जाने के लिये सहायता मांगी. इसी बीच उसे पता चल गया कि राजा साहब क़ी एक बड़ी फौज उसे गिरफ्तार करने इसी तरफ आ रही है। कहते हैं कि अपनी गिरफ्तारी के डर से वारेन हेस्टिंग उसी माधव दास बाग के भीतर बने एक कुँए में कूद गया और जब रात हुई तो वो स्त्री का भेष धारण कर चुनार क़ी ओर कूच कर गया। राजा चेतसिंह के दीवान बक्शी सदानंद क़ी ये सलाह कि वारेन हेस्टिंग को गिरफ्तार ना किया जाय, भारत के लिये दुर्भाग्यपूर्ण रहा। अगर उस दिन वारेन हेस्टिंग काशी नरेश क़ी सेना के हाथों गिरफ्तार कर लिया गया होता तो शायद अंग्रेजों के पांव भारत में ही ज़मने नहीं पाते.

मजे क़ी बात तो ये है कि अंग्रेज इतिहासकारों ने काशी नरेश राजा चेतसिंह को भगोड़ा साबित किया है और वहीं दूसरी तरफ शिवाला घाट पर जो शिलापट्ट लगवाया उस में साफ-साफ शब्दों में लिखवाया कि "इसी जगह उनके तीन अधिकारियों सहित दो सौ सैनिक मारे गए थे। जिसे आज भी देखा जा सकता है लेकिन वो वारेन हेस्टिंग के भगोड़ा होने क़ी बात पर चुप्पी साध गए। अगर इस घटना पर विचार करें तो स्वतंत्रता आन्दोलन का पहला बिगुल काशी में ही बजा था, लेकिन दुर्भाग्य ये है कि उस घटना क़ी याद में आज तक यहाँ पर कोई स्मारक नहीं बन सका है। हाँ इस दिन यानी १६ अगस्त को जिन परिवार के पूर्वजों ने स्वतंत्रता के लिये उस दिन अपनी क़ुरबानी दी थी उनके परिजन जरुर एक "दीपक" उनकी याद में जलाते हैं। उस गौरव गाथा को आज भी इस प्रकार गया जाता है,

घोड़े पर हौदा, हाथी पर जीन, चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग...!

धर्मपाल जी अक्सर कहा करते थे बनारस की क्रांति. आज उसको विस्तार से पढ़कर कई जानकारी मिली. धर्मपाल जी नो एक बात और कहा है कि असहयोग का सबसे पहला प्रयोग बनारस में हुआ था और गांधी के भारत आने से बहुत पहले. संभववतः गांधी जी ने उसी बनारस के असहयोग से प्रेरणा ली थी. इस बारे में आपको कुछ पता है क्या?

अभी साहित्य अमृत में एक लेख छपा है देवेन्द्र स्वरूप का. जिसमें उन्होंने विस्तार से बताया है कि 1857 की क्रांति के पीछे पूरबियों (पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार) का कितना बड़ा योगदान था. वे तो यहां तक निष्कर्ष निकालते हैं कि पूरब के लोग नहीं होते तो 1857 की क्रांति होती ही नहीं. 
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Friday, August 15, 2014

युवा नेता" बनने की विधि

आइए जानें: कैसे बनें नेता

भारत भाग्य विधाता कौन, आम आदमी, यह तो सदी का सबसे बड़ा जोक होगा। पैसा हो सकता है, मगर उसे चलाने वाले कौन, उद्योगपति, मगर उनके भी हित कहीं और से सधते हैं। सही समझ रहे हैं आप लकदक खादी में सजे, चेहरे पर लालामी और माथे पर तमाम परेशानियों की वजह से कुछ सिलवटें लिए नेता ही तय करते हैं समय की रफ्तार। मगर नेता बनना इतना आसान तो नहीं। कोई फिक्स रास्ता नहीं, कोई फिक्स कोर्स नहीं और आगे बढ़ने का कोई श्योर शॉट जरिया नहीं। मगर कुछ बातें ऐसी हैं, जिनका आप तन, मन और धन (जी हां नेता बनने में धन की भी अहम भूमिका है) से पालन करें तो आपको भारत का नहीं तो अपने भाग्य का समृद्ध विधाता बनने से कोई नहीं रोक सकता। तो इस बार जानिए नेता बनने के कुछ नुस्खे, जिनका इस्तेमाल खालिस नकल के बजाय कुछ अकल लगाकर किया जाए, तो आपको नेता बनने से कोई नहीं रोक सकता।

कोई पैदाइशी नेता नहीं होता। (इसमें वे कुछ हजार परिवार शामिल नहीं हैं, जिनका पैतृक कारोबार राजनीति का है) नेता बनने के लिए बहुत लगन से काम करना होता है। शतरंज की बिसात की तरह सिर्फ अपने नहीं, दूसरों के मोहरे पर भी नजर रखनी होती है। आप नेता बनना चाहते हैं, अच्छी बात है, मगर पूरी तैयारी के साथ सफर शुरू नहीं किया तो किसी छोटे-मोटे मोर्चे के उप-सह सचिव बनकर ही रह जाएंगे।

"युवा नेता" बनने की विधि. . . . . . . . .
आवश्यक सामग्री :- १ SUV दस-बारह लाख की ।।
सफ़ेद कलफ लगे कुर्ते-पजामे, सफ़ेद लिनेन के शर्ट पेंट ।।
सोने की २  चेन ।।
सोने की अंगूठी-ब्रेसलेट ।।
२ आई फोन ।।
ब्रांडेड जूते-सेंडिल ।।
ब्रांडेड कलाई घडी ।।
१ चश्मा Ray ban का ।।
क्लासिक का सिगरेट पैकेट ।।
रजनीगंधा का डिब्बा ।।
४ -६ जी हुजूरी करते चेले।


कैसे बने :- अपने SUV के नंबर प्लेट में नंबर की जगह अपनी पार्टी के झंडे का चिन्ह बनवाये और अपने ४ -६ चेलो को अपनी SUV में सदैव बैठा कर रखे।।

SUV में बैठ के मोबाइल कान में ही लगा के रखे।।
अपनी देह को कुर्ते-पजामे और सोने
के आभूषण से सुसज्जित करे।।
और किसी भी एक नेता के इर्द गिर्द परिक्रमा प्रारम्भ करे।
अपने नेता को प्रसन्न करने के लिए "मंच-माइक-माला" की यथासंभव ज्यादा से ज्यादा व्यवस्थाये करे ।

नेता जी के आगे पीछे घूमते हुए उनकी "सेवा-पूजा" करते रहे, अपने नेता जी के साथ और उनके भी नेता जी के साथ फोटो खिंचवा कर घर एवं अपने व्यापारिक
प्रतिष्ठान में लगावे ।

हर छोटे बड़े कार्यक्रम, त्यौहार, जन्मदिन पर पुरे शहर में फ्लेक्स लगवाये ।।
मीडिया के लोगो से सेटिंग कर अपनी फ़ोटो अखबारो में छपाते रहे ।।

समय समय पर अपने क्षेत्र में
चतुर्थ श्रेणी के सरकारी अधिकारियों पर रौब झाड़ते रहे ।
लो जी अब तैयार हैं शहर
का एक और युवा नेता!

अरे हम किसी तख्तापलट की बात नहीं कर रहे, बस एक बेसिक मंतर सिखा रहे हैं। जिसके पास भीड़ है, वही हिट है, चाहे सिनेमा हो या फिर पॉलिटिक्स। आपने देखा होगा, मोहल्ले के भइया जी या इलाके के पार्षद या फिर विधायक जी को। उनकी एक आवाज पर सैकड़ों लौंडे-लफ्फाड़े जुट जाते हैं बाइक पर सवार होकर। मरने-मारने को तैयार दिखते। रैली है, प्रदर्शन है या फिर पार्क में कल्चरल प्रोग्राम, यही युवा काम आते हैं। तो आपको भी इन्हीं पर फोकस करना है। कैसे करना है, यह आप तय करें। सामने वाले पार्क में पार्षद जी से कहकर एक वॉलीबॉल कोर्ट बनवा सकते हैं। कल्चरल नाइट का रसीद-कट्टा बनवाकर लड़कों को 10 फीसदी कमिशन पर दे सकते हैं और फिर आगे की सीटों से लेकर डांसर लाने तक का इंतजाम साथ में कोई हरकत न हो, इसकी जिम्मेदारी उनकी। 

यह जनता शातिर भी है और भोली भी। इसलिए जब भी कोई किसी काम के लिए आए, तो न तो बोलें ही न। काम हो या न हो, ठोस आश्वासन जरूरी है। एक चुटकुला शायद इस समझने में आपकी मदद करे। जंगल में सभा हुई, सब जानवर बोले - शेर बहुत परेशान करता है। बंदर बोला, किसी को नेता बना लें, हमारी बात भी सुनी जाएगी। सब राजी हो गए मगर नेता बने कौन? फिर बंदर आया और बोला मैं ही लेता हूं यह कठिन जिम्मेदारी। कुछ दिनों बाद शेर बकरी के बच्चे को उठाकर भाग गया। बकरी पहुंची बंदर के पास। बंदर फौरन निकल पड़ा। पीछे-पीछे जंगल के बाकी जानवर। शेर एक मैदान में बैठा शिकार को तड़पा रहा था। बंदर यह देखकर एक डाल से दूसरी डाल पर कूदने लगा। कुछ देर बाद जानवरों ने पूछा, अरे कुछ करते क्यों नहीं। बंदर ने जवाब दिया, देखो मेरी भागदौड़ में तो कोई कमी नहीं।

यह गुरुमंत्र कान में फूंक लें। सब कुछ छूट जाए, विचारधारा, नेता जी या फिर रुपया-पइसा, मगर जनता का साथ न छूटे। जनता साथ है तो आप निर्दलीय भी चुनाव जीत सकते हैं, नई पार्टी बना सकते हैं, आंदोलन खड़ा कर सकते हैं, कुल मिलाकर यह कि इतिहास की धारा बदल सकते हैं। मगर जनता साथ छूटी तो राजनीति अमर चित्र कथा की तरफ सिर्फ किताबों में नजर आएगी।
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Wednesday, March 5, 2014

वाह गुरु वाह.....और पीछे से तो मेरी ही लेता है..

“समाज में बस लोग सिर्फ़ एक ही चीज़ से डरते हैं.. वो है बदनामी...पर क्या आप जानते हैं.. कि बदनामी में भी नाम होता है.. लोग बदनामी के डर की वजह से अपने घर को ही पंचायत और खुद को सरपंच बना लेते हैं.. जैसे बस अब सारे फैसले अपने हक में ही हों... पर जितना हम उसे रोकने की कोशिश करते हैं.. फिर भी वैसा हो ही जाता है.. पता है क्यों???? जब रबड़ को ज्यादा खींचकर छोड़ते हैं.. तो चोट हमें ही पहुंचाती है... और अगर कसकर खींच दो तो टूट जाती है... कहीं हम समाज से रिश्ते निभाते-२ अपनों से दूर तो नहीं हो गये.. कहीं हमने अपने घर को परीक्षा-भवन और स्वयं को जांचकर्ता तो नहीं बना लिया??


आज दोस्तों के साथ बैठा था.. लोग जिंदगी कि कितनी परिभाषाये बता रहे थे.. जिंदगी कितनी आसान है.. अपना अपना नसीब है भैया ..............

 हसी आ रही रही है .. हमारे एक सहपाठी ने कितना अच्छा जिंदगी को परिभासित किया.. हमारे बच्चे तो चाँद पर घूमने जायेगे.. हम तो २ दिन के लिए जाने के लिए कितनी तयारी करते है.. अभी घूमने और मस्ती करने का समय है.. आज लगा हम भारतीय कितने कूप मंडूक है.. वास्तव में जिंदगी तो भारत के बाहर है.. हम लोग तो सिर्फ फेसबुक .. वो भी ऑफ लाइन हो कर ऑनलाइन हुवे तो कोई मैसेज पेल देगा .. ये मेरा पेज लाइक कर लो.. या देश कि कोई राजनीती.. हम बस इसी में परेशां है..

अपने बारे में कम देश के बारे में.. ज्यादा.. जब आपको अपनेसे ज्यादा, अपनोंका दर्द सताए तो समझिये, वही सच्चा दोस्त है।

स्वार्थी दुनियामें तुलसी दास जी वह पंक्ति याद करें-
 जेन मित्र दुख होंहि दुखारी, तिनहि विलोकत पातक भारी।

मुझे लगता है भारती लोगो को भी बायलर मुर्गे या हाईब्रीड के तरह बनाना चाहिए..
सोच में फर्क आएगा... हम लोग तो संस्करों के बिच में मरते है काम धाम नहीं तो राजनीत करते है..

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है की ना तो हम अपनी ही पीठ थप-थपा सकते है ............
और ना ही अपने आप को लात मार सकते है ............
इसलिए हर इक मित्र और आलोचक जरूरी होता है ......

भगवन ये क्या लीला है तेरी.. अगर तू एक ही है.. कैसे इतने तरह के इन्सान बनाये.. आज के युग में तो किसी मोल में भी इतनी तरह का प्रोडक्ट नहीं मिलता..
और तू इतने तरह के इन्सान बना डाला .... कोई  भारत का कोई कही का..

एक तरफ तो गीता में लिखवाता है
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥

हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझ में अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझ में युक्त्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ।। १४ ।।ॐ ~ψ~ || Shrimad Bhagwad Gita – Chapter 8 – Shloka 14 || ~ψ~ ॐ

और पीछे से तो मेरी ही लेता है..

वाह गुरु वाह..

कलाकार है तू यार..

याद आता है एक शेर

न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में
ख़ुदा होता
हमीं से यह तमाशा है, न हम होते
तो क्या होता
न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-
पा होता
*आलम ज़ेरे-पा=दुनिया संसार पैरों के
नीचे
घटा छाती, बहार आती,
तुम्हारा तज़किरा होता
फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-
दिल हरा होता
*तज़किरा=ज़िक्र
बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से
उठवाया
हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर
दिया होता
तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लौट
आए
तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ
कहा होता
~ नौशाद 'लखनवी'


अब क्या लिखे.. सपने तो लग गए बट्टे खाते.. देर हो चुकी है..   हम सिर्फ अपनी बनायीं ही दुनिया देखते है..  दूसरा कोई बनाये तो अपनी राय ही पलते  है..  खुद तो खुद कर सकते नहीं .. हा अपना तो सिर्फ एक ही.. अपना हाथ जग्गनाथ.. ... बजाते रहो.. मस्त रहो मस्ती में आग लगे बस्ती में..

सिर्फ आपना ही.. अहम् ब्रस्मामी 



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Friday, February 14, 2014

संत वेलेंनटाइन की जय जय

 अरे यार .. मेरा तो सुबह ही वेलेंनटाइन डे का सन्देश पत्नी जी के मोबाईल से बनारस से चला है अभी तक नहीं पंहुचा ....कितना ट्राफिक जाम है मोबाईल का ..
चलो मान लेता हूं उमर बढ़ रही है.. अब बुड्ढा जो हो रहा हु ) :(   वैसे मोबाईल का ट्राफिक जाम भी क्यों न हो..


 काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

ये हमारे देश के सविधान निर्माता भी न .. आज बाबा वेलेंनटाइन के प्रणय दिवस के दिन रविदास जयंती बना रहे है .. उपर से सरकारी छुट्टी .. मम्मी पापा घर में , और बनारस में झमाझम बरसात, अब  बच्चे निकले भी तो कैसे , निकल भी जाये तो बैठेगे कहा, सब जगह गिला गिला ... उपर से शिव सेना का डर, तो बचे मोबाईल बाबा ... अब तो पहले लोकल डिलेवरी ही पहले देगे न.. हम ठहरे तड़ी पार, उपर से सफ़ेद बाल..
कहते है  प्रेम का कोई एक दिन नहीं होता, लेकिन हम जैसे १४ साल पुराने ब्याहते को आधुनिक समाज के नौजवानों और ब्रम्हा रचित कन्याओ के देख कर मन में एक टिस सी उभरती है , अब क्या करे दिल तो इस मामले में बच्चा है जी ...
सब समय का खेल है मित्रो, आज काम धाम में मन ही नहीं लगा, सारा दिन मोबाईल को निहरता रहा , कब आएगा मेरी प्रेयसी के इजहार-ए-मुहब्बत का पैगाम ...अभी तक नहीं आया , और अब तो ये सुभ पर्व के बिदाई कि घडी भी आ गयी है ...

 
आज हमारे यहाँ काठमांडू में भी वरुण देव भी नाराज थे , सुबह से मीठी मीठी बारिश, और कुलकुलाटी  हुई  गुलाबी ठण्ड, रास्तो के ब्रम्हा रचित कन्याओ का नजारा देख कर ऐसा लगा कि मै अफ्रीका के ५५ डिग्री के तापमान में हु, इतनी गर्मी आयी, अब क्या करू दिल तो पत्थर का तो है नहीं, पिघल ही जाता है , अब ये देख कर तो प्रेम तो रगों में रक्त में बहने लगा

काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

इतिहासकार बांचते है कि14 फरवरी यानि वैलेंटाइन डे का इतिहास भी प्यार से भरा हुआ है. वैलेंटाइन डे को मूल रुप से संत वैलेंटाइन के नाम पर मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि वैलेंटाइन-डे मूल रूप से संत वेलेंटाइन के नाम पर रखा गया है. परंतु संत वैलेंटाइन के विषय में ऐतिहासिक तौर पर विभिन्न मत हैं और कुछ भी सटीक जानकारी नहीं है. कहा जाता है कि संत वैलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को नेत्रदान किया व जैकोबस को एक पत्र लिखा, जिसमें अंत में उन्होंने लिखा था तुम्हारा वैलेंटाइन’. यह दिन था 14 फरवरी, जिसे बाद में इस संत के नाम से मनाया जाने लगा और वैलेंटाइन-डे के बहाने पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम का संदेश फैलाया जाता है. संत वैलेंटाइन मानवता से प्रेम करते थे और उन्होंने समाज में आपसी प्रेम को हमेशा बढ़ावा दिया. और अपने भारतीय नजरिए से देखें तो वैलेंटाइन वसंत के महीने में आता है. और वसंत प्यार का ही महीना होता है. इस तरह वैलेंटाइन का क्रेज भारत में भी अब बढ़-चढ़ कर बोलता है. आज आप भी जिसे प्यार करते हैं उससे अगर अब तक मन की बात नहीं कही तो कह डालिए हो सकता है आपके गुलाब देकर प्रपोज करने का अंदाज उन्हें भा जाए और आपके प्यार का पैमाना उन्हें मालूम हो जाए.
काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

वैलेंटाइन डे आज एक ग्लोबल फेस्टिवल बन गया है. और बने भी क्यों न जबकि इस दुनिया को प्रेम की जरुरत है और जो त्यौहार हमें आपस में प्रेम रखना सिखाए वह तो और भी जरुरी होता है. यह त्यौहार 14 फरवरी को हर देश में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है. खासकर पश्चिमी देशों में तो इस दिन का एक अलग ही अंदाज और शवाब होता है. और पश्चिम ही क्या अब तो दुनिया के हर हिस्से में इसकी अच्छी खासी धूम देखने को मिलती है.  इस दिन फूल और तोहफे हर दिल की धड़कने बढ़ा देते हैं.
काठमांडू के दरबारमार्ग के सडको की रौनक
 यह कोई जरुरी नहीं कि आज का सिर्फ प्रेमी-प्रेमियों के लिए ही बना है. आज का दिन तो प्रेम को दर्शाने के लिए होता है और प्रेम सबके बीच होता है एक मां का उसके बच्चे के प्रति, एक दोस्त का दोस्त के लिए या पति का अपनी पत्नी के लिए. आज के दिन आप जिससे भी प्यार करते हैं या उसके प्यार के लिए उसे धन्यवाद देना चाहते हैं तो उसे अपना वैलेंटाइन बनाइए, गुलाब दीजिए और उसके प्यार के लिए उसे थैंक्स कहिए.
काठमांडू के दरबारमार्ग में के.फ.सी ओर पिज़्ज़ा हट
  भारत में वेलेंटाइन डे मनाए जाने की शुरूआत करीब 1990 के आसपास हुई। लेकिन भारत में ये सभ्यता पुरानी मानी जाती है। बंगाल में सरस्वती पूजा को भी प्यार का दिवस माना गया है। साथ ही प्यार के भगवान कामदेव को भी इस त्योहार से जोड़ कर देखा जाता है। क्योकि पुरानी सभ्यता में कामदेव को पूजा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे ये सभ्यता समाप्त हो गई। वेलेंटाइन डे के दिन हम हमारा प्यार दुसरों को जाहिर करते हैं जिससे आपस में प्यार बढ़ता है। जिसे कामदेव की सही पूजा माना जाने लगा है

लेकिन आज तो भारत में सुना है
वैलेंटाइन्स डे पर कंडोम और पिल्स की बिक्री ने
गुलाब और गिफ्ट्स को पीछे छोड़ा !
वैलेन्टाइन्स डे पर सुरक्षित सेक्स के इन
उपायों की मांग करीब 10 गुना तक बढ़ गई. कई
मेडिकल स्टोर्स पर कंडोम औप पिल्स का स्टॉक
खत्म होने की भी खबर है. 

                  इस प्यार को क्या नाम दूं ?
काठमांडू का डिस्को थिक

इजहार-ए-मुहब्बत का प्रतीक वेलेंटाइन डे हमारे काठमांडू में मनाया जा रहा है । प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी युवा इस पर्व का बेसब्री से इंतजार कर रहे है। वेलेंटाइन डे पर शहर की गिफ्ट गैलरियों की दुकानें व फूलों की दुकानें विशेष रूप सजी हुई दिखाई दी। इनमें ग्रीटिंग कार्ड, पोस्टर व उपहार आकर्षक ढंग से सजाए गए थे। युवा सुबह से ही गैलरियों में आकर्षक शब्दावली वाले कार्ड ढूंढते नजर आए। पर्व को लेकर कई होटलों व रेस्तराओं में भी विशेष व्यवस्था की गई है। लेकिन सबसे खास बात ये  है कि वैलेंटाइन का क्रेज मुझे आज यहाँ कि कन्याओ के वस्त्र को देख क़र दिल जवान हो गया है ..

मैंने भी सोचा चलो आज अकेले ही संत वैलेंटाइन की पूजा की जाये , सो काठमांडू के दरबार मार्ग इस्थित नेपाल s बी आई के ऐ टी म में लगे प्रेयसी जोड़ो की लाइन से मन विचलित हो गया, पैसा भी नहीं निकल पाया, मन में सोच लिया अगले साल तो चप्पक के वैलेंटाइन पर्व मेहरारू के साथ मनाउगा
 प्रणय दिवस कि बेला में कुछ ऐसा रहा कमरे काठमांडू का दरबार मार्ग


चलो भाई ... सभी
कुँवारो को 'हैप्पी वैलेन्टाईन'डे।

और         शादी-शुदा को 'हैप्पी बेलन-टाईट'डे।
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Saturday, February 8, 2014

ये दोस्त भी कैसे है

ये समाज भी कैसा है.. ये दोस्त भी कैसे है .. कुछ समझ में नहीं आता..


पैसे कमाने कि धुन .. पत्नी से दूर रहो ..
दोस्त पूछते है

कैसे रह जाते हो यार
क्या नामर्द हो ?

या बीबी का कोई और यार है ?
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