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Tuesday, September 1, 2020

सांडा...मर्दाना कमज़ोरी के नाम पर जान गंवाने वाला

 #सांडा...मर्दाना कमज़ोरी के नाम पर जान गंवाने वाला
मासूम जानवर

पाकिस्तान से लेकर राजस्थान के गरम रेगिस्तानी इलाक़ों में रेत पर रेंगता ये मासूम सा जानवर सांडा कहलाता है.शिकारी और परिंदों से बचते इसके दिन गुज़रते हैं लेकिन ये ख़ुद को इंसान से नहीं बचा पता. इसका वैज्ञानिक नाम युरोमेस्टिक हार्डवीकी है. छिपकली जैसा दिखने वाला ये सरीसृप परिवार का प्राणी है. शक़्ल से भले शक्ति कपूर जैसा डरावना हो लेकिन होता है सीधा आलोक नाथ जैसा. इसी सीधेपन का फायदा उठा कर शिकारी इनको धर लेते हैं.दूसरे हर जानवर की तरह इसमें भी चर्बी पाई जाती है इसकी चर्बी पर इंसान की ख़ास नज़र है. इसलिए ये आपको लाहौर की गलियों, चौराहों में सड़क किनारे या फिर ठेलों, दुकानों पर बैठा मिलेगा. मगर सांडा वहां ख़ुद से नहीं आता है. रेगिस्तान से पकड़ कर लाया जाता है.यहां ये चल फिर नहीं सकता क्योंकि इसकी कमर की हड्डी तोड़ दी जाती है. इसके बाद इसकी ज़िंदगी के दिन गिने चुने होते हैं.फ़ुटपाथों पर मजमा लगाए या फिर बड़ी-बड़ी दुकानों पर 'सांडे के शुद्ध तेल' की शीशियां सजाए सांडे के उन शिकारियों को ग्राहक मिलने की देर है, वो चाकू की मदद से इसका नरम पेट चीरते हैं और अंदर मौजूद चर्बी निकाल लेते हैं.ये सब कुछ ग्राहक की नज़रों के सामने किया जाता है. ताकि उसको तसल्ली हो की ये 'असली तेल' है.

ये शाकाहारी सरीसृप है ये कभी भी कीटों का शिकार नही करता है। ये बिना पानी पीये कई बर्षो तक जीवित रह 


सकता है ये पानी पीता है तो सिर्फ बरसाती ताज़ा पानी...बारिश आने से पहले अपने बिलों को ढक देता है जिससे हम ग्रामीण लोग बारिश होने की संभावना व्यक्त करते है...यदि इसकी गर्दन को काट भी दिया जाता है तो भी ये कुछ घंटों तक जीवित रहता है...ये सांडा नर लगभग 2 फ़ुट तक होता है और मादा इससे कम होती है...ये अपने मज़बूत पैर से किसी को नुक़सान नही पहुँचाते बल्कि ये बिलों को खोदने में काम लेते है...इनके पास तीन दाँत होते है एक ऊपर और दो नीचे...ये अप्रेल माह के आसपास संभोग करते है और मादा 10–15 तक अंडे देती है इनमें से आधे ये कम ही बच पाते है। इसके अन्दर दोनों पैरों के बीच में दो वसा की थैलियॉ होती है जिसके इसके पेट में चीरा लगाकर निकाला जाता है इस थैली की चर्बी को गरम कर दो तीन बूंद तेल निकल आता है बस. इतनी सी बात के लिए बेचारे को जान गंवानी पड़ती है. अब सुनो असली बात. यह लिंग के सेंटीनेंस के लिए दवाई है या नहीं है इसका तो पता नही लेकिन इसमें होता है पॉली अन्सेच्युरेटेड फैटी एसिड, जोड़ो और मांसपेशियों के दर्द में राहत देता है ये. तेल का उपयोग माँसपेशियों और नब्ज में रक्त संचार का काम करता है क्योकि ये बहुत ही गर्म तेल होता है लेकिन ज्यादातर इसका उपयोग लोग मर्दाना कमजोरी को दूर करने में करते है । बहुत सारे लोग सांडे को खा लेते है क्योकि इससे भी मर्दाना ताक़त और जोश का संचार होना एक कारण मानते है। बात करे इसके काम करने की तरीक़े की तो आप लोग अक्सर देखते हो पाकिस्तान के बाजारो में इन मासूम से सरीसृप की ढ़ेरो हकीमों के दुकानो पर अधमरे स्थिति में मिल जाते है हालाँकि भारत और पाकिस्तान दोनों में इसका मारना और तेल निकालना ग़ैर क़ानून है।

अब बात करते मर्दाना ताक़त की तो ये बात कुछ सच साबित होती है लेकिन जितना लोग सोचकर इसको ख़रीदते है उनके मुक़ाबले बहुत ही कम है...ये मालिस करने से रक्त संचार तो करता है लेकिन इसके साइंड इफ़ेक्ट भी हो सकते है क्योकि इसके मालिस से लिंग में अतिरिक्त माँस बनने लगता जो आपको परेशानी में डाल सकता है और मूत्र तक बंद कर सकता है...ये ना ही कोई लिंग वृद्धि करता है ना ही ताक़त उत्पन्न करता है क्योकि ये दोनों कार्य हार्मोन के कारण होते है न कि तेल के कारण। ये राजस्थान के इलाक़ों और कुछ हरियाणा पंजाब के इलाक़ों में भी पाया जाता है...इनको पकड़ना बड़ा आसान होता है क्योकि ये अपने बिलों को ताज़ा मिट्टी से ढककर रखते जिससे शिकारी लोग इन्हें आराम से खोज लेते है...फिर शिकारी लोग बिलों में धुआँ करते है जिससे इस मासूम को बाहर आना पड़ता है और शिकार जाल बिछाकर रखते है इनके बाहर आते ही इसकी कमर तोड़ देते है जिसके बाद ये भाग तो नही पता लेकिन कई महीनों तक ज़िंदा रहता है बाद में जैसे जैसे तेल लेने वाले आते है उनके सामने मारकर ताज़ा वसा का तेल निकालकर देते है। तेल को निकालने के लिए पहले साँडे के पेट पर चीरा लगाकर उसकी अन्दर की वसा निकाली दी जाती है ...ये वसा एक सांडे के अन्दर से दो थैलियाँ निकलती है फिर इनको निकालकर गर्म करने पर वसा से तेल निकलता है...एक सांडे से लगभग 1–5 ml तक प्राप्त होता है यानि 4–5 बूँद यदि आपको 100 ml तक चाहिए तो 50–60 सांडे मारने होगे...जो लोग बोतल भर कर देते है 3–4 सांडे मारकर वो सही नही है उसमें कुछ मिलाया जाता है...कुछ साँड़ों की वसा ज़्यादा होती है तो ज़्यादा भी मिल सकता है।

अन्ततः अगर आप सांडे के तेल में निकलने वाली चर्बी की मेडिकल जांच करें तो आपको पता चलेगा कि ये किसी भी जीव में पाई जाने वाली दूसरी चर्बी की तरह है और इसमें कोई ख़ास बात नहीं है'.सच तो यह है तेल में भी कोई ऐसी ख़ासियत नहीं है जो किसी भी तरह की यौन कमज़ोरी का इलाज कर सके. सांडे को बिना वजह मार दिया जाता है और ले दे कर ये सब पैसे का खेल है'.लोग इसको आलू की सब्जी की तरह खुल कर बेंच रहे हैं जबकि सांडा मारना अब गैरकानूनी है. इसको विलुप्तप्राय प्रजाति घोषित कर दिया गया है. अगली बार मर्द बनने के लिए किसी मजबूर का निकाला तेल लगाने की बजाय अमिताभ की फिल्म देख लीजिए और गाना गाइये- मैं हूं मर्द तांगे वाला. मैं हूँ मर्द तांगे वाला।।।

 Dharmendra Kumar Singh जी पोस्ट

 



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