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Saturday, March 25, 2017

आखिर ये धर्म है क्या ?

अभी बेटे का एग्जाम ख़तम हुवा, परेशान हो गया था वो ,हफ्ता हो गया अब उने वापसी का टाइम तो तो कल पशुपति नाथ मंदिर मंदिर गया था दीवाल पर एक नया वाल तो माँ मने मेरी धर्म पत्नी के साथ आ गए काठमांडू. एक  पेंटिंग लगा था ।। धर्म के लिए जीना सीखिए ।।  चुकी हाथ में पूजा का सामान पकडे थे नहीं तो फोटो खीच लेता लेकिन ये बात पड़ के सर चकरा गया। अब चूकि धर्म पत्नी साथ में थी तो धर्म पे वार्तालाप हो नहीं सकता था । ये सोच के की जब धर्म साथ में ही है तो क्या सीखे , मन मसोस के रह गए तो चुपचाप रहना ही उचित समझा । खैर शांत मन से मंदिर के अन्दर घुसा, लाईन लम्बी थे तो लग गए सबसे आगे धर्म पत्नी जी बिच में सुपुत्र जी पीछे है सिर्फ "पति" जिसमे कोई धर्म का सरोकार नहीं , लगे शिव जाप करने
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Sunday, May 22, 2016

फ्री सेक्स का होता !!

गुरू !! ई फ्री सेक्स का होता है हमको नहीं पता न पता करने की इक्षा है, हा अभी सोशल मीडिया पर ये मुद्दा उठाया है ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमन एसोसिएशन की सेक्रेटरी और सीपीएम (एमएल) पोलित ब्यूरोकी सदस्य कविता कृष्णन और उनकी मां लक्ष्मी कृष्णन ने। इस पोस्ट में उन्होंने जेएनयू के शिक्षकों को भी निशाने पर लिया है। जेएनयू के शिक्षकों ने २०१५ में एक दस्‍तावेज तैयार किया था, जिसमें यूनिवर्सिटी के छात्रों को सेक्‍स और शराब से भरे जीवन के बारे में बताया गया था। पोस्‍ट में दावा किया गया है कि कविता ने एक टीवी चैनल की डिबेट में कहा कि यह अफसोस की बात है कि कुछ लोग ‘फ्री सेक्‍स’ (अपनी मर्जी से किसी भी व्‍यक्ति से शारीरिक संबंध बनाना) से डरते हैं। इए कुल तो बड़े लोगो की बड़ी बाते है मै तो बस इतना ही जानता हूँ कि कुछ लोग बहुत ही सदाचारी होते हैं जो शादी से पहले सेक्स
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Monday, February 15, 2016

वैलेंटाइन रे वैलेंटाइन

अभी ऑफिस में वर्क लोड कुछ ज्यादा ही है, तो कुछ कम ही लिख पाते है... लेकिन इस साल कुछ खास सोचा था की इस साल हम संत वैलेंटाइन जरुर बनेगे.. इस लिए बनारस गया था पत्नी जी के साथ कुछ रोमांटिक फोटो खीचने के लिए, वैसे इस बार का थीम सोचा था " गोरी तेरा गाव बड़ा प्यारा " घाट किनारे बेटे की सायकिल ले कर उस पत्नी जी को बैठा कर कुछ रोमांटिक अंदाज में फोटो खिचाने का .. लेकिन कहते है न किस्मत थी .गांडू.. तो हम आ गए काठमांडू.. जाने दीजिये साहेब अब ज़िन्दगी में इतने मुक़दमे हैं .. एक मुकदमा मुहब्बत का भी सही ।

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Friday, February 5, 2016

नरेंद्र मोदी सरकार का गला न सूख जाए इस बार का आम बजट बनाने में...?

मोदी जी, इस बार पीएम नहीं देश फेल होगा

दो दिन बाद संसद के बजट सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। जिस पर संसद की ही नहीं बल्कि अब देश की नजर होगी आखिर मोदी सरकार की किन उपलब्धियों का जिक्र राष्ट्रपति करते हैं और किन मुद्दों पर चिंता जताते हैं । क्योंकि पहली बार जाति या धर्म से इतर राष्ट्रवाद ही राजनीतिक बिसात पर मोहरा बनता दिख रहा है । और पहली बार आर्थिक मोर्चे पर सरकार के फूलते हाथ पांव हर किसी को दिखायी भी दे रहे है। साथ ही  संघ परिवार के भीतर भी मोदी के विकास मंत्र को लेकर कसमसाहट पैदा हो चली है। यानी 2014 के लोकसभा चुनाव के दौर के तेवर 2016 के बजट सत्र के दौरान कैसे बुखार में बदल रहे है यह किसी से छुपा नहीं है ।
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Tuesday, September 22, 2015

#GoBackIndia और #BackoffIndia

हे आदरणीय सर्वश्रेष्ठ नर इंद्र..साष्टांग दंडवत  प्रणाम ...

आप को जान कर ये अत्यधिक प्रस्सनता होगी के आप के हिन्दू रास्ट्र के मुद्दे पर आप की कार्यविधि के कारण  #GoBackIndia और #BackoffIndia के साथ नेपाल में फेल हुआ भारत का एजेंडा, बहुत मेहनत की थी आप ने... सिर्फ १६ महीने में आप ने दो बार नेपाल का दौरा किया और १० हजार करोड़ रुपये और ना जाने कितने रूपये के चंदन का दान कर चुके हैं बस इस लिए की नेपाल एक हिन्दू राष्ट्र बना रहे। 
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Tuesday, August 18, 2015

नागपंचमी (पचैंईया) और बनारस

नागपंचमी का त्योहार तो वैसे पूरे देश में मनाया जाता है, लेकिन बनारस में इसका कुछ ज्यादा महत्व दिखता है। यह हिंदुओं का साल का पहला त्योहार होता है। नगर और जिले के गांवों में कहीं कुश्ती दंगल तो कहीं बीन की धुन पर जादू का खेल होता है। प्रायः हर घरों में लोग सुबह नागदेवता को दूध और लावा चढ़ाते हैं। कहा जाता है कि घर के दरवाजे पर लावा और दूध इसलिये रखा जाता है कि नाग देवता इसे ग्रहण करेंगे। कुश्ती-दंगल के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जलेबी की दुकानें भी सजती हैं लोग इसका खूब लुत्फ उठाते हैं। लेकिन बनारस में कहावत है "सात वार नौ त्यौहार", यानी सप्ताह में दिन तो सात होते हैं पर बनारस  में उनमें नौ त्यौहार पड़ते हैं। मौज-मजे के लिए सदा से प्रसिद्ध रहा है और अपनी इस प्रवृत्ति को चरितार्थ करने के लिएही बनारसियों ने अनेक त्यौहारों की कल्पनाएँ कीं। और लोग बहुत सी छुट्टियाँ मनाने के लिए बनारस वालों को नाकारा न कहें, इसलिए उन्होंने इनमें से अधिकतर त्यौहारों को भिन्न-भिन्न देवताओं के साथ जोड़ दिया। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण बनारसियों के जीवन में परिवर्तन होता चला जा रहा है फिर भी जिस प्रेम से छुट्टियाँ और त्यौहार बनारस में मनाए जाते हैं - वैसे भारत में और किसी दूसरी जगह नहीं। बनारसियों के त्यौहार का रंग भी कभी मनहूस नहीं होता। अपने थोड़े से वित्त में ही लोग हँस-खेल कर त्यौहार मना लेते हैं। बनारस के त्यौहारों के इतिहास पर अभी अधिक प्रकाश नहीं पड़ा है, पर इसमें संदेह नहीं कि इनमें कुछ मेले बहुत प्राचीन होंगे। बनारस की दीवाली का तो उल्लेख जातकों में आया है और जातकों में वर्णित हस्तिपूजन का भी बाद में शायद विजया दशमी का रुप हो गया है। इन मेलों तमाशों का संबंध हम यक्षपूजा, वृक्षपूजा, देवीपूजा, कूप और नदी-पूजा तथा पौराणिक देव-देवताओं की पूजा से पाते हैं। बनारस के मेलों तमाशों में भी एक विकास क्रम है जिससे यह पता चल जाता है कि कौन-कौन से मेले प्राचीन है और कौन-कौन से मेले बनारस की भिन्न-भिन्न काल की धार्मिक प्रवृत्तियों के विकास के साथ-साथ बढ़ते गए।
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Monday, August 17, 2015

बनारस की गालियाँ

वो बनारस का बचपन, खास मुझे याद आता है.. वो अस्सी का होली सम्मलेन, शायद मै जब बाहर किसी से अपने बनारस की बात करता हु, अगर वो पूछ ले हो गया आप के इज्जत का कबाड़ा.. लेकिन सही ये है की ये ही बनारस का रस है.. लोग गाली न दे तो शहर का अपमान है... “भोसड़ी के” तो बनारस का ताज है, अगर आप को न मिले तो बनारस नीरस लगेगा
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Saturday, August 8, 2015

काग चेष्टा, बको ध्यानम

बच्चों को सिखाया जाता है - काग चेष्टा, बको ध्यानम... मतलब ध्यान और लक्ष्य हमेशा केंद्रित.

""काक चेष्टा वको ध्यानम्,
श्वान निद्रा तथैव च,
अल्पहारी ,गृह त्यागी , विद्यार्थी पंच लक्षणम""

मतलब कि
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Thursday, August 6, 2015

असत्य के प्रचारक हैं हिन्दुत्ववादी

‘रथयात्रा’ के कारण जगह-जगह सांप्रदायिक उन्माद पैदा हुआ और दंगे हुए जिनमें सैकड़ों निरपराध व्यक्ति मारे
जिनका ‘रथयात्रा’ से कोई लेना-देना नहीं था, क्या ये मौतें आडवाणी की यात्रा का लक्ष्य स्पष्ट नहीं करतीं ?
गए

आडवाणी ने यह भी कहा था ‘मंदिर बनाने की भावना के पीछे बदला लेने की भावना नहीं है!’ अगर ऐसा नहीं था तो फिर अधिकांश स्थानों पर मुसलमानों के खिलाफ नारे क्यों लगाए गए? क्यों निरपराध मुसलमानों पर हमले किए गए उनके जानो-माल का नुकसान किया (इस क्रम में हिंदू भी मारे गए)।

दूसरी बात यह है कि इतिहास की किसी भी गलती के लिए आज की जनता से चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान से उत्तर और समर्थन क्यों मांगा जा रहा है? आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक स्व. बाला साहब देवरस ने 29 दिसंबर 1990 को कहा था कि मैं मुसलमानों से सीधा प्रश्न पूछता हूं कि क्या वे अतीत में ‘मंदिर को तोड़े जाने की स्वीकृति देते हैं’ अगर नहीं तो ‘वे क्या इस पर खेद व्यक्त करते हैं’ यानी कि जो मुसलमान इस प्रश्न का सीधा उत्तर ‘ना’ में दे? उसका भविष्य …? क्या होगा इस पर सोचा जा सकता है। मैं यहां एक प्रश्न पूछता हूं कि क्या आरएसएस के नेतागण हिंदू राजाओं के द्वारा मंदिर तोड़े जाने खासकर कल्हण की राजतरंगिणी में वर्णित राजा हर्ष द्वारा मंदिर तोड़े जाने की बात के लिए ‘हिंदुओं से सीधा प्रश्न करके उत्तर चाहेंगे?’ क्या वे ‘हिंदुओं से बौद्धों एवं जैनों के मंदिर तोड़े जाने का भी सीधा उत्तर लेने की हिमाकत कर सकते हैं?’ असल में, यह प्रश्न ही गलत है तथा सांप्रदायिक विद्वेष एवं फासिस्ट मानसिकता से ओतप्रोत है।

आडवाणी एवं आरएसएस के नेताओं ने इसी तरह के प्रश्नों को उछाला है और फासिस्ट दृष्टिकोण का प्रचार किया है। आडवाणी ने कहा था कि वे हिंदू सम्मान को पुनर्स्थापित करने के लिए रथयात्रा लेकर निकले हैं। 30 सितंबर को मुंबई में उन्हें 101 युवाओं के खून से भरे कलश भेंट किए गए थे। इन कलशों में बजरंग दल के युवाओं का खून भरा था। यहां यह पूछा जा सकता है कि ‘युवाओं के खूनी कलश’ क्या सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक थे? या सांप्रदायिक एवं फासिस्ट विद्वेष के? आखिर बजरंग दल के ‘मरजीवडों’ को किस लिए तैयार किया गया? क्या उन्होंने राष्ट्रीय एकता में अवदान किया अथवा राष्ट्रीय सद्भाव में जहर घोला?

आडवाणी एवं अटल बिहारी वाजपेयी ने जो घोषणाएं ‘राम जन्मस्थान’ की वास्तविक जगह के बारे में की थीं, वह भी सोचने लायक हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स के 18 मई 1989 के अंक में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि ‘उस वास्तविक जगह को रेखांकित करना मुश्किल है, जहां हजारों वर्ष पूर्व राम पैदा हुए थे,’ जबकि इन्हीं वाजपेयीजी ने 24 सितंबर 1990 को हिंदुस्तान टाइम्स से कहा कि ‘राम का एक ही जन्मस्थान’ है। यहां सोचा जाना चाहिए कि 18 मई 1989 तक कोई वास्तविक जगह नहीं थी, वह 24 सितंबर 1990 तक किस तरह और किस आधार पर जन्मस्थान की जगह खोज ली गई ? इसी तरह लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ‘यह कोई साबित नहीं कर सकता कि वास्तविक जन्मस्थान की जगह कौन-सी है। पर यह ‘आस्था’ का मामला है जिसको सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती’ (द इंडिपेंडेंट 1 अक्टूबर 1990) यानी मामला आस्था का है, वास्तविक सच्चाई से उसका कोई संबंध नहीं है।

आडवाणी ने लगातार यह प्रचार किया कि बाबर हिंदू विरोधी था, हिंदू देवताओं की मूर्ति तोड़ता था, वगैरह-वगैरह। इस संदर्भ में स्पष्ट करने के लिए दस्तावेजों में ‘बाबर की वसीयत’ दी है, जो बाबर के हिंदू विरोधी होने का खंडन करती है। वे तर्क देते हैं कि ‘देश बाबर और राम में से किसी एक को चुन ले’। आडवाणी के इससे तर्क के बारे में पहली बात तो यह है कि इसमें से किसी एक को चुनने और छोड़ने का सवाल ही पैदा नहीं होता। बाबर राजा था, यह इतिहास का हिस्सा है। राम अवतारी पुरूष थे, वे सांस्कृतिक परंपरा के अंग हैं। अत: इन दोनों में तुलना ही गलत है। दूसरी बात यह कि हिंदुस्तान के मुसलमानों में आज कोई भी बाबर को अपना नेता नहीं मानता, आडवाणी स्पष्ट करें कि किस मुस्लिम नेता ने बाबर को अपना नायक कहा है ? अगर कहा भी है तो क्या उसे देश के सभी मुसलमान अपना ‘नायक’ कहते हैं ?

एक अन्य प्रश्न यह है कि आडवाणी हिंदुओं को एक ही देवता राम को मानने की बात क्यों उठा रहे हैं? क्या वे नहीं जानते कि भारतीय देवताओं में तैंतीस करोड़ देवता हैं, चुनना होगा तो इन सबमें से हिंदू कोई देवता चुनेंगे? सिर्फ एक ही देवता राम को ही क्यों मानें? आडवाणी कृत इस ‘एकेश्वरवाद’ का फासिज्म के ‘एक नायक’ के सिद्धांत से गहरा संबंध है।

हाल ही में जब पत्रकारों ने आडवाणी से पूछा कि वह कोई राष्ट्रीय संगोष्ठी मंदिर की ऐतिहासिकता प्रमाणित करने के लिए आयोजित क्यों नहीं करते? जिसमें समाजविज्ञान, पुरातत्त्व, साहित्य आदि के विद्वानों की व्यापकतम हिस्सेदारी हो तो उन्होंने कहा कि ऐसे सेमीनार तो होते रहे हैं। पत्रकारों ने जब उत्तर मांगा कि कहां हो रहे हैं? तो आडवाणीजी कन्नी काटने लगे। 16 दिसंबर 1990 के स्टेट्समैन अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक आडवाणी ने कहा कि कुछ महीने पहले मैंने महत्वपूर्ण दस्तावेजों से युक्त एक पुस्तक जनता के लिए जारी की है जिसे बेल्जियम के स्कॉलर कोनार्ड इल्स्ट ने लिखा है। नाम है- राम जन्मभूमि वर्सेंज बाबरी मस्जिद। मैंने इस पुस्तक को कई बार गंभीरता से देखा-पढ़ा एवं आडवाणीजी के बयानों से मिलाने की कोशिश की तो मुझे जमीन आसमान का अंतर मिला।

आडवाणी इस पुस्तक को महत्वपूर्ण मानते हैं तथा बाबरी मस्जिद विवाद पर यह पुस्तक उनके पक्ष को पेश भी करती है, यह उनका बयान है। आइए, हम आडवाणी के दावे और पुस्तक के लेखक के दावे को देखें।

आडवाणी का मानना है कि राम का जन्म वहीं हुआ है जहां बाबरी मस्जिद है, राम मंदिर तोड़कर बाबर ने मस्जिद बनाई, अत: ‘राष्ट्रीय’ सम्मान के लिए मस्जिद की जगह मंदिर बनाया जाना चाहिए। बेल्यिजम के इस तथाकथित ‘स्कॉलर’ या विद्वान ने अपनी पुस्तक में बहुत सी बातें ऐसी लिखा हैं, जिनसे असहमत हुआ जा सकता है, यहां मैं समूची पुस्तक की समीक्षा के लंबे चक्कर में नहीं जा रहा हूं, सिर्फ लेखक का नजरिया समझाने के लिए एक-दो बातें रख रहा हूं। लेखक ने अपने बारे में कहा है कि वह ‘कैथोलिक पृष्ठभूमि’ से आता है पर उसने यह नहीं बताया कि आजकल उसकी पृष्ठभूमि या पक्षधरता क्या है? क्या इस प्रश्न की अनुपस्थिति महत्वपूर्ण नहीं है?

एक जमाने में आरएसएस के गुरू गोलवलकर ने बंच ऑफ पॉटस में हिंदुत्व के लिए तीन अंदरूनी खतरों का जिक्र किया था, ये थे-पहला मुसलमान, दूसरा ईसाई और तीसरा कम्युनिस्ट। क्या यह संयोग है कि बेल्जियम के विद्वान महाशय ने बाबरी मस्जिद वाली पुस्तक में लिखा है कि ‘हिंदू विरोधी प्रचारक हैं ईसाई, मुस्लिम और मार्क्सवादी’! क्या लेखक के दृष्टिकोण में और गोलवलकर के दृष्टिकोण में साम्य नहीं है? क्या इससे उसकी मौजूदा पृष्ठभूमि का अंदाजा नहीं लगता। खैर, चूंकि आडवाणी इस विद्वान की पुस्तक का समर्थन कर रहे हैं तो यह तो देखना होगा कि आडवाणी क्या पुस्तक की बातों का समर्थन करते हुए अपना फैसला बदलेंगे। बेल्जियम के विद्वान ने प्राचीन मार्गदर्शक अयोध्या माहात्म्य में राम मंदिर का जिक्र नहीं है- इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए लिखा है कि -’यह बताया जा सकता है, पहली बात तो

यह कि अयोध्या माहात्म्य से संभवत: राम मंदिर का नाम लिखने से छूट गया हो, यह तो प्रत्यक्ष ही है। अपने इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुए विद्वान लेखक ने इस बात को रेखांकित किया है कि ‘बाबर के किसी आदमी ने जन्मभूमि मंदिर’ नहीं तोड़ा। सवाल उठता है क्या आडवाणी अपने फैसले को वापस लेने को तैयार हैं? क्योंकि उनके द्वारा जारी पुस्तक उनके तर्क का समर्थन नहीं करती। इस पुस्तक में साफ तौर पर

विश्व हिंदू परिषद् के तर्कों से उस सिद्धांत की धज्जियां उड़ जाती हैं कि राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। चूंकि, आडवाणी इस पुस्तक पर भरोसा करते हैं, अत: वे इसके तथ्यों से भाग नहीं सकते। आडवाणी का मानना है कि बाबरी मस्जिद में 1936 से नमाज नहीं पढ़ी गई, बेल्जियम का विद्वान इस धारणा का भी खंडन करता है और कहता है कि ‘हो सकता है, नियमित नमाज न पढ़ी जाती हो, यदा-कदा पढ़ी जाती हो, पर 1936 से नमाज जरूर पढ़ी जाती थी।’ एक अन्य प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने लिखा है कि ‘यह निश्चित है कि विहिप द्वारा ‘हिंदुत्व’ को राजनीतिक चेतना में रूपांतरित करने की कोशिश की जा रही है, उसे इसमें पर्याप्त सफलता भी मिली है। यह भी तय है कि राम जन्मभूमि का प्रचार अभियान इस लक्ष्य में सबसे प्रभावी औजार है, ‘विहिप’ अपने को सही साबित कर पाएगी: यह भविष्य तय करेगा, पर उसने कोई गलती नहीं की। हम हिंदू राष्ट्र बनाएंगे और इसकी शुरूआत 9 नवंबर 1989 से हो चुकी है।’ यानी कि आडवाणी के द्वारा बतलाए विद्वान महाशय का यह मानना है कि यह सिर्फ राम मंदिर बनाने का मसला नहीं है, बल्कि यह हिंदू राष्ट्र निर्माण की कोशिश का सचेत प्रयास है। क्या यह मानें कि आडवाणी अब इस पुस्तक से अपना संबंध विच्छेद करेंगे? या फिर बेल्जियम के विद्वान की मान्यताओं के आधार पर अपनी नीति बदलेंगे। असल में, बेल्जियम के लेखक की अनैतिहासिक एवं सांप्रदायिक दृष्टि होने के बावजूद बाबरी मस्जिद बनाने संबंधी धारणाएं विहिप एवं आडवाणी के लिए गले की हड्डी साबित हुई हैं। वह उस प्रचार की भी पोल खोलता है कि विहिप एवं भाजपा तो सिर्फ राम मंदिर बनाने के लिए संघर्ष कर रहें हैं। यह वह बिंदु है जहां पर आडवाणी अपने ही बताए विद्वान के कठघरे में खड़े हैं।

(लेखक वामपंथी चिंतक और कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर हैं)
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Thursday, June 18, 2015

'मोहल्ला अस्सी'

काशी नाथ सिंह के 'उपन्यास' पर आधारित फिल्म 'मोहल्ला अस्सी'

अभी मिडिया में शोर है की मशहूर लेखक काशी नाथ सिंह के 'उपन्यास' पर आधारित और वाराणसी की 
पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'मोहल्ला अस्सी' इसी वर्ष अक्टूबर-नवंबर में रिलीज़ होगी.. "सन्नी देओल फिल्म में एक गरीब ब्राह्मण की भूमिका में हैं, जो संस्कृत के शिक्षक हैं. वह बनारस आने वाले विदेशियों और यहां घाटों पर उनके 'गांजा-भांग' पीने-खाने से दुखी हैं. बनारस को हम पवित्र मानते हैं, लेकिन ऐसा विदेशी पर्यटकों के साथ नहीं है."
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Saturday, August 16, 2014

बनारस विद्रोह

घोड़े पर हौदा-हाथी पर जीन/ चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग. ये कहावत आज भी बनारस क़ी गलियों में पुराने लोगों के बीच लोकप्रिय है। इसके पीछे एक कहानी है। कहते हैं कि आज से लगभग दो सौ तीस साल पहले काशी राज्य क़ी तुलना देश क़ी बड़ी रियासतों में क़ी जाती थी। भौगोलिक दृष्टिकोण से काशी राज्य भारत का ह्रदय प्रदेश था। जिसे देखते हुए उन दिनों ब्रिटिश संसद में यह बात उठाई गई थी कि यदि काशी राज्य ब्रिटिश हुकूमत के हाथ आ जाये तो उनकी अर्थ व्यवस्था तथा व्यापार का काफी विकास होगा।

इस विचार विमर्श के बाद तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग को भारत पर अधिकार करने के लिय भेजा गया। काशी राज्य पर हुकूमत करने के लिये अग्रेजों ने तत्कालीन काशी नरेश से ढाई सेर चीटीं के सर का तेल या फिर इसके बदले एक मोटी रकम क़ी मांग रखी। अंग्रेजों द्वारा भारत को गुलाम बनाने क़ी मंशा को काशी नरेश राजा चेतसिंह ने पहले ही भांप लिया था। अतः उन्होंने रकम तक देने से साफ मना कर दिया लेकिन उन्हें लगा कि अंग्रेज उनके राज्य पर आक्रमण कर सकते हैं, इसी को मद्देनजर रखते हुए काशी नरेश ने मराठा, पेशवा और ग्वालियर जैसी कुछ बड़ी रियासतों से संपर्क कर इस बात कि संधि कर ली थी कि यदि जरुरत पड़ी तो इन फिरंगियों को भारत से खदेड़ने का पूरी कोशिश करेंगे।

14 अगस्त 1781, दिन शनिवार, जनरल वारेन हेस्टिंग एक बड़े सैनिक जत्थे के साथ गंगा के जलमार्ग से काशी पहुंचा। उसने कबीरचौरा के माधव दास का बाग को अपना ठिकाना बनाया। कहते हैं कि राजा चेतसिंह के दरबार से निष्काषित औसान सिंह नाम के एक कर्मचारी कलकत्ता जा कर वारेन हेस्टिंग से मिला और उसका विश्वासपात्र बन बैठा, जिसे अंग्रेजों ने "राजा" क़ी उपाधि से भी नवाजा था। उसी के मध्यम से अंग्रेजों ने काशी पहुँचने के बाद काशी नरेश राजाचेत सिंह को गिरफ्तार करने क़ी साजिश रची . दिन रविवार, तारीख १५ अगस्त १७८१ क़ी सुबह वारेन हेस्टिंग ने अपने एक अंग्रेज अधिकारी मार्कहम को एक पत्र दे कर राजा चेतसिंह के पास से ढाई किलो चीटी के सर का तेल या फिर उसके बदले एक मोटी रकम लाने को भेजा. उस पत्र में हेस्टिंग ने राजा चेतसिंह पर राजसत्ता के दुरुपयोग और षड्यंत्र का आरोप लगाया। पत्र के उत्तर में राजा साहब ने षड्यंत्र के प्रति अपनी अनभिज्ञता प्रकट क़ी. उस दिन यानि १५ अगस्त को राजा चेतसिंह और वारेन हेस्टिंग के बीच दिन भर पत्र व्यवहार चलता रहा

दूसरे दिन १६ अगस्त को सावन का अंतिम सोमवार, हर साल क़ी तरह राजा चेत सिंह अपने रामनगर किले क़ी बजाय शंकर भगवान क़ी पूजा अर्चना करने गंगा के इस पार छोटे किले शिवालाघाट आए थे। इसी किले में उनकी तहसील का छोटा सा कार्यालय भी था। कहतें हैं कि जिस समय काशी नरेश शिवपूजन से निवृत हो कर अपने दरबार में कामकाज देख रहे थे, कि उसी समय गवर्नर वारेन हेस्टिंग क़ी सेना उनके दरबार में प्रवेश करने की कोशिश करने लगी लेकिन काशी के सैनिकों ने उनके नापाक मंसूबो को कामयाब नहीं होने दिया। तब एक अंग्रेज रेजीडेंट ने राजा साहब से मिलने क़ी इच्छा जाहिर क़ी और कहलवाया कि वो गवर्नर साहब का एक जरुरी सन्देश ले कर आया है, लेकिन सैनिकों ने ये संदेह प्रकट किया कि वो इतनी सेना साथ क्यों लाया है? इसके जवाब में रेजिडेंट ने ये कहकर नई चाल चली कि सेना तो वैसे ही उसके साथ चली आई है, किले में केवल हम दो-तीन अधिकारी ही आएंगे. इस पर राजा साहब क़े आदेश पर उन्हें अन्दर किले में भेज दिया गया।

बातों ही बातों में दोनों ओर से तलवारें खिंच गईं, इसी दौरान एक अंग्रेज अधिकारी ने राजा चेत सिंह को लक्ष्य कर बन्दूक तानी, जब तक उसकी अंगुली बन्दूक के ट्रिगर पर दबती कि उसके पहले काशी के महशूर गुंडे बाबू नन्हकू सिंह क़ी तलवार के एक ही वार से उस अंग्रेज अधिकारी का सर कट कर दन से जमीन पर आ गिरा, चारों ओर खून ही खून बिखर गया, जिसे देख कर खून से सने अंग्रेज अधिकारी चीखते-चिल्‍लाते उल्‍टे पांव बाहर भागे. उधर किले के बाहर चारों तरफ छिपे किन्तु सतर्क काशी के वीर रणबांकुरों ने देख कर ये समझ लिया कि अन्दर किले में मार-काट मच गई है। फिर क्या था सभी बाज क़ी तरह गोरी चमड़ी वालों पर टूट पड़े, लेकिन किस ने किस को मारा ये तो आज तक पता नहीं चल सका, लेकिन शिवाला घाट पर बने किले के बाहर लगे शिलापट्ट पर अंग्रेजों ने ये जरुर अंकित करवा दिया कि इसी जगह पर तीन अंग्रेज अधिकारियों लेफ्टिनेंट स्टॉकर, लेफ्टिनेंट स्कॉट और लेफ्टिनेंट जार्ज सेम्लास समेत लगभग दो सौ सैनिक मारे गए थे।

इस घटना के तुरन्त बाद राजा काशी नरेश के मंत्री बाबू मनियर सिंह ने गवर्नर वारेन हेस्टिंग को गिरफ्तार करने क़ी सलाह राजा साहेब को दी, लेकिन उनके दीवान बक्शी सदानंद ने उन्हें ऐसा कराने से मना कर दिया। उधर वारेन हेस्टिंग अपने पकडे़ जाने के डर से "माधव दस बाग" के मालिक पंडित बेनी राम से चुनार जाने के लिये सहायता मांगी. इसी बीच उसे पता चल गया कि राजा साहब क़ी एक बड़ी फौज उसे गिरफ्तार करने इसी तरफ आ रही है। कहते हैं कि अपनी गिरफ्तारी के डर से वारेन हेस्टिंग उसी माधव दास बाग के भीतर बने एक कुँए में कूद गया और जब रात हुई तो वो स्त्री का भेष धारण कर चुनार क़ी ओर कूच कर गया। राजा चेतसिंह के दीवान बक्शी सदानंद क़ी ये सलाह कि वारेन हेस्टिंग को गिरफ्तार ना किया जाय, भारत के लिये दुर्भाग्यपूर्ण रहा। अगर उस दिन वारेन हेस्टिंग काशी नरेश क़ी सेना के हाथों गिरफ्तार कर लिया गया होता तो शायद अंग्रेजों के पांव भारत में ही ज़मने नहीं पाते.

मजे क़ी बात तो ये है कि अंग्रेज इतिहासकारों ने काशी नरेश राजा चेतसिंह को भगोड़ा साबित किया है और वहीं दूसरी तरफ शिवाला घाट पर जो शिलापट्ट लगवाया उस में साफ-साफ शब्दों में लिखवाया कि "इसी जगह उनके तीन अधिकारियों सहित दो सौ सैनिक मारे गए थे। जिसे आज भी देखा जा सकता है लेकिन वो वारेन हेस्टिंग के भगोड़ा होने क़ी बात पर चुप्पी साध गए। अगर इस घटना पर विचार करें तो स्वतंत्रता आन्दोलन का पहला बिगुल काशी में ही बजा था, लेकिन दुर्भाग्य ये है कि उस घटना क़ी याद में आज तक यहाँ पर कोई स्मारक नहीं बन सका है। हाँ इस दिन यानी १६ अगस्त को जिन परिवार के पूर्वजों ने स्वतंत्रता के लिये उस दिन अपनी क़ुरबानी दी थी उनके परिजन जरुर एक "दीपक" उनकी याद में जलाते हैं। उस गौरव गाथा को आज भी इस प्रकार गया जाता है,

घोड़े पर हौदा, हाथी पर जीन, चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग...!

धर्मपाल जी अक्सर कहा करते थे बनारस की क्रांति. आज उसको विस्तार से पढ़कर कई जानकारी मिली. धर्मपाल जी नो एक बात और कहा है कि असहयोग का सबसे पहला प्रयोग बनारस में हुआ था और गांधी के भारत आने से बहुत पहले. संभववतः गांधी जी ने उसी बनारस के असहयोग से प्रेरणा ली थी. इस बारे में आपको कुछ पता है क्या?

अभी साहित्य अमृत में एक लेख छपा है देवेन्द्र स्वरूप का. जिसमें उन्होंने विस्तार से बताया है कि 1857 की क्रांति के पीछे पूरबियों (पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार) का कितना बड़ा योगदान था. वे तो यहां तक निष्कर्ष निकालते हैं कि पूरब के लोग नहीं होते तो 1857 की क्रांति होती ही नहीं. 
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Wednesday, March 5, 2014

वाह गुरु वाह.....और पीछे से तो मेरी ही लेता है..

“समाज में बस लोग सिर्फ़ एक ही चीज़ से डरते हैं.. वो है बदनामी...पर क्या आप जानते हैं.. कि बदनामी में भी नाम होता है.. लोग बदनामी के डर की वजह से अपने घर को ही पंचायत और खुद को सरपंच बना लेते हैं.. जैसे बस अब सारे फैसले अपने हक में ही हों... पर जितना हम उसे रोकने की कोशिश करते हैं.. फिर भी वैसा हो ही जाता है.. पता है क्यों???? जब रबड़ को ज्यादा खींचकर छोड़ते हैं.. तो चोट हमें ही पहुंचाती है... और अगर कसकर खींच दो तो टूट जाती है... कहीं हम समाज से रिश्ते निभाते-२ अपनों से दूर तो नहीं हो गये.. कहीं हमने अपने घर को परीक्षा-भवन और स्वयं को जांचकर्ता तो नहीं बना लिया??


आज दोस्तों के साथ बैठा था.. लोग जिंदगी कि कितनी परिभाषाये बता रहे थे.. जिंदगी कितनी आसान है.. अपना अपना नसीब है भैया ..............

 हसी आ रही रही है .. हमारे एक सहपाठी ने कितना अच्छा जिंदगी को परिभासित किया.. हमारे बच्चे तो चाँद पर घूमने जायेगे.. हम तो २ दिन के लिए जाने के लिए कितनी तयारी करते है.. अभी घूमने और मस्ती करने का समय है.. आज लगा हम भारतीय कितने कूप मंडूक है.. वास्तव में जिंदगी तो भारत के बाहर है.. हम लोग तो सिर्फ फेसबुक .. वो भी ऑफ लाइन हो कर ऑनलाइन हुवे तो कोई मैसेज पेल देगा .. ये मेरा पेज लाइक कर लो.. या देश कि कोई राजनीती.. हम बस इसी में परेशां है..

अपने बारे में कम देश के बारे में.. ज्यादा.. जब आपको अपनेसे ज्यादा, अपनोंका दर्द सताए तो समझिये, वही सच्चा दोस्त है।

स्वार्थी दुनियामें तुलसी दास जी वह पंक्ति याद करें-
 जेन मित्र दुख होंहि दुखारी, तिनहि विलोकत पातक भारी।

मुझे लगता है भारती लोगो को भी बायलर मुर्गे या हाईब्रीड के तरह बनाना चाहिए..
सोच में फर्क आएगा... हम लोग तो संस्करों के बिच में मरते है काम धाम नहीं तो राजनीत करते है..

ईश्वर ने हमारे शरीर की रचना कुछ इस प्रकार की है की ना तो हम अपनी ही पीठ थप-थपा सकते है ............
और ना ही अपने आप को लात मार सकते है ............
इसलिए हर इक मित्र और आलोचक जरूरी होता है ......

भगवन ये क्या लीला है तेरी.. अगर तू एक ही है.. कैसे इतने तरह के इन्सान बनाये.. आज के युग में तो किसी मोल में भी इतनी तरह का प्रोडक्ट नहीं मिलता..
और तू इतने तरह के इन्सान बना डाला .... कोई  भारत का कोई कही का..

एक तरफ तो गीता में लिखवाता है
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ॥

हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझ में अनन्य-चित्त होकर सदा ही निरन्तर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझ में युक्त्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ, अर्थात् उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ ।। १४ ।।ॐ ~ψ~ || Shrimad Bhagwad Gita – Chapter 8 – Shloka 14 || ~ψ~ ॐ

और पीछे से तो मेरी ही लेता है..

वाह गुरु वाह..

कलाकार है तू यार..

याद आता है एक शेर

न मंदिर में सनम होते, न मस्जिद में
ख़ुदा होता
हमीं से यह तमाशा है, न हम होते
तो क्या होता
न ऐसी मंजिलें होतीं, न ऐसा रास्ता होता
संभल कर हम ज़रा चलते तो आलम ज़ेरे-
पा होता
*आलम ज़ेरे-पा=दुनिया संसार पैरों के
नीचे
घटा छाती, बहार आती,
तुम्हारा तज़किरा होता
फिर उसके बाद गुल खिलते कि ज़ख़्मे-
दिल हरा होता
*तज़किरा=ज़िक्र
बुलाकर तुमने महफ़िल में हमको गैरों से
उठवाया
हमीं खुद उठ गए होते, इशारा कर
दिया होता
तेरे अहबाब तुझसे मिल के भी मायूस लौट
आए
तुझे 'नौशाद' कैसी चुप लगी थी, कुछ
कहा होता
~ नौशाद 'लखनवी'


अब क्या लिखे.. सपने तो लग गए बट्टे खाते.. देर हो चुकी है..   हम सिर्फ अपनी बनायीं ही दुनिया देखते है..  दूसरा कोई बनाये तो अपनी राय ही पलते  है..  खुद तो खुद कर सकते नहीं .. हा अपना तो सिर्फ एक ही.. अपना हाथ जग्गनाथ.. ... बजाते रहो.. मस्त रहो मस्ती में आग लगे बस्ती में..

सिर्फ आपना ही.. अहम् ब्रस्मामी 



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Friday, February 14, 2014

संत वेलेंनटाइन की जय जय

 अरे यार .. मेरा तो सुबह ही वेलेंनटाइन डे का सन्देश पत्नी जी के मोबाईल से बनारस से चला है अभी तक नहीं पंहुचा ....कितना ट्राफिक जाम है मोबाईल का ..
चलो मान लेता हूं उमर बढ़ रही है.. अब बुड्ढा जो हो रहा हु ) :(   वैसे मोबाईल का ट्राफिक जाम भी क्यों न हो..


 काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

ये हमारे देश के सविधान निर्माता भी न .. आज बाबा वेलेंनटाइन के प्रणय दिवस के दिन रविदास जयंती बना रहे है .. उपर से सरकारी छुट्टी .. मम्मी पापा घर में , और बनारस में झमाझम बरसात, अब  बच्चे निकले भी तो कैसे , निकल भी जाये तो बैठेगे कहा, सब जगह गिला गिला ... उपर से शिव सेना का डर, तो बचे मोबाईल बाबा ... अब तो पहले लोकल डिलेवरी ही पहले देगे न.. हम ठहरे तड़ी पार, उपर से सफ़ेद बाल..
कहते है  प्रेम का कोई एक दिन नहीं होता, लेकिन हम जैसे १४ साल पुराने ब्याहते को आधुनिक समाज के नौजवानों और ब्रम्हा रचित कन्याओ के देख कर मन में एक टिस सी उभरती है , अब क्या करे दिल तो इस मामले में बच्चा है जी ...
सब समय का खेल है मित्रो, आज काम धाम में मन ही नहीं लगा, सारा दिन मोबाईल को निहरता रहा , कब आएगा मेरी प्रेयसी के इजहार-ए-मुहब्बत का पैगाम ...अभी तक नहीं आया , और अब तो ये सुभ पर्व के बिदाई कि घडी भी आ गयी है ...

 
आज हमारे यहाँ काठमांडू में भी वरुण देव भी नाराज थे , सुबह से मीठी मीठी बारिश, और कुलकुलाटी  हुई  गुलाबी ठण्ड, रास्तो के ब्रम्हा रचित कन्याओ का नजारा देख कर ऐसा लगा कि मै अफ्रीका के ५५ डिग्री के तापमान में हु, इतनी गर्मी आयी, अब क्या करू दिल तो पत्थर का तो है नहीं, पिघल ही जाता है , अब ये देख कर तो प्रेम तो रगों में रक्त में बहने लगा

काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

इतिहासकार बांचते है कि14 फरवरी यानि वैलेंटाइन डे का इतिहास भी प्यार से भरा हुआ है. वैलेंटाइन डे को मूल रुप से संत वैलेंटाइन के नाम पर मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि वैलेंटाइन-डे मूल रूप से संत वेलेंटाइन के नाम पर रखा गया है. परंतु संत वैलेंटाइन के विषय में ऐतिहासिक तौर पर विभिन्न मत हैं और कुछ भी सटीक जानकारी नहीं है. कहा जाता है कि संत वैलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को नेत्रदान किया व जैकोबस को एक पत्र लिखा, जिसमें अंत में उन्होंने लिखा था ‘तुम्हारा वैलेंटाइन’. यह दिन था 14 फरवरी, जिसे बाद में इस संत के नाम से मनाया जाने लगा और वैलेंटाइन-डे के बहाने पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम का संदेश फैलाया जाता है. संत वैलेंटाइन मानवता से प्रेम करते थे और उन्होंने समाज में आपसी प्रेम को हमेशा बढ़ावा दिया. और अपने भारतीय नजरिए से देखें तो वैलेंटाइन वसंत के महीने में आता है. और वसंत प्यार का ही महीना होता है. इस तरह वैलेंटाइन का क्रेज भारत में भी अब बढ़-चढ़ कर बोलता है. आज आप भी जिसे प्यार करते हैं उससे अगर अब तक मन की बात नहीं कही तो कह डालिए हो सकता है आपके गुलाब देकर प्रपोज करने का अंदाज उन्हें भा जाए और आपके प्यार का पैमाना उन्हें मालूम हो जाए.
काठमांडू के दरबारमार्ग इस्थित शेरपा मॉल में क्लोस अप वालो की तरफ से वेलेंनटाइन महोत्सव की तयारी

वैलेंटाइन डे आज एक ग्लोबल फेस्टिवल बन गया है. और बने भी क्यों न जबकि इस दुनिया को प्रेम की जरुरत है और जो त्यौहार हमें आपस में प्रेम रखना सिखाए वह तो और भी जरुरी होता है. यह त्यौहार 14 फरवरी को हर देश में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है. खासकर पश्चिमी देशों में तो इस दिन का एक अलग ही अंदाज और शवाब होता है. और पश्चिम ही क्या अब तो दुनिया के हर हिस्से में इसकी अच्छी खासी धूम देखने को मिलती है.  इस दिन फूल और तोहफे हर दिल की धड़कने बढ़ा देते हैं.
काठमांडू के दरबारमार्ग के सडको की रौनक
 यह कोई जरुरी नहीं कि आज का सिर्फ प्रेमी-प्रेमियों के लिए ही बना है. आज का दिन तो प्रेम को दर्शाने के लिए होता है और प्रेम सबके बीच होता है एक मां का उसके बच्चे के प्रति, एक दोस्त का दोस्त के लिए या पति का अपनी पत्नी के लिए. आज के दिन आप जिससे भी प्यार करते हैं या उसके प्यार के लिए उसे धन्यवाद देना चाहते हैं तो उसे अपना वैलेंटाइन बनाइए, गुलाब दीजिए और उसके प्यार के लिए उसे थैंक्स कहिए.
काठमांडू के दरबारमार्ग में के.फ.सी ओर पिज़्ज़ा हट
  भारत में वेलेंटाइन डे मनाए जाने की शुरूआत करीब 1990 के आसपास हुई। लेकिन भारत में ये सभ्यता पुरानी मानी जाती है। बंगाल में सरस्वती पूजा को भी प्यार का दिवस माना गया है। साथ ही प्यार के भगवान कामदेव को भी इस त्योहार से जोड़ कर देखा जाता है। क्योकि पुरानी सभ्यता में कामदेव को पूजा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे ये सभ्यता समाप्त हो गई। वेलेंटाइन डे के दिन हम हमारा प्यार दुसरों को जाहिर करते हैं जिससे आपस में प्यार बढ़ता है। जिसे कामदेव की सही पूजा माना जाने लगा है

लेकिन आज तो भारत में सुना है
वैलेंटाइन्स डे पर कंडोम और पिल्स की बिक्री ने
गुलाब और गिफ्ट्स को पीछे छोड़ा !
वैलेन्टाइन्स डे पर सुरक्षित सेक्स के इन
उपायों की मांग करीब 10 गुना तक बढ़ गई. कई
मेडिकल स्टोर्स पर कंडोम औप पिल्स का स्टॉक
खत्म होने की भी खबर है. 

                  इस प्यार को क्या नाम दूं ?
काठमांडू का डिस्को थिक

इजहार-ए-मुहब्बत का प्रतीक वेलेंटाइन डे हमारे काठमांडू में मनाया जा रहा है । प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी युवा इस पर्व का बेसब्री से इंतजार कर रहे है। वेलेंटाइन डे पर शहर की गिफ्ट गैलरियों की दुकानें व फूलों की दुकानें विशेष रूप सजी हुई दिखाई दी। इनमें ग्रीटिंग कार्ड, पोस्टर व उपहार आकर्षक ढंग से सजाए गए थे। युवा सुबह से ही गैलरियों में आकर्षक शब्दावली वाले कार्ड ढूंढते नजर आए। पर्व को लेकर कई होटलों व रेस्तराओं में भी विशेष व्यवस्था की गई है। लेकिन सबसे खास बात ये  है कि वैलेंटाइन का क्रेज मुझे आज यहाँ कि कन्याओ के वस्त्र को देख क़र दिल जवान हो गया है ..

मैंने भी सोचा चलो आज अकेले ही संत वैलेंटाइन की पूजा की जाये , सो काठमांडू के दरबार मार्ग इस्थित नेपाल s बी आई के ऐ टी म में लगे प्रेयसी जोड़ो की लाइन से मन विचलित हो गया, पैसा भी नहीं निकल पाया, मन में सोच लिया अगले साल तो चप्पक के वैलेंटाइन पर्व मेहरारू के साथ मनाउगा
 प्रणय दिवस कि बेला में कुछ ऐसा रहा कमरे काठमांडू का दरबार मार्ग


चलो भाई ... सभी
कुँवारो को 'हैप्पी वैलेन्टाईन'डे।

और         शादी-शुदा को 'हैप्पी बेलन-टाईट'डे।
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Saturday, February 8, 2014

ये दोस्त भी कैसे है

ये समाज भी कैसा है.. ये दोस्त भी कैसे है .. कुछ समझ में नहीं आता..


पैसे कमाने कि धुन .. पत्नी से दूर रहो ..
दोस्त पूछते है

कैसे रह जाते हो यार
क्या नामर्द हो ?

या बीबी का कोई और यार है ?
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Saturday, January 18, 2014

पानी सुख का बर्फ हो गया

ठण्ड में नदी का पानी सुख का बर्फ हो गया .. इस लिए हमारे यहाँ लोड शेडिंग चल रही है
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कड़ाके कि ठण्ड है .. फिर भी रोज सुबह ठन्डे पानी से नहाना है..
जिंदगी भी संस्करों कि पहेली हो गयी है .. ये तो वही हाल हो गया है..

दस्त हो रही है.. पेट ख़राब है
फिर भी शंख बजाना है
;)
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Saturday, January 11, 2014

क्या आप ने कभी बीबी कि क़ुरबानी समझी है

चलो समझ गया..

क्या आप ने कभी बीबी कि क़ुरबानी समझी है..
आप के बच्चो को पैदा करती है..
सुबह आप को उठाती है.. चाय के साथ
आप के लिए खाना बनाती है..
कई बार पति का मुह मोज़े जैसा होता है.. उसका भी पत्नी ख्याल रखती है..
पति तो सुबह सुबह ४ पराठे ठूस कर ऑफिस निकल जाते है
कभी पतियो ने सोचा है.. कितना काम करती है पत्निया..
कपडे वपड़े.. बच्चे कच्चे.. ये वो.. खाना वाना..
अरे ... बच्चा पैदा करो तो पता चल जाये आपको

Sorry Darling.. Sorry.. Love you darling..
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Saturday, November 16, 2013

याद आता है बचपन का वो जमाना

.. नशे और मस्ती में चूर.. हफ्तो घर नहीं आता था.. नौकरी का बहाना.. काम कर रहा हु.. बहुत प्रेसर है.. १० दिन बाद घर आये तो गेट पर ताला लगा .. बुलेट का हार्न देने पर माँ आती थी गेट का ताला खोलने .. खोल कर चली जाती.. बरमडे के अंदर अपनी बुलेट खड़ी कर के घर में घुसता तो अँधेरे कमरे में पापा बैठ कर न्यूज़ पेपर पड़ते देखता.. पर लतखोर जो मै था.. पापा से पूछता .. अँधेरे में समाचार पत्र पड़ रहे है... पापा बोलते.. ये तो १० दिन पुराना है.. तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था.. इस लिए ये समाचार पत्र ख़तम नहीं हुवा.. अब तुम घर आ गए हो तो बाकि ९ दिन का भी आज रात पड़ लुगा.. खाना खा लो.. सो जाओ.. अरे सुनो.. ९ दिन का पेपर कहा रखा है.. देते जाना..
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Wednesday, November 6, 2013

एक्स्ट्रा ढक्कन

अगर कोई मुझसे पेन मांगता है तो मैं हमेशा पेन का ढक्कन निकल कर ही देता हूँ ....

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आज मेरे पास 10 -12 एक्स्ट्रा ढक्कन हैं
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Friday, October 25, 2013

गिलाफ-ए-औज़ार-


" गिलाफ-ए-औज़ार-ए-मज़ा-ए-मोहब्बत औ' बंदिश-ए-इज़ाफा-ए-नस्ल " का इस्तेमाल नहीं किया बस उस रात ये ही तकलीफ थी

येही कमी है मेरे अन्दर.. मुझे अफ़सोस करना नहीं आता.. आज से ठीक १० साल पहले २४ ओक्टोबर २००३ दिल्ली से बनारस शिवगंगा खचाखच भरी ट्रेन .. लटकता हुवा बनारस जा रहा हु.. वो भी बिना टिकट.. क्या जल्दी है मुझे.. पता नहीं.. पर बनारस जाना है..
सुबह ८ बजे बनारस पहुच कर सीधे औरगाबाद कमल जिया जी के यहाँ पंहुचा था.. जेब बे सिर्फ १०० रुपये.. वो भी सिर्फ ५-५ के नोट ... दिवाली का दिन वो भी सनिवार २५ अक्तूबर २००३ .. सिखा दीदी ने कहा क्षमा को अस्पताल ले जाना है.. जल्दी नाहा धो लो..

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Monday, July 8, 2013

लिंग का साइज़

पिछले पोस्ट में मैंने लिंग की साइज़ के बारे में लिखा था , बहुत दिन हो गया कुछ लिखा नहीं था, तो आज शादी की एक और वर्ष गांठ तो सोचता हु कुछ हो सकता है क्या, तो इस बार कुछ प्रयास किया जाय की कुछ हो सकता है क्या , तो सबसे बड़ी समस्या ये है की शरीर के बनावट से महिलाये ही नहीं सबसे ज्यादा पुरुष ही परेसान है महिला का ब्रेस्ट छोटा तो फोम की ब्रा, हिप छोटा तो टाईट जींस यानि उनका ये प्रयास होता है की पुरुष उन्हें देख ही ले, ये स्थिति ही कुछ विचित्र है..   कामुक कहानियो का दौर है, हर जवान होता बच्चा पोर्न की खोज में, अभी जब से सन्नी भौजी आई है तो समाज में कुछ ज्यादा ही खुला पन आया है, पिछले ही दिनों बनारस गया था, ससुराल में कुछ आयोजन था तो वैसे ही रात में किसी चैनल में सन्नी भौजी का अन्तरवार्ता चल रहा था तो हमरे पत्नी जी के साथ एक गरम चर्चा कर रहे थे सन्नी के बारे में, तब मुझे लगा कुछ परिवर्तन तो है, समाज में, लोग इन दबी हुई कहानियो के बारे में चर्चा तो कर रहे है, हमारे ज़माने में कहा ये सब , उस समय ही हिन् भावना तो यही थी लडको में की पेनिस का साइज़ कैसे बढे... मैंने अपना प्रोयोग किया है, अब इसका कोई डाक्टरी आधार तो नहीं

क्या लिंग का साइज़ 5 इंच का होना पत्नी को करता है संतुष्ट
तो मेरे हिसाब से तो पहले तो आपको यह बता देना ज़रूरी है कि आपके लिंग का साइज बिल्कुल ठीक है और इसके लिए आपको वैवाहिक जीवन में कोई समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय पुरूषों के लिंग का साइज 5 से 6 इंच का होता है। अच्छी तरह से सेक्स लाइफ का आनंद उठाने के लिए दिल के एहसास की ज़रूरत होती है लिंग के साइज की नहीं।
अब जानकारी के तौर पर आपको यह बताना ज़रूरी है कि लिंग के साइज को बढ़ाने का कोई भी तरीका सुरक्षित नहीं होता है। बाजार में बहुत तरह से जेल, क्रिम, और दवाईयाँ मिलती हैं जो सिर्फ नाम की ही होती है। यहाँ तक कि व्यायाम भी इस मामले में कोई प्रभावकारी काम नहीं कर पाता है। इस क्षेत्र में पीनिस इन्लार्ज्मन्ट सर्जरी ( penis enlargement surgery) कुछ हद तक काम करता है। लेकिन यह इरेक्ट अवस्था में लिंग के साइज़ को बढ़ाने में मदद नहीं करता है। किसी-किसी को सर्जरी के बाद इरेक्शन में असुविधा होती है। एक ही चीज आपके इस समस्या का समाधान कर सकता है, वह है सेक्स एजुकेशन। इसके द्वारा आपको सेक्स ऑर्गन के बारे में सही जानकारी भी मिलेगी और सेक्स करने का सही तरीके का भी पता चलेगा। मेरे किसी भी लेख का आधार गूगल बाबा ही है, पहले जड़ की तरफ पहुचे की ये सेक्स की शुरुवात हुई कहा से लैब न साला लिंग के साइज़ का लफड़ा आएगा, तो पता चला की ऋषि वात्सायन ने ये पुनीत ग्रन्थ लिखा था तो काम-सूत्र का ज्ञान कुछ ऐसा है :

ऋषि वात्सायन  दूारा लिखित काम-सूत्र शरीरिक सुखों के विषय पर सम्पूर्ण गृन्थ है। हिन्दू धर्म में वैवाहिक काम सम्बन्ध किसी ‘ईश्वरीय-आज्ञा’ का उलन्धन नहीं माने जाते। वह ईश्वर के प्रति मानव कर्तव्यों के निर्वाह के निमितहैं और सृष्टि के क्रम को चलाये रखने की श्रंखला के अन्तर्गत आते हैं। कामदेव को देवता माना जाता है ना कि शैतान। काम-सूत्र गृन्थ का लग भग सभी विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और भारतीय अध्यात्मिकता की तरह अपने क्षेत्र में यह गृन्थ भी सर्वत्र प्रेरणादायक है। इस से प्रेरणा ले कर शिल्पियों और चित्रकारों ने अपनी कला से विश्व भर के पर्यटकों को चकित किया है। चन्देल राजाओं दूारा निर्मित खजुरोहो के तीस मन्दिर काम-कला कृतियों को ही समर्पित हैं जो इस विषय में मानव कल्पनाओ की पराकाष्ठा दर्शाती हैं। काम को धर्म शास्त्रों की पूर्ण स्वीकृति है अतः शिल्प कृतियों में अधिकतर देवी – देवताओ को ही नायक नायकाओं के रूप में दिखाया गया है।

हिन्दू समाज में कोई ‘तालिबानी ’ ढंग का अंकुश नहीं है। केवल धर्म और सार्वजनिक स्थलों पर सामान्य शिष्टाचार का निर्वाह करना ही आवश्यक है। खजुरोहो कृतियों के पीछे छिपा अध्यात्मवाद और इतिहास शायद तथाकथित ‘ओवर-लिबरल’ विदेशी पर्यटकों को समझ नहीं आये गा फिर भी उन्हें स्वीकारना पडे गा कि काम-कला प्रदर्शन में भी आज से दस शताब्दी पूर्व भारतवासी योरूप्यिन लोगों से कहीं आगे थे।

काम का क्षेत्र केवल शरीरिक सम्बन्धों तक ही सीमित नहीं है। इस के अन्तर्गत सहचर्य के अतिरिक्त अच्छा भोजन, वस्त्र, आभूषण, रहन-सहन, कला, मनोरंजन, आराम, सुगन्धितवातावरण आदि जीवन के सभी भौतिक ऐश्वर्यों के आकर्षण आ जाते हैं। धर्म की सीमा के प्रतिबन्ध के अन्तर्गत सभी कुछ हिन्दू समाज में स्वीकृत है। यही वास्तविक ‘लिबरलज़िम ’ है।

वाल्मीकि रामायण में कई भौतिक सुखों की परम्पराओ के उल्लेख देखे जा सकते हैं। ऱाजा दशरथ को प्रातः जगाने का विधान अयोध्या नगरी की भव्यता तथा ऐश्वर्य का भान कराता है। ऋषि भारदूाज चित्रकूट मार्ग पर राजकुमार भरत तथा अयोध्या वासियों के सत्कार में ऐक भोज का प्रबन्ध अपने आश्रम में ही करते है जो किसी भी पाँचतारा होटल की ‘बैंक्विट’ से कम नहीं। ऱावण के अन्तःपुर में सीता की खोज में जब हनुमान प्रवेष करते हैं तो वहाँ के वातावरण का चित्रण अमेरिका के किसी भी नाईट-कल्ब को पीछे छोड दे गा। किन्तु ऋषि वालमीकि कहीं भी वर्णन चित्रण करते समय भव्यता और शालीनता की रेखा को नहीं लाँघते।

फिर भी आप से कौनो मैच करता है तो

वात्स्यायन ने लिंग के आकार के आधार पर पुरुष को तीन वर्ग में बांटा है
1. शश (खरगोश के समान छोटे व पतले लिंग वाला)
2. वृष (बैल के समान लंबाई व मोटाई में मंझोले लिंग वाला)
3. अश्व (घोड़े के समान लंबे और मोटे लिंग वाला)

योनी के आकार व गहराई के आधार पर स्त्रियों को भी तीन श्रेणियों में रखा गया है
1. मृगी (हिरनी के समान उथली योनि वाली)
2. बड़वा (घोड़ी के समान मझोली गहराई की योनि वाली)
3. हस्तिनी (हथिनी के समान गहरी योनि वाली)

समान व लिंग वाले स्त्री-पुरुष के बीच संभोग को समान मैथुन मान
गया है। समान मैथुन को सर्वोत्तम माना गया है। इसके तीन प्रकार हैं

1 शश पुरुष का मृगी नारी के साथ
2 वृष पुरुष का बड़वा नारी के साथ
3 अश्व पुरुष का हस्तिनी नारी के साथ

योनि व लिंग की असमानता वाले स्त्री-पुरुष के संभोग को विषम संभोग माना गया है। इसके छह प्रकार हैं

1 शश पुरुष का बड़वा नारी से
2 शश पुरुष का हस्तिनी नारी से
3 वृष पुरुष का मृगी नारी से
4 वृष पुरुष का हस्तिनी नारी से
5 अश्व पुरुष का मृगी नारी से
6 अश्व पुरुष का बड़वा नारी से

वात्स्यायन के मुताबिक विषम में भी संभोग का आनन्द मिल सकता है, लेकिन...

1. अश्व पुरुष का बड़वा नारी से एवं वृष पुरुष का मृगी नारी से संभोग हो
2. अश्व पुरुष का मृगी नारी से संभोग कष्टकर हो जाता है।
3 .शश पुरुष का हस्तिनी नारी से संभोग सबसे निम्न दशा है।
4 .शश पुरुष का बड़वा नारी से, वृष पुरुष का मृगी नारी से एवं वृष पुरुष का हस्तिनी नारी से संभोग की दशा मध्यम दशा है
5 . विषम संभोग में भी नारी योनि की गहराई की अपेक्षा पुरुष लिंग की लंबाई वाला संभोग उस संभोग से श्रेष्ठ है, जिसमें नारी योनि पुरुष के लिंग से बड़ी होती है

लिंग: पांच बड़े तथ्य लिंग बहुत सारे आकार और साइज़ के होते हैं: सीधा, टेढ़ा, मोटा, पतला, लम्बा, खतना करा हुआ और बिना खतना...लेकिन इसमें से नोर्मल क्या है ? और क्या आप सचः क्या हम किसी पुरुष की नाक देखकर उसके लिंग की लम्बाई का पता लगा सकते हैं ? क्या सभी पुरुषों के लिंग एक ही तरह से तना हुआ होता है ? और वीर्यपात क्या होता है ?

चलिए, बात करते हैं साइज़ की। जब लिंग तना हुआ नहीं होता,तो उसकी नोर्मल लम्बाई होती है - 6 से 13 सेंटीमीटर। जब लिंग तना हुआ होता है, तो उसका साइज़ होता है 7 से 17 सेंटीमीटर के बीच। लम्बे लिंग के मुकाबले, छोटे लिंग अधिकतर तना हुआ होने पर ज़्यादा लम्बे हो जाते हैं। आपके लिंग का साइज़ आपकी प्रजातीय वर्ग और नस्ल पर भी निर्भर करता है। अफ्रीका के वंशज के लिंग यूरोप के पुरुषों के मुकाबले ज्यादा लम्बे और मोटे होते हैं। अगर आप एशियाई नसल के हैं, तो आपका थोड़ा छोटा और पतला लिंग हो सकता है, ऐसा वर्ल्ड हेल्थ ओर्गनइजेशन का कहना है। तो क्या आप वाकई किसी पुरुष की नाक देखकर यह बता सकते हैं की उसका लिंग कितना बड़ा है? या उसके पैर देखकर? अगर वाकई आप किसी पुरुष के लिंग का नाप जानने की इच्छा रखते हैं तो उसकी हथेली पर नज़र डालिए।जितनी बड़ी रिंग फिंगर (अनामिका) होती है, उतना ही बड़ा उसका लिंग होने की संभव है, ऐसा दक्षिण कोरेया में करे गए एक शोध में पाया गया। जितना ज़्यादा टेस्टास्टरोन (वृषणि) किसी पुरुष को मिली होगी, जब वो अपनी माँ के गर्भ में था, उतनी बड़ी ही उस पुरुष की रिंग फिंगर होती ही। लेकिन इसका असर उसके लिंग के साइज़ पर भी पड़ता है। लम्बी रिंग फिंगर (अनामिका), लम्बा लिंग पर और जानकारी लेकिन...क्या वाकई साइज़ से फर्क पड़ता है ? तो अब आप शायद अपनी उँगलियों को देखकर सोच रहे होंगे की क्या सच में साइज़ से कोई फ़र्क पड़ता है। ऐसा पाया गया है की लिंग की मोटाई अपने साथी को संतुष्ट करने के लिए ज़्यादा ज़रूरी होती है, क्यूंकि इस से योनी में ज़्यादा उतेजना होती है। और लिंग के साइज़ को एक तरफ कर दे तो, महिलाएं एक स्थायी रिश्ता और अपने साथी की बाकि शारीरिक चीज़ों को भी - जैसे बालों को, संतुष्ट सेक्स का ज़रूरी हिस्सा मानती हैं ! क्या साइज़ से फ़र्क पड़ता है ? उतेजित होकर तन जाना जब आप कामुकता से उतेजित होते हैं, आपका लिंग तन जाता है और बड़ा भी हो जाता है -इसको इरेक्शन कहते हैं। पुरुषों के लिए अनचाहे भी और स्वाभाविक तौर से भी इरेक्शन होना, यानी लिंग का तनजाना बहुत आम है। शायद यह थोडा शर्मनाक लगे, लेकिन यह बिलकुल नोर्मल है। यह रात में भी हो सकता है, कभी कभी रात में तीन से पांच बार तक शुक्राणु और वीर्यपात जब आप बहुत उतेजित हो जाते हैं, तब आपको ओर्गास्म (चरम आनंद) और वीर्यपात हो सकता है। इसका मतलब है की एक चिपचिपा, सफ़ेद रनग का वीर्य लिंग से बाहर आता है। यह हस्तमैथुन और सेक्स के दौरान भी होता है। और आपके सोते हुए भी, जिसको स्वप्नदोष बोलते है। हस्तमैथुन की तरह, स्वप्नदोष भी बिलकुल नोर्मल है और इस से कोई नुक्सान नहीं होता - सिर्फ यह की आप जब उठते हैं तो चिपचिपा लगता है जैसे जैसे उम्र बढती है, उतना ही ज़्यादा शुक्राणु आपका शरीर बनाने लगता है। तो जब पहली बात आपका वीर्यपात होता है, तो बहुत थोड़े शुक्राणु बाहर निकलते हैं। कुछ सालों के बाद तो कुछ 900 मिलियन शुक्राणु हर वीर्यपात पर बाहर निकलते हैं। क्या आपके लिंग में कड़ापन नहीं आता क्या आप संभोग के दौरान सफल नहीं हो पाते हैं, क्या आपके लिंग में कड़ा पन नहीं आता या आप के अंदर उत्तेजना काफी देर से पैदा होती है ? पुरुषों की लव लाइफ के लिए लिंग में कड़ा पन नहीं आना खतरनाक साबित हो सकता है। इसे अंग्रेजी में इलेक्टाइल डाइस्फंशन कहते हैं। सीधे शब्दों में इसे नपुंसकता कहा जाता है। अगर ऐसा है, तो आप कुछ जरूरी बातों का पालन कर इससे काफी हद तक कम या खत्म कर अपनी पार्टनर को संतुष्ट कर सकते हैं। सबसे पहले हम बात करेंगे इसके पीछे के कारणों की। लिंग में कड़ा पन नहीं आने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

1. पत्नी से बिगड़ते संबंध: यदि आपकी पत्नी से आपके संबंध अच्छे नहीं हैं और आप दोनों के अंदर संभोग की चाहत खत्म हो चुकी है,तो धीरे-धीरे लिंग में कड़ापन आना कम होने लगता है। एक समय ऐसा आता है, जब आप चाह कर भी संभोग नहीं कर पाते। लिहाजा सेक्स लाइफ को लंबे समय तक बनाये रखने के लिए पति- पत्नी के बीच मधुर संबंध होना जरूरी है।

2. संभोग नहीं करना: मधुर संबंध होते हुए भी यदि आपने पत्नी से संभोग करना बंद कर दिया है या कम कर दिया है, तो टेस्टोस्टीरोन का बनना कम हो सकता है, जिस वजह से लिंग में कड़ापन आने में दिक्कत होने लगती है।

3. अन्य कारण: धूम्रपान करने, शराब पीने, जरूरत से ज्यादा मानसिक तनाव, जरूरत से ज्यादा आलस्य, अवसादग्रस्त होने, आदि से भी लिंग में कड़ापन कम हो जाता है। इसके अलावा डायबटीज़, कोलेस्ट्रॉल, किडनी संबंधी बीमारियां और हाई व लो ब्लड प्रेशर भी नपुंसकता के कारण हो सकते हैं। नपुंसकता का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव शादी-शुदा जीवन पर पड़ता है। सबसे ज्यादा तलाक भी इसी के कारण होते हैं। यदि लिंग में कड़ापन आने से पहले, या कड़ापन आते ही वीर्य निकल जाता है, यदि संभोग शुरू करते ही वीर्य निकल जाता है, तो यह सभी नपुंसकता की निशानी हैं। यदि संभोग के दौरान आपका वीर्य निकलने से पहले ही आपके ब्लैडर में वापस चला जाता है, तो भी यह खतरनाक है। यदि आपके साथ ऐसा होता है, तो घबराने की बात नहीं है। आप बिना किसी संकोच के सीधे किसी अच्छे गुप्तरोग विशेषज्ञ की सलाह लें। इरेक्टाइल डाइस्फंशन में वियाग्रा या लेविट्रा जैसी दवाएं दी जाती हैं। ऐसा होने पर पत्नी के भरपूर सहयोग की जरूरत पड़ती है। यदि आपके पति के साथ ऐसी समस्याएं हैं, तो उनके मनोबल को गिरने मत दें। आप पहले की तरह ही उत्तेजक कपड़ों में उनके सामने जायें और उन्हें सेक्स के लिए प्रेरित करें। किस, फोरसेक्स, आदि जारी रखें। हो सकता है शुरू में विफलता हाथ लगे, लेकिन सही इलाज के बाद आपको सफलता जरूर मिल सकती है।

लेकिन ये बाते तो काम सूत्र के साथ लोगो के विचार है, जो काम लगे वो हथिया लीजिये... वैसे नए दौर का कामसूत्र वात्स्यायन के बताए पुराने कामसूत्र को मौजूदा दौर में कैसे इस्तेमाल किया जाए? नई जीवनशैली को अपना चुके लोग इससे कैसे फायदा उठा सकते हैं? यही बताती है एएनडी हकसर की नई किताब. य आधुनिक कामसूत्र है.

प्रकाशन गृह पेंग्विन इस किताब को अगले साल फरवरी तक दुनियाभर की किताबों की दुकानों तक पहुंचा देगा. किताब नए जमाने की भागदौड़ में जी रहे लोगों को सेक्स के कामयाब तरीके बताएगी. अखबार संडे टेलिग्राफ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक सेक्स के आसनों और पुराने कामसूत्र के अनुवाद से अलग पॉकेट बुक्स के आकार में छपी यह किताब प्यार और रिश्तों के हर पहलू तक पहुंचने की कोशिश करती है.

इससे पहले जब भी कामसूत्र की बात हुई तो 19वीं सदी में सर रिचर्ड फ्रांसिस बर्टान की किताब का जिक्र ही आया जिसमें तस्वीरें और प्राचीन कामसूत्र का अनुवाद किया गया है. इसकी भाषा भी पुराने जमाने वाली ही है.

हर रोज़ पूरी ऊर्जा के साथ कैसे करें संभोग?

कौन होगा जो हर रोज़ संभोग नहीं करना चाहेगा, लेकिन कई बार ऊर्जा साथ नहीं देती या फिर क्‍लाईमैक्‍स तक पहुंचने में दिक्‍कत आती है। या यूं कहिये कि सेक्‍स की चरम सीमा तक आप रोज़ रोज़ नहीं पहुंच पाते हैं, जिस वजह से रोज संभोग करने का मन नहीं करता। हम यहां बतायेंगे कुछ ऐसी टिप्‍स जिन्‍हें फॉलो करने से आप हर रोज़ पूरी ऊर्जा के साथ संभोग कर सकेंगे। वो भी बिना मूड को खराब किये।

1. कंट्रोल-
कई पुरुषों में संभोग से पहले ही रतिनिष्‍पत्ति की समस्‍या होती है। उनका वीर्य संभोग से पहले ही स्‍खलित हो जाता है। इस वजह से वो संभोग नहीं कर पाते हैं। वैसे यह कोई बीमारी नहीं होती है। यह सिर्फ आपके मूड पर निर्भर करता है। कई बार आप संभोग से पहले ही इतने ज्‍यादा उत्‍तेजित हो जाते हैं कि आपका वीर्य डिस्‍चार्ज हो जाता है। इसके लिये जरूरी है खुद पर कंट्रोल।
अगर आप खुद पर कंट्रोल रखते हैं, तो आप जितनी देर चाहें, उतनी देर संभोग कर सकते हैं। खुद पर कंट्रोल करने के लिये संभोग से आधे घंटे पहले मैथुन कर लें। उसके बाद संभोग के दौरान जैसे ही क्‍लाईमैक्‍स तक पहुंचने वाले हों, वैसे ही रुक जायें। अपने ध्‍यान को दूसरी बातों की ओर ले जायें। अगर आप रुकना नहीं चाहते हैं, तो संभोग करते वक्‍त अपने दिमाग में उन बातों को सोचें जिनसे आपको तनाव हो सकता है। ऐसा करने से आप तुरंत डिस्‍चार्ज नहीं होंगे।

2. फोर प्‍ले-
जितनी ज्‍यादा देर तक आप फोर प्‍ले करेंगे, संभोग का मज़ा उतना ज्‍यादा होगा। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को फोर प्‍ले ज्‍यादा अच्‍छा लगता है। फोर प्‍ले का फायदा भी उन्‍हें ही ज्‍यादा मिलता है। ऐसा इसलिये क्‍योंकि पुरुष तो तीन-चार मिनट के अंदर डिस्‍चार्ज हो सकते हैं, लेकिन महिलाओं को चरम सीमा तक पहुंचने में समय लगता है। ऐसा करके आप अपनी पार्टनर को ज्‍यादा खुश रख सकते हैं।

3. संभोग की गति-

संभोग के वक्‍त अपनी गति को नियंत्रित रखने से आप ज्‍यादा देर तक संभोग कर सकते हैं। जोश में आकर होश खो देने से मज़ा किरकिरा हो सकता है। महिला अथवा पुरुष दोनों में जो भी व्‍यक्ति ऊपर होता है, उसी की जिम्‍मेदारी होती है गति पर नियंत्रण रखने की।

4. पार्टनर की मदद-
कई बार होता है कि पुरुष पहले ही स्‍खलित हो जाते हैं, जिस वजह से उनकी पार्टनर को कई बार निराशा हाथ लगती है। इसलिये बेहतर होगा यदि आप ऊपर की तीन टिप्‍स को अपनाते हुए संभोग करें। ऐसा करने से आपकी पार्टनर आपके साथ-साथ डिस्‍चार्ज होगी और संभोग का मज़ा कई गुना ज्‍यादा होगा।


<< पहले भी लिखा था लिंग पुराण के ही बारे में, मन करे तो  या ये जरुर याद रखियेगा ये १८+ का ही मसाला है..;)
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