मस्ती से भरल रहेला बनारस के लोग, उहवां के किस्सा पढ़के रउओ हो जाइब मस्त!
बनारसी संस्कृति अउर जीवनशैली क जीवनी तत्व मस्ती हौ. बनारसी बिना भोजन के रहि सकयलन, लेकिन मस्ती के बिना नाही रहि सकतन. खांटी बनारसी दूसरे जगह एही के नाते असानी से टिक नाही पउतन.
बनारस में आज भले ही धर्म क बोलबाला होय, लेकिन असल में बनारस धर्म के साथ ही देश क संस्कृति अउर विद्या क राजधानी हौ. संस्कृति भी गंगा-जमुनी. मस्ती बनारसी संस्कृति अउर जीवनशैली क जीवनी तत्व हौ. बनारसी बिना भोजन के रहि सकयलन, लेकिन मस्ती के बिना नाही रहि सकतन. खांटी बनारसी दूसरे जगह एही के नाते असानी से टिक नाही पउतन. बनारस में कहावत चलयला -जवन मजा बनारस में, उ न पेरिस न फारस में. आज भी कवनो बनारसी से पूछा कि आखिर बनारस में अइसन कवन खासियत हौ कि शहर से एतनी मोहब्बत हौ त उ इहय बात कही कि दुनिया में तमाम चीज मिलि सकयला, लेकिन बनारस जइसन मस्ती अउर बनारसिन जइसन अपनत्व नाही मिलि सकत.
बनारस में एक पन्नी गुरु क किस्सा सुना. हलांकि बनारस में सब गुरु हौ. यादव, दूबे, चउबे, मिश्रा, गुप्ता, सिंह, पटेल जइसन टाइटल बनारसी कगरी लगाइके रखयलन. गुरु तखल्लुस हिया बनारसी नागरिकता क पहिचान हौ. त पन्नी गुरु एक ठे पाने के दुकानी पर खड़ा रहलन. खड़ा का, घंटा भर से मुंहे में पान घुलइले जनता जनार्दन के बनारसी में ज्ञान देत रहलन. तबय बीचे में एक अर्द्ध बनारसी टपकि पड़ल -का बात कहत हय गुरु, अमेरिका रोज चांद पर आदमी भेजत हौ अउर तू हिया दुइ घंटा से खाली मुंहे में पान घुलावत हउवा. एतनय में टन्नी गुरु क भेजा गरम होइ गयल. पच्च से मुंहे क पान थूकलन अउर ताव में जवाब देहलन -देखा चाहे चंद्रमा होय या सूरज होय, जे सारे के गरज होई उ हिया आई, टन्नी गुरु टस से मस न होइहय. समझ में आयल कि नाही.
अजगर करय न चाकरी पंछी करय न काम,
दास मलूका कह गए सबके दाता राम.
त हर बनारसी एही सिद्धांत क पालन करयला. अउर बहरी अलंग के बहार क मजा लेवय के नाम पर देवतन तक के जीभी से पानी टपकयला. बहरी अलंग उ स्वर्ग हौ, जहां जाए बदे हर बनारसी मस्त मलंग मचलायल करयला. एकर मतलब इ नाही कि बनारसी लोग साधना करय उहां जालन. अरे बहरी अलंग बनारिसन के मस्ती क अड्डा हौ, पूरी पलटन के साथ रेजगारी (बच्चा लोग) लोगन के लेइके जालन. घरे में चाहे केतनव कचकच होय, लेकिन बहरी अलंग क निश्चय खंडित नाही होइ सकत. चाहे हड़ताल होय, या राष्ट्रपति शासन, राजा मरय चाहे रानी, कवनो भी कारण से अगर दुकान या दफ्तर बंद हौ त बनारसी हर हाल में बहरी अलंग क प्रोग्राम सेट कइ लेई. जवने तरह से व्यापारिन के भीतर हमेशा नफा-नुकसान जोड़य-घटावय क झक सवार रहयला, नेतन के दिमाग में हमेशा हर बाती में राजनीति घुसेड़य क सनक सवार रहयला, ओही तरह हर खांटी बनारसी के भीतर बहरी अलंग क धुन सवार रहयला.
बहरी अलंग कवनो तीर्थस्थल या पर्यटन स्थल नाही हौ. लेकिन बनारसिन बदे इ स्थान हर स्थल से बढ़ि के हौ. बनारसी गुरु लोगन क निच्छद्दम, स्वच्छंद होइके मउज-पानी लेवय क दिव्य स्थान. बनारसी भाषा में एके माचा मारब भी कहल जाला. बहरी अलंग ओही स्थान के कहल जाला, जहां पक्का तलाब होय. तलाब में चैचक पक्का घाट बनल होय, जहां तबीयत से साफा-पानी लगावल जाइ सकय. साफा-पानी मतलब नहाना-धोना, शरीर अउर कपड़ा क साफ-सफाई. अगर तलाब न भी होय त कम से कम बढ़िया क इनारा यानी कुंआ होय. आसपास पेड़-पल्लव, बगइचा, जंगल होेंय. निपटय लायक लंबा-चउड़ा मैदान होय, जवन साफ-सुथरा भी होवय के चाही. वरना गुरु लोग ठीक ओइसय मुंह बनइहय जइसन अफीमची इमली देखि के बनावयलन. बनारसी दरअसल निपटय क अत्यंत प्र्रेमी होलन. भोजन चाहे जइसन मिलय, सूतय क जुगाड़ भले ही गड़बड़ होय, लेकिन निपटय क स्थान दिव्य होवय के चाही. साफा लगावय लायक चैरस जमीन चाही. इहय कारण हौ कि बनारसी लोग जब बनारस के बहरे जालन त निपटय-नहाये क दिव्य स्थान तजबीजयलन.
रामनगर, सारनाथ, राजा तलाब के अलावा अब विंध्याचल अउर चकिया-चंदौली तक बहरी अलंग क विस्तार होइ गयल हौ. बहरी अलंग क खास पहिनावा भी होला. बहरी अलंग क प्रेमी गुरु लोग धोती, गमच्छा, निगोटा अउर दुपट्टा क उपयोेग करयलन. धोती अउर दुपट्टा न रही तबौ चलि जाई, लेकिन गमच्छा अउर निगोटा हर हाल में चाही. जरूरी समाने में बल्टी-लोटा, डोरी, सिल-लोढ़ा, साबुन क बट्टी, तेल क शीशी अउर भांग क पैकेट हर बहरी अलंग प्रेमी अपने संघे रखयला. बहरी अलंग पहुंचतय सबसे पहिले गुरु लोग निगोटा पर आइ जालन. भांग के खूब साफ कइके बूटी तइयार कयल जाला. बूटी छनले के बाद नटई तक पानी डकारिके हाड़ी या बल्टी लेइके लोग निपटय जालन. निपटय क क्रिया एतना खास हौ कि इ शोध करय लायक हौ. घंटा-आध घंटा निपटब त साधारण बात हौ. कुछ अइसन भी बनारसी होलन जवन कई घंटा तक निपटत रहि जालन.
निपटले के बाद अब मालिश क नंबर आवयला. मालिश क दौर तबतक चलयला जबतक कि शरीर क तापमान 100 डिग्री से ऊपर न पहुंचि जाय. एकरे बाद नहान अउर फिर डंड बैइठक. अगर गदा-जोड़ी मिलि गयल त ओहू पर रियाज होई. हर बनारसी अपने परिवार के लेइके साल में कम से कम दुइ दइया बहरी अलंग बदे सारनाथ अउर रामनगर जरूर जाला. गरमी में सारनाथ अउर जाड़ा में रामनगर. इ दूनो स्थान क मेला देखतय बनयला. लेकिन परिवार के संघे रहले के बाद भी गुरु लोगन के कार्यक्रम में कवनो कंजूसी नाही होत. ओही तरह से भांग छनयला, साफा लगयला अउर नहान-निपटान होला. इ कुल काम से फुर्सत भइले के बाद अहरा पर बनावल बाटी, चूरमा, दाल-भात अउर चोखा, तरकारी भिड़ावल जाला. बहरी अलंग क ही प्रभाव हौ कि बनारस में अक्सर दंगल होलन. नागपंचमी देश में चाहे जइसे मनावल जात होय, लेकिन बनारस में छोटे गुरु-बड़े गुरु के रूप में पूजा होला, अउर पूरे बनारस भर में दंगल होला. बनारस में दंगल खाली पट्ठन के बीच नाही होत, जानवरन के बीच भी होला. सड़क पर सांड़ गरजयलन. भइस, भेड़ा अउर पक्षिन क दंगल जाड़ा के मौसम में हर साल होला. बुलबुल, तीतर, बटेर क भी युद्ध होला. मकर संक्रांति पर खासतौर से पक्षिन क दंगल होला. इ कुल दंगल खाली खेल तक सीमित नाही होतन, बल्कि बाजी भी लगयला. अपने-अपने पक्षिन के बनारसी लोग पूरे साल दंगल बदे ट्रेनिंग देलन, तइयार करयलन. कजरी, बिरहा, अउर शायरी क दंगल गरमी के मौसम में होलन.
बहरी अलंग क असली अर्थ विश्वकोश में चाहे जवन भी होय, लेकिन बहरी अलंग के मट्टी में उ बहार हौ, जवन न त बंबई के चैपाटी में हौ, न कनाट प्लेस के नफासत में हौ. बनारसी लोगन के जेतना गर्व बहरी अलंग पर हौ, ओतना अपने नगर पर नाही. बनारस अउर बनारसी लोगन क असली रूप बहरी अलंग में ही देखल जाइ सकयला. बिना बहरी अलंग देखले इ समझब कठिन हौ कि बनारसी लोगन के अपने बनारस से एतना मोहब्बत काहे हौ. बहरी अलंग खाली दिल बहलाव क क्षेत्र नाही हयन, बल्कि अध्यात्म अउर साधना क क्षेत्र भी हयन. बनारस के तीनों लोक से न्यारी नगरी क सर्टिफिकेट देवावय में बहरी अलंग क महत्वपूर्ण योगदान हौ. मृत्युलोक के मारा गोली, स्वर्ग तक में बनारस के बहरी अलंग क मिसाल नाही हौ. लेकिन सरकार आधुनिकता अउर नियोजन के चक्कर में कई ठे बहरी स्थानन के भीतरी यानी शहरी रंग में रंगले जात हौ, जवन बनारसी लोगन बदे बड़ी समस्या बनल जात हौ.
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Sunday, September 27, 2020
मस्ती से भरल रहीला बनारस के लोग, उहवें के किस्सा पढ़े रउओ हो जाइब मस्त!
Thursday, April 13, 2017
Vinay kull विनय कुल
हम ठहरे खांटी बनारसी, दिमाक से वही तन्नी गुरु स्टाइल, आप समझ सकते है, २००३ में भारत से बाहर निकले तो एक नयी दुनिया देखी, लोग कितने ब्यस्त है, कितनी क्रिएटिविटी है, उनकी सोच कुछ अलग है है, लेकिन वो एक समाज के ऐसे कोने में है की लोगो की नजरे ही नहीं जाती, लेकिन हम सुनते सबकी है, करते अपने मन का, लोगो की सोच में मंथन करने का, ये बनारसियो की आदत है, जो दुनिया नहीं करती वो बनारसी करते है क्यों की बनारस में हर बिद्या के गुरु है, बनारसी हु, लेकिन बनारस गुरु लोगो की ही नगरी है, मस्ती का शहर, उसी क्रम में एक बनारसी मस्ती का अंदाज “ विनय कुल जी “ अब का तो पता नहीं, आज से २० साल पहले बनारस में संध्या कालीन अख़बार “ गांडीव “ जिसमे विनय जी के कार्टून “जवाब नहीं” नियमित रूप से बनारसियो का एक नशा था “ छान घोट के गांडीव पड़ना और दिन भर के थकान को विनय कुल जी के कार्टून के माध्यम से राहत .. उस समय चुकी आज जैसे मिडिया का जमाना तो था नहीं, बस पत्र पत्रिकाए, जिसमे विनय जी के हास्य ब्यंग दिख जाते ... अब मिडिया का जमाना आया तो एक दिन फेसबुक के एक पेज में साल २०१२ में धरा गए, जिन्होंने हम जैसे बनारसियो जो बनारस को प्रतक्ष्य नहीं देख सकते थे “सुबहे बनारस“ “हमारी काशी “ के भी दर्शन आप के माध्यम से होने लगा डरते डरते उनको फेसबुक पर निवेदन भेजे, स्वीकार हो गया, तो हमहू फुल के कुप्पा हो गए की आज पहली बार किसी दिब्य बनारसी के हम मित्र सूचि में जगह पाए है.. अब तो विनय जी की विधा पुरे सोसल मिडिया में छितरा रहा है, पुरे बनारस के सटीक जानकारी के एन्साक्लोपीडिया है, ३-४ बार मिलना हुवा, जो हास्य विधा में मालिक है, वो असल जिन्दगी में बहुत गंभीर, नपी तुली बात करने वाले और अपने उसूलो के कट्टर, नो एहर होहर, उनके साथ बनारस की और भी छुपी विधा के दर्शन हुवे, जिसे मैंने गूगल पर लिखने की कोशिश की है, क्यों की ये बनारस की प्रतिभा सिर्फ बनारस में ही न रह जाये, दुनिया के लोग जाने इसी क्रम में विनय कुल जी.
Thursday, April 14, 2016
बनारस का खाना
बनारस के खान पान पर एक सीरीज़ लिखने की इच्छा बहुत दिनों से थी लेकिन
“जाए दा” के आलस्य के बनारसी
महामंत्र के कारण लिखना संभव नहीं हो पा रहा
था. फिलहाल अचानक आज बनारस बेतरह याद आया और थोड़ा जोड़ तोड़ कर बनारसी
कचौड़ी-जलेबी पर ये पहला आलेख तैयार हो गया. यहां की कचौड़ी, लौंगलता, जलेबा और भांग वाली ठंडई जैसी तमाम खाने-पीने वाली चीजें लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बनारस का पान. बनारस का नाम जुबां पर आते ही सबसे पहले ' बनारसी पान' की तस्वीर सामने आ जाती है।
बनारस का खाना
जिसने न जाना
रह गया बेगाना:
उड़द की दाल की पीसी हुई थोड़ी मसालेदार पीठी को आटे में भर कर बनाई देशी घी से भरे कड़ाहे में नाचती वो
लाल लाल कचौड़ी और थोड़ा हल्का सुगंध का फ्लेवर
लिए मोटा जलेबा. ये है बनारस का राजसी नाश्ता.
कचौरी शब्द बना है कच+पूरिका से। क्रम कुछ यूं रहा- कचपूरिका > कचपूरिआ > कचउरिआ > कचौरी जिसे कई लोग कचौड़ी भी कहते हैं। संस्कृत में कच का अर्थ होता है बंधन, या बांधना। दरअसल प्राचीनकाल में कचौरी पूरी की आकृति की न बन कर मोदक के आकार की बनती थी जिसमें खूब सारा मसाला भर कर उपर से लोई को उमेठ कर बांध दिया जाता था। इसीलिए इसे कचपूरिका कहा गया।
दूसरी और जलेबी मूल रूप से अरबी लफ्ज़ है और इस मिठाई का असली नाम है जलाबिया । यूं जलेबी को विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वाले भी हैं। शरदचंद्र पेंढारकर (बनजारे बहुरूपिये शब्द) में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं। वे रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं जिसमें इस व्यंजन के बनाने की विधि का उल्लेख है। भारतीय मूल पर जोर देने वाले इसे ‘जल-वल्लिका’ कहते हैं । रस से परिपूर्ण होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका रूप जलेबी हो गया। फारसी और अरबी में इसकी शक्ल बदल कर हो गई जलाबिया।
फिलहाल बात करते हैं बनारस की कचौड़ी और जलेबी की!
महामंत्र के कारण लिखना संभव नहीं हो पा रहा
था. फिलहाल अचानक आज बनारस बेतरह याद आया और थोड़ा जोड़ तोड़ कर बनारसी
कचौड़ी-जलेबी पर ये पहला आलेख तैयार हो गया. यहां की कचौड़ी, लौंगलता, जलेबा और भांग वाली ठंडई जैसी तमाम खाने-पीने वाली चीजें लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बनारस का पान. बनारस का नाम जुबां पर आते ही सबसे पहले 'बनारस का खाना
जिसने न जाना
रह गया बेगाना:
उड़द की दाल की पीसी हुई थोड़ी मसालेदार पीठी को आटे में भर कर बनाई देशी घी से भरे कड़ाहे में नाचती वो
लाल लाल कचौड़ी और थोड़ा हल्का सुगंध का फ्लेवर
लिए मोटा जलेबा. ये है बनारस का राजसी नाश्ता. कचौरी शब्द बना है कच+पूरिका से। क्रम कुछ यूं रहा- कचपूरिका > कचपूरिआ > कचउरिआ > कचौरी जिसे कई लोग कचौड़ी भी कहते हैं। संस्कृत में कच का अर्थ होता है बंधन, या बांधना। दरअसल प्राचीनकाल में कचौरी पूरी की आकृति की न बन कर मोदक के आकार की बनती थी जिसमें खूब सारा मसाला भर कर उपर से लोई को उमेठ कर बांध दिया जाता था। इसीलिए इसे कचपूरिका कहा गया।
दूसरी और जलेबी मूल रूप से अरबी लफ्ज़ है और इस मिठाई का असली नाम है जलाबिया । यूं जलेबी को विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वाले भी हैं। शरदचंद्र पेंढारकर (बनजारे बहुरूपिये शब्द) में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं। वे रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं जिसमें इस व्यंजन के बनाने की विधि का उल्लेख है। भारतीय मूल पर जोर देने वाले इसे ‘जल-वल्लिका’ कहते हैं । रस से परिपूर्ण होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका रूप जलेबी हो गया। फारसी और अरबी में इसकी शक्ल बदल कर हो गई जलाबिया।
फिलहाल बात करते हैं बनारस की कचौड़ी और जलेबी की!
जब बाकी की दुनिया बेड-टी का इंतजार कर रही होती है, सयाने बनारसी सुबह छह बजे ही गरमा-गरम कचौड़ी
और रसीली जलेबी का कलेवा दाब कर टंच हो चुके होते
हैं। इस रसास्वादन अनुष्ठान के कर्मकांड रात के तीसरे पहर से ही शुरू हो
जाते हैं। भठठी दगाने और कड़ाहा चढ़ाने के बाद चार बजते-बजते शहर के टोले
मुहल्ले भुने जा रहे गरम मसालों की सोंधी खुशबू से मह-मह हो उठते हैं। एक
ऐसी नायाब खुशबू जो नासिका रंध्रों को उत्तेजित कर भूख को आक्रमक बना दे।
इस सुगंध से आप वंचित हैं तो समझिये आप स्वाद के एक भरे पुरे अहसास को मिस
कर रहे हैं। सुबह के पांच बजते न बजते तो खर कचौडि़यों की व्रत डिगा देने
वाली सोंधी गंध, सरसों तेल की बघार से नथुनों को फड़का देने वाली कोहड़े की
तरकारी की झाक और खमीर के खट्टेपन और गुलाबजल मिश्रित शीरे में तर करारी
जलेबियों की निराली गंध से सुवासित आबो हवा स्वाद का जादू जगा चुकी होती
हैं। एक ऐसा जादू जो सोये हुए को जगा दे। जागे हुओं को ब्रश करा कर सीधे
ठीयें तक पहुंचा दे। सात बजते-बजते तो विश्वेश्वरगंज के विश्वनाथ साव,
चेतगंज के शिवनाथ साव, हबीबपुरा के मम्मा,डेढ़सी पुल वाली दोनो दुकानों,
जंगमबाड़ी के बटुकसरदार, लोहटिया में लक्ष्मण भंडार, सोनारपुरा के वीरू और
लंका वाली मरहूम चचिया की दुकान पर नरम-गरम कचौडियों की आठ दस घानी उतर
चुकी होती है।ये कचौड़ी और जलेबी का combination है ....जैसे coke और चिप्स का है ........अब जलेबी तो दुनिया जहां में बिकती है ....पर बनारस की जलेबी की तो बात ही कुछ और है. 'बनारसी हलवाई जलेबी बनाने वाली मैदानी पर बेसन का हल्का-सा फेंट मारते हैं. जलेबियां कितनी स्वादिष्ट बनेंगी, यह फेंटा मारने की समझदारी पर निर्भर करता है. कितनी देर तक और कैसे फेंटा मारना है यह कला बनारसी हलवाई अच्छी तरह जानते हैं.
शहर बनारस का स्वादिष्ट कलेवा खर कचौड़ी और तर जलेबी, आपाधापी के इस दौर में भी मजबूती से अपनी जगह बनाए हुए है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले यह कलेवा झपोलियों में भरकर घर आया करता था। जल्दी भागो के इस दौर में यह नाश्ता भी अब फास्ट फूड से टक्कर लेने लगा है। चार कचौडिय़ों के साथ जलेबी फटाफट मुंह में डाली और चल पड़े अपने काम पर।
हालांकि स्पर्धा की होड़ में बनारस के इस पुराने व्यंजन के साथ अब इडली व डोसा भी टक्कर लेने लगे हैं। बावजूद इसके अपने अनूठे स्वाद के दम पर जलेबी-कचौड़ी की बादशाहत कायम है
यह बात अलग है कि स्वास्थ्य के प्रति सर्तकता बढ़ जाने के कारण कुछ लोग अब नाश्ते की फेहरिस्त में ओट्स और दलिया को प्रमुखता देने लगे हैं। टोस्ट और आमलेट भी जोर आजमाइश में है लेकिन बनारस की जीवन शैली में शामिल हो चुके जलेबी कचौड़ी को अब उसकी जगह से हटाना संभव नहीं है।
आज भी बनारस का आदमी बगल की दुकान पर अल सुबह भूने रहे मसाला की सुगंध से ही जागता है और नित्य काम से निबटने के बाद सीधे कचौड़ी.जलेबी की दुकान पर भागता है। जाड़ा, गर्मी या हो बरसात जतनवर के विश्वनाथ साव भोर में जब कचौड़ी के साथ चलने वाली सब्जी की बघार देते हैं तो पास.पड़ोस के बाशिंदों की नथुने फड़क उठते हैं। इसके बाद तो सारा आलस्य काफूर हो जाता है और लोग कचौड़ी.जलेबी के कतार में लग जाते हैं।
अंत में बनारसी कचौड़ी के बारे में बेढब बनारसी नें अपने हास्य उपन्यास लफ्टन पिगसन की डायरी में जो वर्णन किया है उसे पढ़ लेना भी बनारसी कचौड़ी जलेबी के स्वाद सा मनभावन है!
एक मिठाई की दुकान पर मैंने देखा कि एक आदमी बड़े-बड़े घुँघराले बाल रखे हुए बेलन से आटे की गोल-गोल गेंद बनाकर बेल रहा है और फिर एक कड़ाही में उसे डालता है। कड़ाही में घी खौल रहा था। वह झूम-झूमकर बेलना बेल रहा था। उसके श्यामल मुख पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं जैसे नीलाम्बर नक्षत्र में कभी-कभी तारे आकाश से टूटकर गिरते हैं वैसे ही पसीने की बूँदें नीचे गिरती थीं जो उसी आटे की गेंद में विलीन हो जाती थीं। पूछने पर पता चला कि यह दो प्रकार की होती हैं। एक का नाम पूरी है जिसका अर्थ है कि इसमें किसी प्रकार की कमी नहीं है। इसे खा लेने से फिर भूख में किसी प्रकार की कमी नहीं रह जाती। दूसरी को कचौरी कहते हैं। इसके भीतर एक तह आटे के अतिरिक्त पिसी हुई दाल की रहती है। पहले इसका नाम चकोरी था। शब्दशास्त्र के नियम के अनुसार वर्ण इधर से उधर हो जाते हैं। इसीसे चकोरी से कचोरी हो गया। चकोरी भारत में एक चिड़िया होती है जो अंगारों का भक्षण करती है। कचौरी खानेवाले भी अग्नि के समान गर्म रहते हैं, कभी ठण्डे नहीं होते। गर्मागर्म कचौरी खाने का भारत में वही आनन्द है जो यूरोप में नया उपनिवेश बनाने का
विश्व की प्राचीन नगरी काशी मंदिरों और घाटों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां का रहन-सहन, अक्खड़पन, खुशमिजाजी और सुकून लोगों को काफी पसंद है। बनारस की एक और चीज है, जो लोगों को इस शहर की तरफ खींच लाती है। वो है यहां का खान-पान। बनारसी पान हो या फिर टमाटर चाट, भांग वाली ठंडाई हो या फिर कचौड़ी, जो एक बार यहां के लजीज व्यंजनों का स्वाद चखता है, वो वाराणसी का और भी मुरीद हो जाता है।
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