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Saturday, August 16, 2014

बनारस विद्रोह

घोड़े पर हौदा-हाथी पर जीन/ चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग. ये कहावत आज भी बनारस क़ी गलियों में पुराने लोगों के बीच लोकप्रिय है। इसके पीछे एक कहानी है। कहते हैं कि आज से लगभग दो सौ तीस साल पहले काशी राज्य क़ी तुलना देश क़ी बड़ी रियासतों में क़ी जाती थी। भौगोलिक दृष्टिकोण से काशी राज्य भारत का ह्रदय प्रदेश था। जिसे देखते हुए उन दिनों ब्रिटिश संसद में यह बात उठाई गई थी कि यदि काशी राज्य ब्रिटिश हुकूमत के हाथ आ जाये तो उनकी अर्थ व्यवस्था तथा व्यापार का काफी विकास होगा।

इस विचार विमर्श के बाद तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग को भारत पर अधिकार करने के लिय भेजा गया। काशी राज्य पर हुकूमत करने के लिये अग्रेजों ने तत्कालीन काशी नरेश से ढाई सेर चीटीं के सर का तेल या फिर इसके बदले एक मोटी रकम क़ी मांग रखी। अंग्रेजों द्वारा भारत को गुलाम बनाने क़ी मंशा को काशी नरेश राजा चेतसिंह ने पहले ही भांप लिया था। अतः उन्होंने रकम तक देने से साफ मना कर दिया लेकिन उन्हें लगा कि अंग्रेज उनके राज्य पर आक्रमण कर सकते हैं, इसी को मद्देनजर रखते हुए काशी नरेश ने मराठा, पेशवा और ग्वालियर जैसी कुछ बड़ी रियासतों से संपर्क कर इस बात कि संधि कर ली थी कि यदि जरुरत पड़ी तो इन फिरंगियों को भारत से खदेड़ने का पूरी कोशिश करेंगे।

14 अगस्त 1781, दिन शनिवार, जनरल वारेन हेस्टिंग एक बड़े सैनिक जत्थे के साथ गंगा के जलमार्ग से काशी पहुंचा। उसने कबीरचौरा के माधव दास का बाग को अपना ठिकाना बनाया। कहते हैं कि राजा चेतसिंह के दरबार से निष्काषित औसान सिंह नाम के एक कर्मचारी कलकत्ता जा कर वारेन हेस्टिंग से मिला और उसका विश्वासपात्र बन बैठा, जिसे अंग्रेजों ने "राजा" क़ी उपाधि से भी नवाजा था। उसी के मध्यम से अंग्रेजों ने काशी पहुँचने के बाद काशी नरेश राजाचेत सिंह को गिरफ्तार करने क़ी साजिश रची . दिन रविवार, तारीख १५ अगस्त १७८१ क़ी सुबह वारेन हेस्टिंग ने अपने एक अंग्रेज अधिकारी मार्कहम को एक पत्र दे कर राजा चेतसिंह के पास से ढाई किलो चीटी के सर का तेल या फिर उसके बदले एक मोटी रकम लाने को भेजा. उस पत्र में हेस्टिंग ने राजा चेतसिंह पर राजसत्ता के दुरुपयोग और षड्यंत्र का आरोप लगाया। पत्र के उत्तर में राजा साहब ने षड्यंत्र के प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट क़ी. उस दिन यानि १५ अगस्त को राजा चेतसिंह और वारेन हेस्टिंग के बीच दिन भर पत्र व्यवहार चलता रहा

दूसरे दिन १६ अगस्त को सावन का अंतिम सोमवार, हर साल क़ी तरह राजा चेत सिंह अपने रामनगर किले क़ी बजाय शंकर भगवान क़ी पूजा अर्चना करने गंगा के इस पार छोटे किले शिवालाघाट आए थे। इसी किले में उनकी तहसील का छोटा सा कार्यालय भी था। कहतें हैं कि जिस समय काशी नरेश शिवपूजन से निवृत हो कर अपने दरबार में कामकाज देख रहे थे, कि उसी समय गवर्नर वारेन हेस्टिंग क़ी सेना उनके दरबार में प्रवेश करने की कोशिश करने लगी लेकिन काशी के सैनिकों ने उनके नापाक मंसूबो को कामयाब नहीं होने दिया। तब एक अंग्रेज रेजीडेंट ने राजा साहब से मिलने क़ी इच्छा जाहिर क़ी और कहलवाया कि वो गवर्नर साहब का एक जरुरी सन्देश ले कर आया है, लेकिन सैनिकों ने ये संदेह प्रकट किया कि वो इतनी सेना साथ क्यों लाया है? इसके जवाब में रेजिडेंट ने ये कहकर नई चाल चली कि सेना तो वैसे ही उसके साथ चली आई है, किले में केवल हम दो-तीन अधिकारी ही आएंगे. इस पर राजा साहब क़े आदेश पर उन्हें अन्दर किले में भेज दिया गया।

बातों ही बातों में दोनों ओर से तलवारें खिंच गईं, इसी दौरान एक अंग्रेज अधिकारी ने राजा चेत सिंह को लक्ष्य कर बन्दूक तानी, जब तक उसकी अंगुली बन्दूक के ट्रिगर पर दबती कि उसके पहले काशी के महशूर गुंडे बाबू नन्हकू सिंह क़ी तलवार के एक ही वार से उस अंग्रेज अधिकारी का सर कट कर दन से जमीन पर आ गिरा, चारों ओर खून ही खून बिखर गया, जिसे देख कर खून से सने अंग्रेज अधिकारी चीखते-चिल्‍लाते उल्‍टे पांव बाहर भागे. उधर किले के बाहर चारों तरफ छिपे किन्तु सतर्क काशी के वीर रणबांकुरों ने देख कर ये समझ लिया कि अन्दर किले में मार-काट मच गई है। फिर क्या था सभी बाज क़ी तरह गोरी चमड़ी वालों पर टूट पड़े, लेकिन किस ने किस को मारा ये तो आज तक पता नहीं चल सका, लेकिन शिवाला घाट पर बने किले के बाहर लगे शिलापट्ट पर अंग्रेजों ने ये जरुर अंकित करवा दिया कि इसी जगह पर तीन अंग्रेज अधिकारियों लेफ्टिनेंट स्टॉकर, लेफ्टिनेंट स्कॉट और लेफ्टिनेंट जार्ज सेम्लास समेत लगभग दो सौ सैनिक मारे गए थे।

इस घटना के तुरन्त बाद राजा काशी नरेश के मंत्री बाबू मनियर सिंह ने गवर्नर वारेन हेस्टिंग को गिरफ्तार करने क़ी सलाह राजा साहेब को दी, लेकिन उनके दीवान बक्शी सदानंद ने उन्हें ऐसा कराने से मना कर दिया। उधर वारेन हेस्टिंग अपने पकडे़ जाने के डर से "माधव दस बाग" के मालिक पंडित बेनी राम से चुनार जाने के लिये सहायता मांगी. इसी बीच उसे पता चल गया कि राजा साहब क़ी एक बड़ी फौज उसे गिरफ्तार करने इसी तरफ आ रही है। कहते हैं कि अपनी गिरफ्तारी के डर से वारेन हेस्टिंग उसी माधव दास बाग के भीतर बने एक कुँए में कूद गया और जब रात हुई तो वो स्त्री का भेष धारण कर चुनार क़ी ओर कूच कर गया। राजा चेतसिंह के दीवान बक्शी सदानंद क़ी ये सलाह कि वारेन हेस्टिंग को गिरफ्तार ना किया जाय, भारत के लिये दुर्भाग्यपूर्ण रहा। अगर उस दिन वारेन हेस्टिंग काशी नरेश क़ी सेना के हाथों गिरफ्तार कर लिया गया होता तो शायद अंग्रेजों के पांव भारत में ही ज़मने नहीं पाते.

मजे क़ी बात तो ये है कि अंग्रेज इतिहासकारों ने काशी नरेश राजा चेतसिंह को भगोड़ा साबित किया है और वहीं दूसरी तरफ शिवाला घाट पर जो शिलापट्ट लगवाया उस में साफ-साफ शब्दों में लिखवाया कि "इसी जगह उनके तीन अधिकारियों सहित दो सौ सैनिक मारे गए थे। जिसे आज भी देखा जा सकता है लेकिन वो वारेन हेस्टिंग के भगोड़ा होने क़ी बात पर चुप्पी साध गए। अगर इस घटना पर विचार करें तो स्वतंत्रता आन्दोलन का पहला बिगुल काशी में ही बजा था, लेकिन दुर्भाग्य ये है कि उस घटना क़ी याद में आज तक यहाँ पर कोई स्मारक नहीं बन सका है। हाँ इस दिन यानी १६ अगस्त को जिन परिवार के पूर्वजों ने स्वतंत्रता के लिये उस दिन अपनी क़ुरबानी दी थी उनके परिजन जरुर एक "दीपक" उनकी याद में जलाते हैं। उस गौरव गाथा को आज भी इस प्रकार गया जाता है,

घोड़े पर हौदा, हाथी पर जीन, चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग...!

धर्मपाल जी अक्सर कहा करते थे बनारस की क्रांति. आज उसको विस्तार से पढ़कर कई जानकारी मिली. धर्मपाल जी नो एक बात और कहा है कि असहयोग का सबसे पहला प्रयोग बनारस में हुआ था और गांधी के भारत आने से बहुत पहले. संभववतः गांधी जी ने उसी बनारस के असहयोग से प्रेरणा ली थी. इस बारे में आपको कुछ पता है क्या?

अभी साहित्य अमृत में एक लेख छपा है देवेन्द्र स्वरूप का. जिसमें उन्होंने विस्तार से बताया है कि 1857 की क्रांति के पीछे पूरबियों (पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार) का कितना बड़ा योगदान था. वे तो यहां तक निष्कर्ष निकालते हैं कि पूरब के लोग नहीं होते तो 1857 की क्रांति होती ही नहीं. 
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Friday, August 15, 2014

युवा नेता" बनने की विधि

आइए जानें: कैसे बनें नेता

भारत भाग्य विधाता कौन, आम आदमी, यह तो सदी का सबसे बड़ा जोक होगा। पैसा हो सकता है, मगर उसे चलाने वाले कौन, उद्योगपति, मगर उनके भी हित कहीं और से सधते हैं। सही समझ रहे हैं आप लकदक खादी में सजे, चेहरे पर लालामी और माथे पर तमाम परेशानियों की वजह से कुछ सिलवटें लिए नेता ही तय करते हैं समय की रफ्तार। मगर नेता बनना इतना आसान तो नहीं। कोई फिक्स रास्ता नहीं, कोई फिक्स कोर्स नहीं और आगे बढ़ने का कोई श्योर शॉट जरिया नहीं। मगर कुछ बातें ऐसी हैं, जिनका आप तन, मन और धन (जी हां नेता बनने में धन की भी अहम भूमिका है) से पालन करें तो आपको भारत का नहीं तो अपने भाग्य का समृद्ध विधाता बनने से कोई नहीं रोक सकता। तो इस बार जानिए नेता बनने के कुछ नुस्खे, जिनका इस्तेमाल खालिस नकल के बजाय कुछ अकल लगाकर किया जाए, तो आपको नेता बनने से कोई नहीं रोक सकता।

कोई पैदाइशी नेता नहीं होता। (इसमें वे कुछ हजार परिवार शामिल नहीं हैं, जिनका पैतृक कारोबार राजनीति का है) नेता बनने के लिए बहुत लगन से काम करना होता है। शतरंज की बिसात की तरह सिर्फ अपने नहीं, दूसरों के मोहरे पर भी नजर रखनी होती है। आप नेता बनना चाहते हैं, अच्छी बात है, मगर पूरी तैयारी के साथ सफर शुरू नहीं किया तो किसी छोटे-मोटे मोर्चे के उप-सह सचिव बनकर ही रह जाएंगे।

"युवा नेता" बनने की विधि. . . . . . . . .
आवश्यक सामग्री :- १ SUV दस-बारह लाख की ।।
सफ़ेद कलफ लगे कुर्ते-पजामे, सफ़ेद लिनेन के शर्ट पेंट ।।
सोने की २  चेन ।।
सोने की अंगूठी-ब्रेसलेट ।।
२ आई फोन ।।
ब्रांडेड जूते-सेंडिल ।।
ब्रांडेड कलाई घडी ।।
१ चश्मा Ray ban का ।।
क्लासिक का सिगरेट पैकेट ।।
रजनीगंधा का डिब्बा ।।
४ -६ जी हुजूरी करते चेले।


कैसे बने :- अपने SUV के नंबर प्लेट में नंबर की जगह अपनी पार्टी के झंडे का चिन्ह बनवाये और अपने ४ -६ चेलो को अपनी SUV में सदैव बैठा कर रखे।।

SUV में बैठ के मोबाइल कान में ही लगा के रखे।।
अपनी देह को कुर्ते-पजामे और सोने
के आभूषण से सुसज्जित करे।।
और किसी भी एक नेता के इर्द गिर्द परिक्रमा प्रारम्भ करे।
अपने नेता को प्रसन्न करने के लिए "मंच-माइक-माला" की यथासंभव ज्यादा से ज्यादा व्यवस्थाये करे ।

नेता जी के आगे पीछे घूमते हुए उनकी "सेवा-पूजा" करते रहे, अपने नेता जी के साथ और उनके भी नेता जी के साथ फोटो खिंचवा कर घर एवं अपने व्यापारिक
प्रतिष्ठान में लगावे ।

हर छोटे बड़े कार्यक्रम, त्यौहार, जन्मदिन पर पुरे शहर में फ्लेक्स लगवाये ।।
मीडिया के लोगो से सेटिंग कर अपनी फ़ोटो अखबारो में छपाते रहे ।।

समय समय पर अपने क्षेत्र में
चतुर्थ श्रेणी के सरकारी अधिकारियों पर रौब झाड़ते रहे ।
लो जी अब तैयार हैं शहर
का एक और युवा नेता!

अरे हम किसी तख्तापलट की बात नहीं कर रहे, बस एक बेसिक मंतर सिखा रहे हैं। जिसके पास भीड़ है, वही हिट है, चाहे सिनेमा हो या फिर पॉलिटिक्स। आपने देखा होगा, मोहल्ले के भइया जी या इलाके के पार्षद या फिर विधायक जी को। उनकी एक आवाज पर सैकड़ों लौंडे-लफ्फाड़े जुट जाते हैं बाइक पर सवार होकर। मरने-मारने को तैयार दिखते। रैली है, प्रदर्शन है या फिर पार्क में कल्चरल प्रोग्राम, यही युवा काम आते हैं। तो आपको भी इन्हीं पर फोकस करना है। कैसे करना है, यह आप तय करें। सामने वाले पार्क में पार्षद जी से कहकर एक वॉलीबॉल कोर्ट बनवा सकते हैं। कल्चरल नाइट का रसीद-कट्टा बनवाकर लड़कों को 10 फीसदी कमिशन पर दे सकते हैं और फिर आगे की सीटों से लेकर डांसर लाने तक का इंतजाम साथ में कोई हरकत न हो, इसकी जिम्मेदारी उनकी। 

यह जनता शातिर भी है और भोली भी। इसलिए जब भी कोई किसी काम के लिए आए, तो न तो बोलें ही न। काम हो या न हो, ठोस आश्वासन जरूरी है। एक चुटकुला शायद इस समझने में आपकी मदद करे। जंगल में सभा हुई, सब जानवर बोले - शेर बहुत परेशान करता है। बंदर बोला, किसी को नेता बना लें, हमारी बात भी सुनी जाएगी। सब राजी हो गए मगर नेता बने कौन? फिर बंदर आया और बोला मैं ही लेता हूं यह कठिन जिम्मेदारी। कुछ दिनों बाद शेर बकरी के बच्चे को उठाकर भाग गया। बकरी पहुंची बंदर के पास। बंदर फौरन निकल पड़ा। पीछे-पीछे जंगल के बाकी जानवर। शेर एक मैदान में बैठा शिकार को तड़पा रहा था। बंदर यह देखकर एक डाल से दूसरी डाल पर कूदने लगा। कुछ देर बाद जानवरों ने पूछा, अरे कुछ करते क्यों नहीं। बंदर ने जवाब दिया, देखो मेरी भागदौड़ में तो कोई कमी नहीं।

यह गुरुमंत्र कान में फूंक लें। सब कुछ छूट जाए, विचारधारा, नेता जी या फिर रुपया-पइसा, मगर जनता का साथ न छूटे। जनता साथ है तो आप निर्दलीय भी चुनाव जीत सकते हैं, नई पार्टी बना सकते हैं, आंदोलन खड़ा कर सकते हैं, कुल मिलाकर यह कि इतिहास की धारा बदल सकते हैं। मगर जनता साथ छूटी तो राजनीति अमर चित्र कथा की तरफ सिर्फ किताबों में नजर आएगी।
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Wednesday, March 5, 2014

वाह गुरु वाह.....और पीछे से तो मेरी ही लेता है..

“समाज में बस लोग सिर्फ़ एक ही चीज़ से डरते हैं.. वो है बदनामी...पर क्या आप जानते हैं.. कि बदनामी में भी नाम होता है.. लोग बदनामी के डर की वजह से अपने घर को ही पंचायत और खुद को सरपंच बना लेते हैं.. जैसे बस अब सारे फैसले अपने हक में ही हों... पर जितना हम उसे रोकने की कोशिश करते हैं.. फिर भी वैसा हो ही जाता है.. पता है क्यों???? जब रबड़ को ज्यादा खींचकर छोड़ते हैं.. तो चोट हमें ही पहुंचाती है... और अगर कसकर खींच दो तो टूट जाती है... कहीं हम समाज से रिश्ते निभाते-२ अपनों से दूर तो नहीं हो गये.. कहीं हमने अपने घर को परीक्षा-भवन और स्वयं को जांचकर्ता तो नहीं बना लिया??


आज दोस्तों के साथ बैठा था.. लोग जिंदगी कि कितनी परिभाषाये बता रहे थे.. जिंदगी कितनी आसान है.. अपना अपना नसीब है भैया ..............

 हसी आ रही रही है .. हमारे एक सहपाठी ने कितना अच्छा जिंदगी को परिभासित किया.. हमारे बच्चे तो चाँद पर घूमने जायेगे.. हम तो २ दिन के लिए जाने के लिए कितनी तयारी करते है.. अभी घूमने और मस्ती करने का समय है.. आज लगा हम भारतीय कितने कूप मंडूक है.. वास्तव में जिंदगी तो भारत के बाहर है.. हम लोग तो सिर्फ फेसबुक .. वो भी ऑफ लाइन हो कर ऑनलाइन हुवे तो कोई मैसेज पेल देगा .. ये मेरा पेज लाइक कर लो.. या देश कि कोई राजनीती.. हम बस इसी में परेशां है..

अपने बारे में कम देश के बारे में.. ज्यादा.. जब आपको अपनेसे ज्यादा, अपनोंका दर्द सताए तो समझिये, वही सच्चा दोस्त है।

स्वार्थी दुनियामें तुलसी दास जी वह पंक्ति याद करें-
 जेन मित्र दुख होंहि दुखारी, तिनहि विलोकत पातक भारी।

मुझे लगता है भारती लोगो को भी बायलर मुर्गे या हाईब्रीड के तरह बनाना चाहिए..
सोच में फर्क आएगा... हम लोग तो संस्करों के बिच में मरते है काम धाम नहीं तो राजनीत करते है..

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है की ना तो हम अपनी ही पीठ थप-थपा सकते है ............
और ना ही अपने आप को लात मार सकते है ............
इसलिए हर इक मित्र और आलोचक जरूरी होता है ......

भगवन ये क्या लीला है तेरी.. अगर तू एक ही है.. कैसे इतने तरह के इन्सान बनाये.. आज के युग में तो किसी मोल में भी इतनी तरह का प्रोडक्ट नहीं मिलता..
और तू इतने तरह के इन्सान बना डाला .... कोई  भारत का कोई कही का..

एक तरफ तो गीता में लिखवाता है
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥

हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझ में अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझ में युक्त्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ।। १४ ।।ॐ ~ψ~ || Shrimad Bhagwad Gita – Chapter 8 – Shloka 14 || ~ψ~ ॐ

और पीछे से तो मेरी ही लेता है..

वाह गुरु वाह..

कलाकार है तू यार..

याद आता है एक शेर

न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में
ख़ुदा होता
हमीं से यह तमाशा है, न हम होते
तो क्या होता
न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-
पा होता
*आलम ज़ेरे-पा=दुनिया संसार पैरों के
नीचे
घटा छाती, बहार आती,
तुम्हारा तज़किरा होता
फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-
दिल हरा होता
*तज़किरा=ज़िक्र
बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से
उठवाया
हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर
दिया होता
तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लौट
आए
तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ
कहा होता
~ नौशाद 'लखनवी'


अब क्या लिखे.. सपने तो लग गए बट्टे खाते.. देर हो चुकी है..   हम सिर्फ अपनी बनायीं ही दुनिया देखते है..  दूसरा कोई बनाये तो अपनी राय ही पलते  है..  खुद तो खुद कर सकते नहीं .. हा अपना तो सिर्फ एक ही.. अपना हाथ जग्गनाथ.. ... बजाते रहो.. मस्त रहो मस्ती में आग लगे बस्ती में..

सिर्फ आपना ही.. अहम् ब्रस्मामी 



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Friday, February 14, 2014

संत वेलेंनटाइन की जय जय

 अरे यार .. मेरा तो सुबह ही वेलेंनटाइन डे का सन्देश पत्नी जी के मोबाईल से बनारस से चला है अभी तक नहीं पंहुचा ....कितना ट्राफिक जाम है मोबाईल का ..
चलो मान लेता हूं उमर बढ़ रही है.. अब बुड्ढा जो हो रहा हु ) :(   वैसे मोबाईल का ट्राफिक जाम भी क्यों न हो..


 काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

ये हमारे देश के सविधान निर्माता भी न .. आज बाबा वेलेंनटाइन के प्रणय दिवस के दिन रविदास जयंती बना रहे है .. उपर से सरकारी छुट्टी .. मम्मी पापा घर में , और बनारस में झमाझम बरसात, अब  बच्चे निकले भी तो कैसे , निकल भी जाये तो बैठेगे कहा, सब जगह गिला गिला ... उपर से शिव सेना का डर, तो बचे मोबाईल बाबा ... अब तो पहले लोकल डिलेवरी ही पहले देगे न.. हम ठहरे तड़ी पार, उपर से सफ़ेद बाल..
कहते है  प्रेम का कोई एक दिन नहीं होता, लेकिन हम जैसे १४ साल पुराने ब्याहते को आधुनिक समाज के नौजवानों और ब्रम्हा रचित कन्याओ के देख कर मन में एक टिस सी उभरती है , अब क्या करे दिल तो इस मामले में बच्चा है जी ...
सब समय का खेल है मित्रो, आज काम धाम में मन ही नहीं लगा, सारा दिन मोबाईल को निहरता रहा , कब आएगा मेरी प्रेयसी के इजहार-ए-मुहब्बत का पैगाम ...अभी तक नहीं आया , और अब तो ये सुभ पर्व के बिदाई कि घडी भी आ गयी है ...

 
आज हमारे यहाँ काठमांडू में भी वरुण देव भी नाराज थे , सुबह से मीठी मीठी बारिश, और कुलकुलाटी  हुई  गुलाबी ठण्ड, रास्तो के ब्रम्हा रचित कन्याओ का नजारा देख कर ऐसा लगा कि मै अफ्रीका के ५५ डिग्री के तापमान में हु, इतनी गर्मी आयी, अब क्या करू दिल तो पत्थर का तो है नहीं, पिघल ही जाता है , अब ये देख कर तो प्रेम तो रगों में रक्त में बहने लगा

काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

इतिहासकार बांचते है कि14 फरवरी यानि वैलेंटाइन डे का इतिहास भी प्यार से भरा हुआ है. वैलेंटाइन डे को मूल रुप से संत वैलेंटाइन के नाम पर मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि वैलेंटाइन-डे मूल रूप से संत वेलेंटाइन के नाम पर रखा गया है. परंतु संत वैलेंटाइन के विषय में ऐतिहासिक तौर पर विभिन्न मत हैं और कुछ भी सटीक जानकारी नहीं है. कहा जाता है कि संत वैलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को नेत्रदान किया व जैकोबस को एक पत्र लिखा, जिसमें अंत में उन्होंने लिखा था तुम्हारा वैलेंटाइन’. यह दिन था 14 फरवरी, जिसे बाद में इस संत के नाम से मनाया जाने लगा और वैलेंटाइन-डे के बहाने पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम का संदेश फैलाया जाता है. संत वैलेंटाइन मानवता से प्रेम करते थे और उन्होंने समाज में आपसी प्रेम को हमेशा बढ़ावा दिया. और अपने भारतीय नजरिए से देखें तो वैलेंटाइन वसंत के महीने में आता है. और वसंत प्यार का ही महीना होता है. इस तरह वैलेंटाइन का क्रेज भारत में भी अब बढ़-चढ़ कर बोलता है. आज आप भी जिसे प्यार करते हैं उससे अगर अब तक मन की बात नहीं कही तो कह डालिए हो सकता है आपके गुलाब देकर प्रपोज करने का अंदाज उन्हें भा जाए और आपके प्यार का पैमाना उन्हें मालूम हो जाए.
काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

वैलेंटाइन डे आज एक ग्लोबल फेस्टिवल बन गया है. और बने भी क्यों न जबकि इस दुनिया को प्रेम की जरुरत है और जो त्यौहार हमें आपस में प्रेम रखना सिखाए वह तो और भी जरुरी होता है. यह त्यौहार 14 फरवरी को हर देश में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है. खासकर पश्चिमी देशों में तो इस दिन का एक अलग ही अंदाज और शवाब होता है. और पश्चिम ही क्या अब तो दुनिया के हर हिस्से में इसकी अच्छी खासी धूम देखने को मिलती है.  इस दिन फूल और तोहफे हर दिल की धड़कने बढ़ा देते हैं.
काठमांडू के दरबारमार्ग के सडको की रौनक
 यह कोई जरुरी नहीं कि आज का सिर्फ प्रेमी-प्रेमियों के लिए ही बना है. आज का दिन तो प्रेम को दर्शाने के लिए होता है और प्रेम सबके बीच होता है एक मां का उसके बच्चे के प्रति, एक दोस्त का दोस्त के लिए या पति का अपनी पत्नी के लिए. आज के दिन आप जिससे भी प्यार करते हैं या उसके प्यार के लिए उसे धन्यवाद देना चाहते हैं तो उसे अपना वैलेंटाइन बनाइए, गुलाब दीजिए और उसके प्यार के लिए उसे थैंक्स कहिए.
काठमांडू के दरबारमार्ग में के.फ.सी ओर पिज़्ज़ा हट
  भारत में वेलेंटाइन डे मनाए जाने की शुरूआत करीब 1990 के आसपास हुई। लेकिन भारत में ये सभ्यता पुरानी मानी जाती है। बंगाल में सरस्वती पूजा को भी प्यार का दिवस माना गया है। साथ ही प्यार के भगवान कामदेव को भी इस त्योहार से जोड़ कर देखा जाता है। क्योकि पुरानी सभ्यता में कामदेव को पूजा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे ये सभ्यता समाप्त हो गई। वेलेंटाइन डे के दिन हम हमारा प्यार दुसरों को जाहिर करते हैं जिससे आपस में प्यार बढ़ता है। जिसे कामदेव की सही पूजा माना जाने लगा है

लेकिन आज तो भारत में सुना है
वैलेंटाइन्स डे पर कंडोम और पिल्स की बिक्री ने
गुलाब और गिफ्ट्स को पीछे छोड़ा !
वैलेन्टाइन्स डे पर सुरक्षित सेक्स के इन
उपायों की मांग करीब 10 गुना तक बढ़ गई. कई
मेडिकल स्टोर्स पर कंडोम औप पिल्स का स्टॉक
खत्म होने की भी खबर है. 

                  इस प्यार को क्या नाम दूं ?
काठमांडू का डिस्को थिक

इजहार-ए-मुहब्बत का प्रतीक वेलेंटाइन डे हमारे काठमांडू में मनाया जा रहा है । प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी युवा इस पर्व का बेसब्री से इंतजार कर रहे है। वेलेंटाइन डे पर शहर की गिफ्ट गैलरियों की दुकानें व फूलों की दुकानें विशेष रूप सजी हुई दिखाई दी। इनमें ग्रीटिंग कार्ड, पोस्टर व उपहार आकर्षक ढंग से सजाए गए थे। युवा सुबह से ही गैलरियों में आकर्षक शब्दावली वाले कार्ड ढूंढते नजर आए। पर्व को लेकर कई होटलों व रेस्तराओं में भी विशेष व्यवस्था की गई है। लेकिन सबसे खास बात ये  है कि वैलेंटाइन का क्रेज मुझे आज यहाँ कि कन्याओ के वस्त्र को देख क़र दिल जवान हो गया है ..

मैंने भी सोचा चलो आज अकेले ही संत वैलेंटाइन की पूजा की जाये , सो काठमांडू के दरबार मार्ग इस्थित नेपाल s बी आई के ऐ टी म में लगे प्रेयसी जोड़ो की लाइन से मन विचलित हो गया, पैसा भी नहीं निकल पाया, मन में सोच लिया अगले साल तो चप्पक के वैलेंटाइन पर्व मेहरारू के साथ मनाउगा
 प्रणय दिवस कि बेला में कुछ ऐसा रहा कमरे काठमांडू का दरबार मार्ग


चलो भाई ... सभी
कुँवारो को 'हैप्पी वैलेन्टाईन'डे।

और         शादी-शुदा को 'हैप्पी बेलन-टाईट'डे।
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Saturday, February 8, 2014

ये दोस्त भी कैसे है

ये समाज भी कैसा है.. ये दोस्त भी कैसे है .. कुछ समझ में नहीं आता..


पैसे कमाने कि धुन .. पत्नी से दूर रहो ..
दोस्त पूछते है

कैसे रह जाते हो यार
क्या नामर्द हो ?

या बीबी का कोई और यार है ?
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Saturday, January 18, 2014

पानी सुख का बर्फ हो गया

ठण्ड में नदी का पानी सुख का बर्फ हो गया .. इस लिए हमारे यहाँ लोड शेडिंग चल रही है
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कड़ाके कि ठण्ड है .. फिर भी रोज सुबह ठन्डे पानी से नहाना है..
जिंदगी भी संस्करों कि पहेली हो गयी है .. ये तो वही हाल हो गया है..

दस्त हो रही है.. पेट ख़राब है
फिर भी शंख बजाना है
;)
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Saturday, January 11, 2014

क्या आप ने कभी बीबी कि क़ुरबानी समझी है

चलो समझ गया..

क्या आप ने कभी बीबी कि क़ुरबानी समझी है..
आप के बच्चो को पैदा करती है..
सुबह आप को उठाती है.. चाय के साथ
आप के लिए खाना बनाती है..
कई बार पति का मुह मोज़े जैसा होता है.. उसका भी पत्नी ख्याल रखती है..
पति तो सुबह सुबह ४ पराठे ठूस कर ऑफिस निकल जाते है
कभी पतियो ने सोचा है.. कितना काम करती है पत्निया..
कपडे वपड़े.. बच्चे कच्चे.. ये वो.. खाना वाना..
अरे ... बच्चा पैदा करो तो पता चल जाये आपको

Sorry Darling.. Sorry.. Love you darling..
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