मुस्तांग जिले में, जोमसोम से १८ किमी उत्तर पूर्व में लगभग ३७४९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मुख्य मंदिर पैगोडा आकार में भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर है। इसके चारों ओर दीवार में बने १०८ गौ मुख जल धारा है जहा से काली गण्डकी नदी का प्रारंभ है। आज से करीब दो अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर सृष्टि की शुरुआत हुई थी। विश्व बह्मांड में सभ्यता की शुरुआत जंबूद्वीप के आर्यावर्त से हुई थी। पुराणों के अनुसार, हमारी पृथ्वी ७ भागों और ४ क्षेत्रों में बंटी हुई है। उसमें सर्व प्रथम मानव सभ्यता का विकास सरीसृप युग के बाद जंबूद्वीप में हुआ। उस जंबूद्वीप में चार क्षेत्र, चार धाम, सप्तपुरी आदि का वर्णन मिलता है। उस क्षेत्र में प्रमुख मुक्ति क्षेत्र हिमवत खंड हिमालय नेपाल में पड़ता है। इन चार क्षेत्रों में प्रमुख क्षेत्र है मुक्तिक्षेत्र। नेपाल के पूर्व दिशा में वराह क्षेत्र नेपाल से बहने वाली गंडकी नारायणी और गंगा के संगम में हरिहर क्षेत्र और विश्व प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र भारत में पड़ता है।Tuesday, October 15, 2019
MUKTINATH :NEPAL : यात्रा मुक्तिनाथ की
Mustang Trip
(Kathmandu-Pokhara-Beni-Tatopani-Marpha-Jomsom-Muktinath)
मुक्तिनाथ यह माना जाता है कि एक बार इस मंदिर में जाने से सभी प्रकार के कष्ट/शोक से राहत मिल जाती है (मुक्ति=निर्वाण, नाथ=भगवान) भगवान मुक्तिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर नेपाल के धौलागिरी अंचल के
मुस्तांग जिले में, जोमसोम से १८ किमी उत्तर पूर्व में लगभग ३७४९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मुख्य मंदिर पैगोडा आकार में भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर है। इसके चारों ओर दीवार में बने १०८ गौ मुख जल धारा है जहा से काली गण्डकी नदी का प्रारंभ है। आज से करीब दो अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर सृष्टि की शुरुआत हुई थी। विश्व बह्मांड में सभ्यता की शुरुआत जंबूद्वीप के आर्यावर्त से हुई थी। पुराणों के अनुसार, हमारी पृथ्वी ७ भागों और ४ क्षेत्रों में बंटी हुई है। उसमें सर्व प्रथम मानव सभ्यता का विकास सरीसृप युग के बाद जंबूद्वीप में हुआ। उस जंबूद्वीप में चार क्षेत्र, चार धाम, सप्तपुरी आदि का वर्णन मिलता है। उस क्षेत्र में प्रमुख मुक्ति क्षेत्र हिमवत खंड हिमालय नेपाल में पड़ता है। इन चार क्षेत्रों में प्रमुख क्षेत्र है मुक्तिक्षेत्र। नेपाल के पूर्व दिशा में वराह क्षेत्र नेपाल से बहने वाली गंडकी नारायणी और गंगा के संगम में हरिहर क्षेत्र और विश्व प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र भारत में पड़ता है।
मुस्तांग जिले में, जोमसोम से १८ किमी उत्तर पूर्व में लगभग ३७४९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मुख्य मंदिर पैगोडा आकार में भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर है। इसके चारों ओर दीवार में बने १०८ गौ मुख जल धारा है जहा से काली गण्डकी नदी का प्रारंभ है। आज से करीब दो अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर सृष्टि की शुरुआत हुई थी। विश्व बह्मांड में सभ्यता की शुरुआत जंबूद्वीप के आर्यावर्त से हुई थी। पुराणों के अनुसार, हमारी पृथ्वी ७ भागों और ४ क्षेत्रों में बंटी हुई है। उसमें सर्व प्रथम मानव सभ्यता का विकास सरीसृप युग के बाद जंबूद्वीप में हुआ। उस जंबूद्वीप में चार क्षेत्र, चार धाम, सप्तपुरी आदि का वर्णन मिलता है। उस क्षेत्र में प्रमुख मुक्ति क्षेत्र हिमवत खंड हिमालय नेपाल में पड़ता है। इन चार क्षेत्रों में प्रमुख क्षेत्र है मुक्तिक्षेत्र। नेपाल के पूर्व दिशा में वराह क्षेत्र नेपाल से बहने वाली गंडकी नारायणी और गंगा के संगम में हरिहर क्षेत्र और विश्व प्रसिद्ध कुरुक्षेत्र भारत में पड़ता है।Monday, June 24, 2019
Pashupatinath Temple,-पशुपतिनाथ मंदिर, काठमांडू नेपाल – दर्शन मान्यताएं और परम्पराएं
भारत सहित दुनिया भर में हिन्दू देवी-देवताओं के कई मंदिर और तीर्थ स्थान मौजूद है। आज हम जिस धार्मिक स्थल की बात कर रहे हैं , हिंदू भगवान शिव के “जानवरों के स्वामी” के रूप में अवतारित हैं जिन्हें उनके भक्त
भोलेनाथ, महादेव, रुद्र, पचमुखी प्रभु-पशुपति आदि नाम को समर्पित स्थान है नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर यह ऐसा ही एक स्थान है, जिसके विषय में यह माना जाता है कि आज भी इसमें शिव की मौजूदगी है। कई धार्मिक स्थलों के साथ अद्भुत मान्यताएं और परम्पराएं जुड़ी होती हैं, जो उन्हें ख़ास बनाती हैं। नेपाल की राजधानी काठमाण्डू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भी ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है जिसके साथ कई अनोखी बातें, मान्यताएं और परम्पराएं जुड़ी हैं।
भोलेनाथ, महादेव, रुद्र, पचमुखी प्रभु-पशुपति आदि नाम को समर्पित स्थान है नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर यह ऐसा ही एक स्थान है, जिसके विषय में यह माना जाता है कि आज भी इसमें शिव की मौजूदगी है। कई धार्मिक स्थलों के साथ अद्भुत मान्यताएं और परम्पराएं जुड़ी होती हैं, जो उन्हें ख़ास बनाती हैं। नेपाल की राजधानी काठमाण्डू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भी ऐसा ही एक धार्मिक स्थल है जिसके साथ कई अनोखी बातें, मान्यताएं और परम्पराएं जुड़ी हैं।
विश्व में दो पशुपतिनाथ मंदिर प्रसिद्ध है एक नेपाल के काठमांडू का और दूसरा भारत के मध्यप्रदेश के मंदसौर का। दोनों ही मंदिर में मुर्तियां समान आकृति वाली है। नेपाल की राजधानी काठमांडू घाटी के पूर्वी भाग में पशुपतिनाथ मंदिर एक प्रसिद्ध और पवित्र हिंदू मंदिर परिसर है जो उत्तर-पूर्व में बागमती नदी के तट पर स्थित है। पशुपतिनाथ भगवान शिव को समर्पित एशिया के चार सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में से एक है। यह मंदिर 5 वीं शताब्दी में निर्मित और बाद में मल्ल राजाओं द्वारा पुनर्निर्मित किया गया था। कहा जाता है कि यह स्थल सहस्राब्दी की शुरुआत से अस्तित्व में था जब एक शिव लिंग की खोज की गई थी। पशुपतिनाथ मंदिर के मुख्य शिवालय शैली में एक सोने की छत, चार तरफ से ढकी हुई चांदी और बेहतरीन गुणवत्ता की लकड़ी की नक्काशी है। कई अन्य हिंदू और बौद्ध देवताओं को समर्पित मंदिर पशुपतिनाथ के मंदिर के आसपास हैं। पशुपतिनाथ मंदिर काठमांडू घाटी के 8 यूनेस्को सांस्कृतिक विरासत स्थलों में से एक है। पशुपति (संस्कृत पाओपति) । वह पूरे हिंदू जगत में पूजनीय हैं। विशेष रूप से नेपाल में, जहां उन्हें अनौपचारिक रूप से राष्ट्रीय देवता माना जाता है।
Monday, January 14, 2019
Kumbh Mela 2019: आइये कुंभ चले
आइये कुंभ चले .......
शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं. पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात साधुओं का जत्था कहा जाता था. पहले अखाड़ा शब्द का चलन नहीं था. साधुओं के जत्थे में पीर और तद्वीर होते थे. अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ. अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द बना है. कुछ मानते हैं कि अक्खड़ से या आश्रम से.
कुंभ मेला 2019: ये हैं कुंभ के 14 अखाड़े, जानें क्या है महत्व🙏🏻🚩👇🏻👇🏻
🚩कुंभ का मेला विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में से एक है. लाखों की संख्या में लोग इस मेले में शामिल होते हैं. कुंभ का मेला हर 12 वर्षों के अंतराल होता है. लेकिन कुंभ का पर्व हर बार सिर्फ 4 पवित्र नदियों में से किसी एक नदी के तट पर ही आयोजित किया जाता है. जिनमें हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की शिप्रा, नासिक की गोदावरी और इलाहाबाद में जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होता है।।🚩
क्या होते हैं अखाड़े👇🏻👇🏻❓❓
🌹कुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है. अखाड़े शब्द की शुरुआत मुगलकाल के दौर से हुई. अखाड़ा साधुओं का वह दल होता है, जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है।।
क्या होती है पेशवाई❓❓🚩🙏🏻👇🏻👇🏻👇🏻
✍जब कुंभ में नाचते-गाते धूमधाम से अखाड़े जाते हैं, तो उसे पेशवाई कहते हैं. कहा जाता है कि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़े बनाए थे. तब से वही अखाड़े बने हुए थे. लेकिन इस बार एक और अखाड़ा जुड़ गया है, जिस कारण इस बार कुंभ में 14 अखाड़ों की पेशवाई देखने की मिलेगी।।🚩👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻
आइए जानें इन 14 अखाड़ों के बारे में🚩🙏🏻👇🏻👇🏻👇🏻
Ⓜ1. अटल अखाड़ा -(शैव )👉🏻 इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं. इस अखाड़े में केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य दीक्षा ले सकते हैं और कोई अन्य इस अखाड़े में नहीं आ सकता है. यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है।।🚩
Ⓜ2. अवाहन अखाड़ा-(शैव )👉🏻 इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन दोनो हैं. इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है।।🚩
Ⓜ3. निरंजनी अखाड़ा-(शैव )👉🏻 यह अखाड़ा सबसे ज्यादा शिक्षित अखाड़ा है. इस अखाड़े में करीब 50 महामंडलेश्र्चर हैं. इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिक हैं. इस अखाड़े की स्थापना 826 ईसवी में हुई थी।।🚩
Ⓜ4. पंचाग्नि अखाड़ा -(शैव )👉🏻 इस अखाड़े में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही दीक्षा ले सकते है. इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है.🚩
Ⓜ5. महानिर्वाण अखाड़ा-(शैव )👉🏻 महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्मा इसी अखाड़े के पास है. इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं. इनकी स्थापना 671 ईसवी में हुई थी।।🚩
Ⓜ6. आनंद अखाड़ा-(शैव ) 👉🏻 इस अखाड़े की स्थापना 855 ईसवी में हुई थी. इस अखाड़े के आचार्य का पद ही प्रमुख होता है. इसका केंद्र वाराणसी है।।🚩
Ⓜ7. निर्मोही अखाड़ा👉🏻- वैष्णव संप्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं. इस अखाड़े की स्थापना रामानंदाचार्य ने 1720 में की थी. इस अखाड़े के मंदिर उत्तर प्रदेश, मध्या प्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान आदि जगहों पर स्थित हैं।।🚩
Ⓜ8. बड़ा उदासीन पंचायती अखाड़ा👉🏻 इस अखाड़े की शुरुआत 1910 में हुई थी. इस अखाड़े के संस्थापक श्रीचंद्रआचार्य उदासीन हैं. इस अखाड़े उद्देश्य सेवा करना है🚩.
Ⓜ9. नया उदासीन अखाड़ा👉🏻- इस अखाड़े की शुरुआत 1710 में हुई थी. मान्यता है कि इस अखाड़े को बड़ा उदासीन अखाड़े के साधुओं ने बनाया था.🚩
Ⓜ10. निर्मल अखाड़ा-👉🏻 इस अखाड़े की स्थापना श्रीदुर्गासिंह महाराज ने की थी, जिनके ईष्टदेव पुस्तक श्री गुरुग्रंथ साहिब हैं. कहा जाता है कि इस अखाड़े के लोगों को दूसरे अखाड़ों की तरह धूम्रपान करने की इजाजत नहीं है।।🚩
Ⓜ11. वैष्णव अखाड़ा👉🏻- इस अखाड़े की स्थापना मध्यमुरारी द्वारा की गई थी.🚩
Ⓜ12. नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा👉🏻 इस अखाड़े की स्थापना 866 ईसवी में हुई, जिसके संस्थापक पीर शिवनाथ जी हैं.🚩
Ⓜ13. जूना अखाड़ा👉🏻 इस अखाड़े के ईष्टदेव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं. हरिद्वार में इस अखाड़े का आश्रम है. इस अखाड़े के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज हैं🚩
Ⓜ14. किन्नर अखाड़ा-👉🏻 अभी तक कुंभ में 13 अखाड़ों की पेशवाई होती थी, लेकिन इस बार कुंभ में किन्नर अखाड़ा भी शामिल हो चुका है. इस अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी हैं।।🚩
🙏🏻🚩🇮🇳🏹🔱🐚🕉
✍,,,,,,,,,
#रजुवाबनारस
अभ्युत्थानम् अधर्मस्या, तदात्मानं सृजाम्यहम्
शैव, वैष्णव और उदासीन पंथ के संन्यासियों के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं. पहले आश्रमों के अखाड़ों को बेड़ा अर्थात साधुओं का जत्था कहा जाता था. पहले अखाड़ा शब्द का चलन नहीं था. साधुओं के जत्थे में पीर और तद्वीर होते थे. अखाड़ा शब्द का चलन मुगलकाल से शुरू हुआ. अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि अलख शब्द से ही अखाड़ा शब्द बना है. कुछ मानते हैं कि अक्खड़ से या आश्रम से.
कुंभ मेला 2019: ये हैं कुंभ के 14 अखाड़े, जानें क्या है महत्व🙏🏻🚩👇🏻👇🏻
🚩कुंभ का मेला विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में से एक है. लाखों की संख्या में लोग इस मेले में शामिल होते हैं. कुंभ का मेला हर 12 वर्षों के अंतराल होता है. लेकिन कुंभ का पर्व हर बार सिर्फ 4 पवित्र नदियों में से किसी एक नदी के तट पर ही आयोजित किया जाता है. जिनमें हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की शिप्रा, नासिक की गोदावरी और इलाहाबाद में जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होता है।।🚩
क्या होते हैं अखाड़े👇🏻👇🏻❓❓
🌹कुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है. अखाड़े शब्द की शुरुआत मुगलकाल के दौर से हुई. अखाड़ा साधुओं का वह दल होता है, जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है।।
क्या होती है पेशवाई❓❓🚩🙏🏻👇🏻👇🏻👇🏻
✍जब कुंभ में नाचते-गाते धूमधाम से अखाड़े जाते हैं, तो उसे पेशवाई कहते हैं. कहा जाता है कि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़े बनाए थे. तब से वही अखाड़े बने हुए थे. लेकिन इस बार एक और अखाड़ा जुड़ गया है, जिस कारण इस बार कुंभ में 14 अखाड़ों की पेशवाई देखने की मिलेगी।।🚩👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻
आइए जानें इन 14 अखाड़ों के बारे में🚩🙏🏻👇🏻👇🏻👇🏻
Ⓜ1. अटल अखाड़ा -(शैव )👉🏻 इनके ईष्ट देव भगवान गणेश हैं. इस अखाड़े में केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य दीक्षा ले सकते हैं और कोई अन्य इस अखाड़े में नहीं आ सकता है. यह सबसे प्राचीन अखाड़ों में से एक माना जाता है।।🚩
Ⓜ2. अवाहन अखाड़ा-(शैव )👉🏻 इनके ईष्ट देव श्री दत्तात्रेय और श्री गजानन दोनो हैं. इस अखाड़े का केंद्र स्थान काशी है।।🚩
Ⓜ3. निरंजनी अखाड़ा-(शैव )👉🏻 यह अखाड़ा सबसे ज्यादा शिक्षित अखाड़ा है. इस अखाड़े में करीब 50 महामंडलेश्र्चर हैं. इनके ईष्ट देव भगवान शंकर के पुत्र कार्तिक हैं. इस अखाड़े की स्थापना 826 ईसवी में हुई थी।।🚩
Ⓜ4. पंचाग्नि अखाड़ा -(शैव )👉🏻 इस अखाड़े में केवल ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही दीक्षा ले सकते है. इनकी इष्ट देव गायत्री हैं और इनका प्रधान केंद्र काशी है.🚩
Ⓜ5. महानिर्वाण अखाड़ा-(शैव )👉🏻 महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा का जिम्मा इसी अखाड़े के पास है. इनके ईष्ट देव कपिल महामुनि हैं. इनकी स्थापना 671 ईसवी में हुई थी।।🚩
Ⓜ6. आनंद अखाड़ा-(शैव ) 👉🏻 इस अखाड़े की स्थापना 855 ईसवी में हुई थी. इस अखाड़े के आचार्य का पद ही प्रमुख होता है. इसका केंद्र वाराणसी है।।🚩
Ⓜ7. निर्मोही अखाड़ा👉🏻- वैष्णव संप्रदाय के तीनों अणि अखाड़ों में से इसी में सबसे ज्यादा अखाड़े शामिल हैं. इस अखाड़े की स्थापना रामानंदाचार्य ने 1720 में की थी. इस अखाड़े के मंदिर उत्तर प्रदेश, मध्या प्रदेश, गुजरात, बिहार, राजस्थान आदि जगहों पर स्थित हैं।।🚩
Ⓜ8. बड़ा उदासीन पंचायती अखाड़ा👉🏻 इस अखाड़े की शुरुआत 1910 में हुई थी. इस अखाड़े के संस्थापक श्रीचंद्रआचार्य उदासीन हैं. इस अखाड़े उद्देश्य सेवा करना है🚩.
Ⓜ9. नया उदासीन अखाड़ा👉🏻- इस अखाड़े की शुरुआत 1710 में हुई थी. मान्यता है कि इस अखाड़े को बड़ा उदासीन अखाड़े के साधुओं ने बनाया था.🚩
Ⓜ10. निर्मल अखाड़ा-👉🏻 इस अखाड़े की स्थापना श्रीदुर्गासिंह महाराज ने की थी, जिनके ईष्टदेव पुस्तक श्री गुरुग्रंथ साहिब हैं. कहा जाता है कि इस अखाड़े के लोगों को दूसरे अखाड़ों की तरह धूम्रपान करने की इजाजत नहीं है।।🚩
Ⓜ11. वैष्णव अखाड़ा👉🏻- इस अखाड़े की स्थापना मध्यमुरारी द्वारा की गई थी.🚩
Ⓜ12. नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा👉🏻 इस अखाड़े की स्थापना 866 ईसवी में हुई, जिसके संस्थापक पीर शिवनाथ जी हैं.🚩
Ⓜ13. जूना अखाड़ा👉🏻 इस अखाड़े के ईष्टदेव रुद्रावतार दत्तात्रेय हैं. हरिद्वार में इस अखाड़े का आश्रम है. इस अखाड़े के पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी महाराज हैं🚩
Ⓜ14. किन्नर अखाड़ा-👉🏻 अभी तक कुंभ में 13 अखाड़ों की पेशवाई होती थी, लेकिन इस बार कुंभ में किन्नर अखाड़ा भी शामिल हो चुका है. इस अखाड़े की महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी हैं।।🚩
🙏🏻🚩🇮🇳🏹🔱🐚🕉
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#रजुवाबनारस
अभ्युत्थानम् अधर्मस्या, तदात्मानं सृजाम्यहम्
Monday, November 5, 2018
फेसबुक के बारे में रोचक तथ्य
फेसबुक… मानो तो आज की सबसे अहम जरूरत। कई लोग तो अपना पूरा दिन फेसबुक में ऑनलाइन रहते हुए बिता सकते हैं। दुनिया की सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग साइट हमारे जीवन का एक हिस्सा बन गई है। हम आस-पास ऐसे लोग भी देखते है जो फेसबुक के बिना नही रह सकते। फेसबुक की शुरूआत आज ही के दिन 4 फरवरी 2004 को की गई थी। आप चाहे Daily Facebook use करते हो लेकिन हम फेसबुक से जुड़े ऐसे रोचक तथ्य बताएंगे जो आपको Facebook पर भी मिलने मुश्किल हैं
1. फेसबुक का लाइक बटन :
फेसबुक के 'लाइक' बटन का नाम पहले 'ऑसम' (Awesome) रखने का डिसीजन लिया गया था
2.फेसबुक केवल 70 भाषाओं में उपलब्ध है :
फेसबुक सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट है। लेकिन यह अब तक केवल 70 भाषाओं में उपलब्ध है।
3. क्यों है फेसबुक का रंग नीला :
फेसबुक के नीले रंग में रंगे होने के पीछे सीधा सा कारण है। इसके फाउंडर मार्क जुकरबर्ग का कलर ब्लाइंड होना। न्यूयॉर्कर को दिए अपने एक इंटरव्यू में मार्क ने कहा की उन्हें लाल और हरा रंग दिखाई नहीं देता है। इसलिए नीला रंग उनके लिए सबसे आसान रंग है। फेसबुक शुरू से ही एक ही रंग में रंगा हुआ है। मार्के इसे हमेशा से जितना हो सके उतना सादा बनाना चाहते थे। यही वजह है कि उन्होंने फेसबुक को नीले रंग में रंग दिया।
4. फेसबुक पर ब्लॉक नहीं हो सकते जुकरबर्ग-
फेसबुक की प्राइवेसी सेटिंग्स के कारण हर यूजर को ब्लॉक करने की सुविधा दी गई है, लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि आप चाहें तो भी फेसबुक से मार्क जुकरबर्ग को ब्लॉक नहीं कर सकते हैं।
5. आइसलैंड का संविधान लिखा गया था फेसबुक की मदद से-
1944 में डेनमार्क से अलग होने के बाद आइसलैंड ने अपना संविधान कभी नहीं बनाया। यहां हमेशा से डेनमार्क के संविधान को ही माना जाता था। आइसलैंड ने 2011 में अपना संविधान दोबारा लिखने का फैसला लिया। इसके बाद 25 लोगों की एक काउंसिल बनाई गई जिसने फेसबुक का सहारा लेकर लोगों से सुझाव मांगे। इस काउंसिल ने अपना ड्राफ्ट जिसमें नियमों को लिखा गया था उसे फेसबुक पर पोस्ट किया। इस ड्राफ्ट पर लोगों ने अपने कमेंट्स किए लोगों के कमेंट्स और सुझावों के आधार पर ही आइसलैंड का संविधान बना जिसे बाद में फेसबुक पर पोस्ट भी किया गया।
6. लोकेशन के हिसाब से बदल जाता है फेसबुक का ग्लोब-
शायद आपको ना पता हो, लेकिन फेसबुक ग्लोब (नोटिफिकेशन टैब) यूजर्स की लोकेशन के हिसाब से बदल जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी यूजर ने भारत से लॉगइन किया है तो फेसबुक नोटिफिकेशन ग्लोब एशिया का नक्शा दिखाएगा और उसी यूजर ने अगर अमेरिका में जाकर अपना अकाउंट खोला तो ग्लोब नॉर्थ अमेरिका और साउथ अमेरिका का नक्शा दिखाएगा।
7. फेसबुक यूजर कि मृत्यु के बाद क्या होता है उसके अकाउंट का ?
इस वक़्त फेसबुक पर 30 मिलियन मरे हुए लोग है ! यदि किसी फेसबुक यूजर कि मृत्यु हो जाति है तो क्या उसकी फेसबुक प्रोफाइल ऐसे ही चलती रहती है ? जी नहीं ! यदि हमारी जान पहचान में किसी कि मृत्यु हो जाति है तो हम फेसबुक को रिपोर्ट कर उस प्रोफाइल को फेसबुक पर एक स्मारक का रूप दिलवा सकते है !
8. 2011 में तलाक का सबसे बड़ा कारण बनी थी फेसबुक-
2011 में डायवोर्स ऑनलाइन के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में फाइल किए गए सभी डायवोर्स में से एक तिहाई में तलाक लेने का कारण किसी ना किसी वजह से फेसबुक था। डायवोर्स ऑनलाइन के मुताबिक इस बात का दावा करने के लिए लोगों द्वारा अपने पार्टनर के चैट मैसेज, भद्दे कमेंट्स और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट सबूत के तौर पर पेश किए गए। सोशल मीडिया के आने से रिश्तों में बदलाव देखने को मिला है।
9.फेसबुक के इंडियन FACTS
सबसे ज्यादा फेक अकाउंट्स बनाते हैं भारतीय-
फेसबुक की तरफ से नवंबर में एक रिपोर्ट जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में कंपनी का कहना था कि 14.3 करोड़ अकाउंट्स फेक होते हैं। इनमें से सबसे ज्यादा फेक अकाउंट भारत से बनाए जाते हैं।
फेसबुक पर पहली भारतीय-
फेसबुक से जुड़ने वाली पहली भारतीय मूल की महिला थी शीला तंद्राशेखरा क्रिश्नन। इनका यूजर नंबर फेसबुक पर 37 है।
फेसबुक की पहली महिला इंजीनियर
फेसबुक पर काम करने वाली पहली महिला इंजीनियर है रुचि सांघवी (RUCHI SANGHVI) रुचि ने ही फेसबुक पर न्यूज फीड का आइडिया दिया था। फेसबुक का न्यूज फीड सबसे विवादास्पद होने के साथ साथ फेसबुक का सबसे लोकप्रिय फीचर भी रहा।
शायद आपको यह जानकर हैरानी हो लेकिन Facebook का एडिक्शन एक बीमारी का रूप लेता जा रहा है। दुनियाभर में हर उम्र के लोग Facebook एडिक्शन डिसऑर्डर यानी Facebook की लत से जूझ रहे हैं। इस बीमारी का संक्षिप्त नाम FAD है। इस वक्त दुनिया में लगभग 35 करोड़ लोग FAD से ग्रसित हैं।
यदि फेसबुक एक देश होता तो दुनिया में यह पांचवां सबसे बड़ा देश होता जिसका नंबर चीन , भारत, अमेरिका, और इंडोनेशिया के बाद आता।
दोस्तो कैसी लगी हमारी पोस्ट कमेंट करके जरुर बताइए।
धन्यवाद।
1. फेसबुक का लाइक बटन :
फेसबुक के 'लाइक' बटन का नाम पहले 'ऑसम' (Awesome) रखने का डिसीजन लिया गया था
2.फेसबुक केवल 70 भाषाओं में उपलब्ध है :
फेसबुक सबसे बड़ी सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट है। लेकिन यह अब तक केवल 70 भाषाओं में उपलब्ध है।
3. क्यों है फेसबुक का रंग नीला :
फेसबुक के नीले रंग में रंगे होने के पीछे सीधा सा कारण है। इसके फाउंडर मार्क जुकरबर्ग का कलर ब्लाइंड होना। न्यूयॉर्कर को दिए अपने एक इंटरव्यू में मार्क ने कहा की उन्हें लाल और हरा रंग दिखाई नहीं देता है। इसलिए नीला रंग उनके लिए सबसे आसान रंग है। फेसबुक शुरू से ही एक ही रंग में रंगा हुआ है। मार्के इसे हमेशा से जितना हो सके उतना सादा बनाना चाहते थे। यही वजह है कि उन्होंने फेसबुक को नीले रंग में रंग दिया।
4. फेसबुक पर ब्लॉक नहीं हो सकते जुकरबर्ग-
फेसबुक की प्राइवेसी सेटिंग्स के कारण हर यूजर को ब्लॉक करने की सुविधा दी गई है, लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि आप चाहें तो भी फेसबुक से मार्क जुकरबर्ग को ब्लॉक नहीं कर सकते हैं।
5. आइसलैंड का संविधान लिखा गया था फेसबुक की मदद से-
1944 में डेनमार्क से अलग होने के बाद आइसलैंड ने अपना संविधान कभी नहीं बनाया। यहां हमेशा से डेनमार्क के संविधान को ही माना जाता था। आइसलैंड ने 2011 में अपना संविधान दोबारा लिखने का फैसला लिया। इसके बाद 25 लोगों की एक काउंसिल बनाई गई जिसने फेसबुक का सहारा लेकर लोगों से सुझाव मांगे। इस काउंसिल ने अपना ड्राफ्ट जिसमें नियमों को लिखा गया था उसे फेसबुक पर पोस्ट किया। इस ड्राफ्ट पर लोगों ने अपने कमेंट्स किए लोगों के कमेंट्स और सुझावों के आधार पर ही आइसलैंड का संविधान बना जिसे बाद में फेसबुक पर पोस्ट भी किया गया।
6. लोकेशन के हिसाब से बदल जाता है फेसबुक का ग्लोब-
शायद आपको ना पता हो, लेकिन फेसबुक ग्लोब (नोटिफिकेशन टैब) यूजर्स की लोकेशन के हिसाब से बदल जाती है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी यूजर ने भारत से लॉगइन किया है तो फेसबुक नोटिफिकेशन ग्लोब एशिया का नक्शा दिखाएगा और उसी यूजर ने अगर अमेरिका में जाकर अपना अकाउंट खोला तो ग्लोब नॉर्थ अमेरिका और साउथ अमेरिका का नक्शा दिखाएगा।
7. फेसबुक यूजर कि मृत्यु के बाद क्या होता है उसके अकाउंट का ?
इस वक़्त फेसबुक पर 30 मिलियन मरे हुए लोग है ! यदि किसी फेसबुक यूजर कि मृत्यु हो जाति है तो क्या उसकी फेसबुक प्रोफाइल ऐसे ही चलती रहती है ? जी नहीं ! यदि हमारी जान पहचान में किसी कि मृत्यु हो जाति है तो हम फेसबुक को रिपोर्ट कर उस प्रोफाइल को फेसबुक पर एक स्मारक का रूप दिलवा सकते है !
8. 2011 में तलाक का सबसे बड़ा कारण बनी थी फेसबुक-
2011 में डायवोर्स ऑनलाइन के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में फाइल किए गए सभी डायवोर्स में से एक तिहाई में तलाक लेने का कारण किसी ना किसी वजह से फेसबुक था। डायवोर्स ऑनलाइन के मुताबिक इस बात का दावा करने के लिए लोगों द्वारा अपने पार्टनर के चैट मैसेज, भद्दे कमेंट्स और फेसबुक फ्रेंड्स लिस्ट सबूत के तौर पर पेश किए गए। सोशल मीडिया के आने से रिश्तों में बदलाव देखने को मिला है।
9.फेसबुक के इंडियन FACTS
सबसे ज्यादा फेक अकाउंट्स बनाते हैं भारतीय-
फेसबुक की तरफ से नवंबर में एक रिपोर्ट जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में कंपनी का कहना था कि 14.3 करोड़ अकाउंट्स फेक होते हैं। इनमें से सबसे ज्यादा फेक अकाउंट भारत से बनाए जाते हैं।
फेसबुक पर पहली भारतीय-
फेसबुक से जुड़ने वाली पहली भारतीय मूल की महिला थी शीला तंद्राशेखरा क्रिश्नन। इनका यूजर नंबर फेसबुक पर 37 है।
फेसबुक की पहली महिला इंजीनियर
फेसबुक पर काम करने वाली पहली महिला इंजीनियर है रुचि सांघवी (RUCHI SANGHVI) रुचि ने ही फेसबुक पर न्यूज फीड का आइडिया दिया था। फेसबुक का न्यूज फीड सबसे विवादास्पद होने के साथ साथ फेसबुक का सबसे लोकप्रिय फीचर भी रहा।
शायद आपको यह जानकर हैरानी हो लेकिन Facebook का एडिक्शन एक बीमारी का रूप लेता जा रहा है। दुनियाभर में हर उम्र के लोग Facebook एडिक्शन डिसऑर्डर यानी Facebook की लत से जूझ रहे हैं। इस बीमारी का संक्षिप्त नाम FAD है। इस वक्त दुनिया में लगभग 35 करोड़ लोग FAD से ग्रसित हैं।
यदि फेसबुक एक देश होता तो दुनिया में यह पांचवां सबसे बड़ा देश होता जिसका नंबर चीन , भारत, अमेरिका, और इंडोनेशिया के बाद आता।
दोस्तो कैसी लगी हमारी पोस्ट कमेंट करके जरुर बताइए।
धन्यवाद।
Sunday, July 8, 2018
History of Langot ; लंगोट का इतिहास
जब से पता चला है कि लंगोटे की बिक्री में 30% की कमी आई है अब से तो टेंशन हो गया हालांकि लंगोट के बारे में बहुत अभी भी कम ही लोग जानते हैं अगर गूगल में खोजा जाए तो गूगल के अनुसार लंगोट पहलवानों के इस्तेमाल में आता है और कुछ हिंदूवादी संगठन भी लोगों के खास प्रचार प्रसार करते रहते हैं ऐसा गूगल में देखा जाता है लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता मेरे हिसाब से लंगोट एक विशुद्ध भारतीय प्राचीन अंग वस्त्र है, जिसका उपयोग खास कर पूर्वी उत्तर प्रदेश में होता है... ये पताका के रूप में बनारस और उसके आस पास दिख जायेगे... खास कर बनारस शहर में उसके उपयोगकर्ता दिखते है...
Saturday, September 30, 2017
Khajuraho Group of Monuments : खजुराहो की यात्रा
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राजीव शंकर मिश्रा , बनारस वाले
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6:04 PM
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खजुराहो की यात्रा 30 September 2017
तो सुबह ५ बजे ही पत्नी जी की मधुर आवाज सुनाई दी, उठो चाय आ चुकी है, चाय पि लो कितने बजे
खजुराहो की टैक्सी आएगी ? मैंने कहा ९ बजे यहाँ से ब्रेकफास्ट कर के निकलेगे..
१ घंटे में नाहा धो अपन तैयार हुवे आउर निकल पड़े खजुराहो की तरफ, सुबह ९ बजे अपन की टैक्सी आ चुकी थी, एक दम नयी बिना नंबर की अपन दोनों पति पत्नी सामान रख टैक्सी में बिराज हुवे , टैक्सी चालक से पता चला की करीब १४० किलोमीटर की दुरी है जो करीब ४ घंटे लगेगे.. मैहर - उचेहरा – पन्ना – खजुराहो वाया NH 39, हम मैहर से बाहर निकले हमारी टैक्सी दौड़ रही थी,इस नक्से के आधार पर ४० किलो मीटर चलने के बाद तो लगा की किसी गाव में आ गए है, उजड़ी सड़के, धुल मिटटी, खैर जाना तो था तो चुप चाप चल रहे थे
खजुराहो की टैक्सी आएगी ? मैंने कहा ९ बजे यहाँ से ब्रेकफास्ट कर के निकलेगे..
१ घंटे में नाहा धो अपन तैयार हुवे आउर निकल पड़े खजुराहो की तरफ, सुबह ९ बजे अपन की टैक्सी आ चुकी थी, एक दम नयी बिना नंबर की अपन दोनों पति पत्नी सामान रख टैक्सी में बिराज हुवे , टैक्सी चालक से पता चला की करीब १४० किलोमीटर की दुरी है जो करीब ४ घंटे लगेगे.. मैहर - उचेहरा – पन्ना – खजुराहो वाया NH 39, हम मैहर से बाहर निकले हमारी टैक्सी दौड़ रही थी,इस नक्से के आधार पर ४० किलो मीटर चलने के बाद तो लगा की किसी गाव में आ गए है, उजड़ी सड़के, धुल मिटटी, खैर जाना तो था तो चुप चाप चल रहे थे Thursday, September 28, 2017
Maihar Yatra मैहर यात्रा
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राजीव शंकर मिश्रा , बनारस वाले
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मैहर यात्रा 28 September 2017
हिन्दु धरम में सबसे बड़ी परेशानी है की मेहरारू के साथ धरम करम करना पड़ता है, इस साल कही पत्नी जी को ले कर कही निकले नहीं थे समाधी में, मने मेडिटेशन में क्यों की पत्नी जी के साथ मेडिटेशन करने से शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से हम स्वस्थ्य रह सकते हैं। मेडिटेशन तनाव और चिंता जैसी
गंभीर समस्याओं के समाधान में भी लाभदायक है। तो सोचा था इस साल कुछ तूफानी करते है, चुकी पत्नी जी संघी मिजाज की है तो धार्मिक आस्था की बवासीर हर समय चपका रहता है आउर हम रहे सम्भोग से समाधी वाले, यही मामला नहीं मिलता है हर दिन किसी न किसी बात पर पत्नी जी से पंगा हो जाता है, लेकिन हिन्दू धरम में दहेज़ एक बुरी प्रथा है जो पैसे के लालच में मा बाप अपने बेटे के बेच देते है रोज सुनना पड़ता है .. एकदम्मे चूतिया हो का बे ????????
गंभीर समस्याओं के समाधान में भी लाभदायक है। तो सोचा था इस साल कुछ तूफानी करते है, चुकी पत्नी जी संघी मिजाज की है तो धार्मिक आस्था की बवासीर हर समय चपका रहता है आउर हम रहे सम्भोग से समाधी वाले, यही मामला नहीं मिलता है हर दिन किसी न किसी बात पर पत्नी जी से पंगा हो जाता है, लेकिन हिन्दू धरम में दहेज़ एक बुरी प्रथा है जो पैसे के लालच में मा बाप अपने बेटे के बेच देते है रोज सुनना पड़ता है .. एकदम्मे चूतिया हो का बे ???????? Tuesday, June 27, 2017
Seema Subedi : सीमा सुवेदी विवाद
दुनिया चल रही है लोग खोज रहे है लेकिन इधर बीच नेपाल से वेब की खोज में सीमा सुवेदी टाप पर है उसके खिलाफ नेपाल की मिडिया में काफी नाराजगी दिख रही है जो फेसबुक न्यूज़फ़ीड, ट्विटर, यूट्यूब और सभी सामाजिक प्लेटफार्मों पर है।
लेकिन वास्तव में क्या मामला है ? क्यों इतनी खोज बिन हो रही है सीमा सुवेदी की वह रातों रात क्यों इतनी
Sunday, June 25, 2017
Shambhunath Shukla: ५ दिवसी नेपाल यात्रा संमरण शम्भू नाथ शुक्ल जी की
लोगो के सेलिब्रेटिस अलग अलग ही होते है, मेरे आदर्श लोग फेसबुक पर ही मौजूद है, फेसबुक के न आने से पहले मेरा ज्ञान सिमित था, लेकिन फेसबुक से जुड़ने के बाद तमाम सोच के लोगो से परिचय हुवा, हाला की मेरा मानना है की किताबो से अच्छा कोई दोस्त नहीं हो सकता, फेसबुक भी चहरे की एक किताब है, जहा कुछ नया इनोवेसन होता रहता है, कलम के माध्यम से, इससे हमें बहुत कुछ सिखने का मौका मिलता है, हाला की सोसल मिडिया के आने से ज्ञान का बाजार बड़ा हुवा है, सामान्यतः हर आदमी के जीवन में उसका दायरा होता है, जहा वो पड़ता है, उसके अगल बगल जो लोग रहते है वो जो करते है वही वो सीखता है, उसमे अहम् रोल होता है माँ बाप का फिर गुरु का, एक कहावत भी सुने थे बचपन में की
Sunday, May 28, 2017
Congress Social media : कांग्रेस सोशल मीडिया सम्मलेन
हाला की कभी राजनीती से झुकाव नहीं रहा है क्यों की माँ पिता जी को राजनीती पसंद नहीं, बचपन से यही सिखाया गया की सबसे गन्दी राजनीती ही होती है..
यु तो लिखने पड़ने का सुख नेपाल में ही ले पाया क्यों की जब तक भारत में रहे नौकरी के लिए ही संघर्ष करते रहे, बचपन से थे लंठ बनारसी तो हर जगह वही अंदाज.. २००४ से सोसल साइड के आने के बाद लगा की बनारस के लोग कुछ भी नहीं जानते क्यों की वो सिफ शिवत्व में ही रहते है .
गूगल बाबा के अनुसार “नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यवहार राजनीति (पॉलिटिक्स) कहलाती है। अधिक संकीर्ण रूप से कहें तो शासन में पद प्राप्त करना तथा सरकारी पद का उपयोग करना राजनीति है। राजनीति में बहुत से रास्ते अपनाये जाते हैं जैसे- राजनीतिक विचारों को आगे बढ़ाना, कानून बनाना, विरोधियों के विरुद्ध युद्ध आदि शक्तियों का प्रयोग करना। राजनीति बहुत से स्तरों पर हो सकती है- गाँव की परम्परागत राजनीति से लेकर, स्थानीय सरकार, सम्प्रभुत्वपूर्ण राज्य या अन्तराष्ट्रीय स्तर पर। “
यु तो लिखने पड़ने का सुख नेपाल में ही ले पाया क्यों की जब तक भारत में रहे नौकरी के लिए ही संघर्ष करते रहे, बचपन से थे लंठ बनारसी तो हर जगह वही अंदाज.. २००४ से सोसल साइड के आने के बाद लगा की बनारस के लोग कुछ भी नहीं जानते क्यों की वो सिफ शिवत्व में ही रहते है .
गूगल बाबा के अनुसार “नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यवहार राजनीति (पॉलिटिक्स) कहलाती है। अधिक संकीर्ण रूप से कहें तो शासन में पद प्राप्त करना तथा सरकारी पद का उपयोग करना राजनीति है। राजनीति में बहुत से रास्ते अपनाये जाते हैं जैसे- राजनीतिक विचारों को आगे बढ़ाना, कानून बनाना, विरोधियों के विरुद्ध युद्ध आदि शक्तियों का प्रयोग करना। राजनीति बहुत से स्तरों पर हो सकती है- गाँव की परम्परागत राजनीति से लेकर, स्थानीय सरकार, सम्प्रभुत्वपूर्ण राज्य या अन्तराष्ट्रीय स्तर पर। “
Thursday, April 27, 2017
मदर्स डे (मातृ दिवस)
आज नेपाली बैशाख महिना का आमवस्या (वैशाख कृष्णऔँसी ) मतलब माता जी का मुख देखने का दिन, नेपाल का त्यौहार मुझे बहुत अच्छा लगता है , बस इसके पीछे एक सिंपल लोजिक है की माँ ने नौ महिनातक अपने गर्भ में रख कर जन्म दिया है
इस सम्मान में आज ये त्यौहार मनाया जाता है जिसे नेपाली में कहा जाता है “आमाको मुख हेर्ने दिन”
Sunday, April 23, 2017
तो यह काशी एक असाधारण यंत्र है
वाराणसी – जिसे बनारस और काशी भी कहते हैं, भारत का सबसे पुराना और आध्यात्मिक शहर है। किसने रचा इस शहर को? क्या शिव खुद यहां रहते थे? क्या है इसका इतिहास? आइये जानते हैं इस संवाद के द्वारा वाराणसी की विशेषताएं
प्रसून जोशी: सद्गुरु, युगों पहले से लोग बनारस के बारे में बात करते आ रहे हैं। इस शहर में आखिर ऐसा क्या खास है? कहा जाता है कि कुछ यंत्र और खास विचार को ध्यान में रखते हुए इस शहर का डिजाइन तैयार किया गया था। क्या आप बता सकते हैं कि इस शहर का निर्माण कैसे हुआ और इसका महत्व क्या है?
सद्गुरु: यंत्र का मतलब है एक मशीन। मूल रूप से आज हम जो भी हैं – अपनी मौजूदा स्थिति को बेहतर बनाने के लिए ही हम कोई मशीन बनाते हैं या अब तक हमने इसी मकसद से मशीन बनाए बनाये हैं।
सद्गुरु: यंत्र का मतलब है एक मशीन। मूल रूप से आज हम जो भी हैं – अपनी मौजूदा स्थिति को बेहतर बनाने के लिए ही हम कोई मशीन बनाते हैं या अब तक हमने इसी मकसद से मशीन बनाए बनाये हैं।
Thursday, April 13, 2017
Vinay kull विनय कुल
हम ठहरे खांटी बनारसी, दिमाक से वही तन्नी गुरु स्टाइल, आप समझ सकते है, २००३ में भारत से बाहर निकले तो एक नयी दुनिया देखी, लोग कितने ब्यस्त है, कितनी क्रिएटिविटी है, उनकी सोच कुछ अलग है है, लेकिन वो एक समाज के ऐसे कोने में है की लोगो की नजरे ही नहीं जाती, लेकिन हम सुनते सबकी है, करते अपने मन का, लोगो की सोच में मंथन करने का, ये बनारसियो की आदत है, जो दुनिया नहीं करती वो बनारसी करते है क्यों की बनारस में हर बिद्या के गुरु है, बनारसी हु, लेकिन बनारस गुरु लोगो की ही नगरी है, मस्ती का शहर, उसी क्रम में एक बनारसी मस्ती का अंदाज “ विनय कुल जी “ अब का तो पता नहीं, आज से २० साल पहले बनारस में संध्या कालीन अख़बार “ गांडीव “ जिसमे विनय जी के कार्टून “जवाब नहीं” नियमित रूप से बनारसियो का एक नशा था “ छान घोट के गांडीव पड़ना और दिन भर के थकान को विनय कुल जी के कार्टून के माध्यम से राहत .. उस समय चुकी आज जैसे मिडिया का जमाना तो था नहीं, बस पत्र पत्रिकाए, जिसमे विनय जी के हास्य ब्यंग दिख जाते ... अब मिडिया का जमाना आया तो एक दिन फेसबुक के एक पेज में साल २०१२ में धरा गए, जिन्होंने हम जैसे बनारसियो जो बनारस को प्रतक्ष्य नहीं देख सकते थे “सुबहे बनारस“ “हमारी काशी “ के भी दर्शन आप के माध्यम से होने लगा डरते डरते उनको फेसबुक पर निवेदन भेजे, स्वीकार हो गया, तो हमहू फुल के कुप्पा हो गए की आज पहली बार किसी दिब्य बनारसी के हम मित्र सूचि में जगह पाए है.. अब तो विनय जी की विधा पुरे सोसल मिडिया में छितरा रहा है, पुरे बनारस के सटीक जानकारी के एन्साक्लोपीडिया है, ३-४ बार मिलना हुवा, जो हास्य विधा में मालिक है, वो असल जिन्दगी में बहुत गंभीर, नपी तुली बात करने वाले और अपने उसूलो के कट्टर, नो एहर होहर, उनके साथ बनारस की और भी छुपी विधा के दर्शन हुवे, जिसे मैंने गूगल पर लिखने की कोशिश की है, क्यों की ये बनारस की प्रतिभा सिर्फ बनारस में ही न रह जाये, दुनिया के लोग जाने इसी क्रम में विनय कुल जी.
Tuesday, April 4, 2017
सेतो मच्छिन्द्रनाथ की रथ जात्रा
काठमांडू (२०७३ चैत्र २२, मंगलवार) आज नेपाल में चैते दशाहिं (चैते दशैं), मतलब चैत्र के नवरात्र की Astmi
तिथि, नेपाल के सभी सिद्ध देवी मंदिरों में मनाया जाता है, "चैते दशाहिं" में बड़ा दशाहिं (नेपाली हिन्दू का महान पर्व महान चाड बडा दशैं ) जैसे ही माँ दुर्गा भवानी की आराधना की जाती है, आज के दिन काठमांडू के दक्षिण काली, शोभा भगवती, गुहेस्वारी, नक्साल भगवती, संकठा, कलिका स्थान, मैती देवी के साथ ही गोरखा जिले के माँ मनकामना, काभ्रे जिले के पलान चौक भगवती, पोखरा के माँ विन्दवासिनी,सहित देश के सभी शक्ति पीठ में भक्त पूजा अर्चना करते है, और आज ही नेपाल में नेवारी समूह का एक बड़ा पर्व "सेतो मछेंद्र की रथयात्रा (सेतो मच्छिन्द्रनाथ की रथ जात्रा) का भी पर्व मनाया जाता है., जिसे जनबाहा द्यो, आर्यवलोकीतवारा, करुनामाया के नाम से भी जाना जाता है, जिन्हें हिन्दू और बौध दोनों
तिथि, नेपाल के सभी सिद्ध देवी मंदिरों में मनाया जाता है, "चैते दशाहिं" में बड़ा दशाहिं (नेपाली हिन्दू का महान पर्व महान चाड बडा दशैं ) जैसे ही माँ दुर्गा भवानी की आराधना की जाती है, आज के दिन काठमांडू के दक्षिण काली, शोभा भगवती, गुहेस्वारी, नक्साल भगवती, संकठा, कलिका स्थान, मैती देवी के साथ ही गोरखा जिले के माँ मनकामना, काभ्रे जिले के पलान चौक भगवती, पोखरा के माँ विन्दवासिनी,सहित देश के सभी शक्ति पीठ में भक्त पूजा अर्चना करते है, और आज ही नेपाल में नेवारी समूह का एक बड़ा पर्व "सेतो मछेंद्र की रथयात्रा (सेतो मच्छिन्द्रनाथ की रथ जात्रा) का भी पर्व मनाया जाता है., जिसे जनबाहा द्यो, आर्यवलोकीतवारा, करुनामाया के नाम से भी जाना जाता है, जिन्हें हिन्दू और बौध दोनों Friday, March 31, 2017
ब्रेकिंग न्यूज
ब्रेकिंग न्यूज
नरैन्द्र माेदी ने किया कमाल केंद्र सरकार ने लिया अहम निर्णय!
पैट्रोल डीजल के दामो में अब तक की सबसे भारी गिरावट के चलते 40 साल के रिकार्ड को तोड़ने वाला रेट 31 मार्च 2017 रात 12.00बजे से लागू होगा
पट्राेल रूपये 37.30 प्रति लीटर & डीजल 31.80 रुपये प्रति लीटर होंगे रेट
🙏हर हर माेदी 🙏
🙏हर हर माेदी 🙏
Saturday, March 25, 2017
आखिर ये धर्म है क्या ?
अभी बेटे का एग्जाम ख़तम हुवा, परेशान हो गया था वो ,हफ्ता हो गया अब उने वापसी का टाइम तो तो कल पशुपति नाथ मंदिर मंदिर गया था दीवाल पर एक नया वाल तो माँ मने मेरी धर्म पत्नी के साथ आ गए
काठमांडू. एक पेंटिंग लगा था ।। धर्म के लिए जीना सीखिए ।। चुकी हाथ में पूजा का सामान पकडे थे नहीं तो फोटो खीच लेता लेकिन ये बात पड़ के सर चकरा गया। अब चूकि धर्म पत्नी साथ में थी तो धर्म पे वार्तालाप हो नहीं सकता था । ये सोच के की जब धर्म साथ में ही है तो क्या सीखे , मन मसोस के रह गए तो चुपचाप रहना ही उचित समझा । खैर शांत मन से मंदिर के अन्दर घुसा, लाईन लम्बी थे तो लग गए सबसे आगे धर्म पत्नी जी बिच में सुपुत्र जी पीछे है सिर्फ "पति" जिसमे कोई धर्म का सरोकार नहीं , लगे शिव जाप करने
काठमांडू. एक पेंटिंग लगा था ।। धर्म के लिए जीना सीखिए ।। चुकी हाथ में पूजा का सामान पकडे थे नहीं तो फोटो खीच लेता लेकिन ये बात पड़ के सर चकरा गया। अब चूकि धर्म पत्नी साथ में थी तो धर्म पे वार्तालाप हो नहीं सकता था । ये सोच के की जब धर्म साथ में ही है तो क्या सीखे , मन मसोस के रह गए तो चुपचाप रहना ही उचित समझा । खैर शांत मन से मंदिर के अन्दर घुसा, लाईन लम्बी थे तो लग गए सबसे आगे धर्म पत्नी जी बिच में सुपुत्र जी पीछे है सिर्फ "पति" जिसमे कोई धर्म का सरोकार नहीं , लगे शिव जाप करनेWednesday, March 15, 2017
सोशल मिडिया काग्रेसी योद्धा सम्मेलन
आज फेस बुकिया मित्र भाई Manoj Kumar Sharma जी के मुख पोथी पर देखा की २६ अप्रैल १७ को एक काग्रेस स्वयं सेवको का गेट to गेदर कर रहे है..
कल भाई कपिल गर्ग की वाल पर देखा .. आज २ तिन मित्रो के वाल पर देखा जो मेरे मित्र नहीं है.. लेकिन कितने काग्रेसी है...३ दिन पहले मैंने भाई ओमकार सिंह ढिल्लन से बात की थी..चुकी मेरी फेसबुक वाल पर सिर्फ मोदी जी के जुमले चलते रहते है बस उतना ही, लेकिन मुझे फायदा यह है की लोगो के विचार / सोस समझने के लिए मिल जाते है... कुछ सिखने को ही मिलता है..मेरी मित्र सूचि में लगभग १००० ऐसे
Saturday, March 11, 2017
ट्रोल क्या है
जब से इन्टरनेट पर सामाजिक बहस छिड़ी है , लोग सोचने समझने लगे है बहस करते है, तर्क देते है, एक संवाद होता है , लेकिन अगर किसी की बात सुनना न चाहे तो फिर एक साधन है ट्रोल, ट्रोल का अर्थ होता
है पीछा करना या किसी के पीछे पड़ जाना , ट्रोलिंग का अर्थ होता है कि किसी की बात पसंद न आये तो उसके आईडी के पीछे पड़ना और उसे लेकर गाली-गलौज करना , जिसके लिए वह ट्रोल कर रहा है उसकी आलोचना देखते ही "साँड" हो जाना और आलोचना या कोई सवाल कर रहे व्यक्ति की "माँ बहन" कर देना , मेन्शन कर के उस पोस्ट पर और ढेर सारे ट्रोल को बुला लेना और एक एक करके गाली-गलौज करना , फोटोशाप से कट पेस्ट करके किसी की अश्लील चित्र बनाना और उसे वायरल कराना।
है पीछा करना या किसी के पीछे पड़ जाना , ट्रोलिंग का अर्थ होता है कि किसी की बात पसंद न आये तो उसके आईडी के पीछे पड़ना और उसे लेकर गाली-गलौज करना , जिसके लिए वह ट्रोल कर रहा है उसकी आलोचना देखते ही "साँड" हो जाना और आलोचना या कोई सवाल कर रहे व्यक्ति की "माँ बहन" कर देना , मेन्शन कर के उस पोस्ट पर और ढेर सारे ट्रोल को बुला लेना और एक एक करके गाली-गलौज करना , फोटोशाप से कट पेस्ट करके किसी की अश्लील चित्र बनाना और उसे वायरल कराना।Wednesday, February 15, 2017
Thursday, December 1, 2016
भारत में करंसी का इतिहास I History Of Indian Rupee In Hindi
आपको आनंद आएगा 👌
😊 गौर से पढिए :
भारतीय मुद्रा (रुपया ₹) से जुड़े 31 ग़ज़ब रोचक तथ्य :-
1. भारत में करंसी का इतिहास2500 साल पुराना हैं। इसकी शुरूआत एक राजा द्वारा की गई थी।
😊 गौर से पढिए :
भारतीय मुद्रा (रुपया ₹) से जुड़े 31 ग़ज़ब रोचक तथ्य :-
1. भारत में करंसी का इतिहास2500 साल पुराना हैं। इसकी शुरूआत एक राजा द्वारा की गई थी।
2. अगर आपके पास आधे से ज्यादा (51 फीसदी) फटा हुआ नोट है तो भी आप बैंक में जाकर उसे बदल सकते हैं।
3. बात सन् 1917 की हैं, जब 1₹ रुपया 13$ डाॅलर के बराबर हुआ करता था। फिर 1947 में भारत आजाद हुआ, 1₹ = 1$ कर दिया गया. फिर धीरे-धीरे भारत पर कर्ज बढ़ने लगा तो इंदिरा गांधी ने कर्ज चुकाने के लिए रूपये की कीमत कम करने का फैसला लिया उसके बाद आज तक रूपये की कीमत घटती आ रही हैं।
4. अगर अंग्रेजों का बस चलता तो आज भारत की करंसी पाउंड होती. लेकिन रुपए की मजबूती के कारण ऐसा संभव नही हुआ।
5. इस समय भारत में 400 करोड़ रूपए के नकली नोट हैं।
6. सुरक्षा कारणों की वजह से आपको नोट के सीरियल नंबर में I, J, O, X, Y, Z अक्षर नही मिलेंगे।
7. हर भारतीय नोट पर किसी न किसी चीज की फोटो छपी होती हैं जैसे- 20 रुपए के नोट पर अंडमान आइलैंड की तस्वीर है। वहीं, 10 रुपए के नोट पर हाथी, गैंडा और शेर छपा हुआ है, जबकि 100 रुपए के नोट पर पहाड़ और बादल की तस्वीर है। इसके अलावा 500 रुपए के नोट पर आजादी के आंदोलन से जुड़ी 11 मूर्ति की तस्वीर छपी हैं।
8. भारतीय नोट पर उसकी कीमत 15 भाषाओंमें लिखी जाती हैं।
9. 1₹ में 100 पैसे होगे, ये बात सन् 1957 में लागू की गई थी। पहले इसे 16 आने में बाँटा जाता था।
10. RBI, ने जनवरी 1938 में पहली बार 5₹ की पेपर करंसी छापी थी. जिस पर किंग जार्ज-6 का चित्र था। इसी साल 10,000₹ का नोट भी छापा गया था लेकिन 1978 में इसे पूरी तरह बंद कर दिया गया।
11. आजादी के बाद पाकिस्तानने तब तक भारतीय मुद्रा का प्रयोग किया जब तक उन्होनें काम चलाने लायक नोट न छाप लिए।
12. भारतीय नोट किसी आम कागज के नही, बल्कि काॅटन के बने होते हैं। ये इतने मजबूत होते हैं कि आप नए नोट के दोनो सिरों को पकड़कर उसे फाड़ नही सकते।
13. एक समय ऐसा था, जब बांग्लादेश ब्लेड बनाने के लिए भारत से 5 रूपए के सिक्के मंगाया करता था. 5 रूपए के एक सिक्के से 6 ब्लेड बनते थे. 1 ब्लेड की कीमत 2 रूपए होती थी तो ब्लेड बनाने वाले को अच्छा फायदा होता था. इसे देखते हुए भारत सरकार ने सिक्का बनाने वाला मेटल ही बदल दिया।
14. आजादी के बाद सिक्के तांबे के बनते थे। उसके बाद 1964 में एल्युमिनियम के और 1988 में स्टेनलेस स्टील के बनने शुरू हुए।
15. भारतीय नोट पर महात्मा गांधीकी जो फोटो छपती हैं वह तब खीँची गई थी जब गांधीजी, तत्कालीन बर्मा और भारत में ब्रिटिश सेक्रेटरी के रूप में कार्यरत फ्रेडरिक पेथिक लॉरेंस के साथ कोलकाता स्थित वायसराय हाउस में मुलाकात करने गए थे। यह फोटो 1996 में नोटों पर छपनी शुरू हुई थी। इससे पहले महात्मा गांधी की जगह अशोक स्तंभ छापा जाता था।
16. भारत के 500 और 1,000 रूपये के नोट नेपालमें नही चलते।
17. 500₹ का पहला नोट 1987 में और 1,000₹ पहला नोट सन् 2000 में बनाया गया था।
18. भारत में 75, 100 और 1,000₹ के भी सिक्के छप चुके हैं।
19. 1₹ का नोट भारत सरकार द्वारा और 2 से 1,000₹ तक के नोट RBI द्वारा जारी किये जाते हैं.
20. एक समय पर भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए 0₹ का नोट 5thpillar नाम की गैर सरकारी संस्था द्वारा जारी किए गए थे।
21. 10₹ के सिक्के को बनाने में 6.10₹ की लागत आती हैं.
22. नोटो पर सीरियल नंबर इसलिए डाला जाता हैं ताकि आरबीआई(RBI) को पता चलता रहे कि इस समय मार्केट में कितनी करंसी हैं।
23. रूपया भारत के अलावा इंडोनेशिया, मॉरीशस, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका की भी करंसी हैं।
24. According to RBI, भारत हर साल 2,000 करोड़ करंसी नोट छापता हैं।
25. कम्प्यूटर पर ₹ टाइप करने के लिए ‘Ctrl+Shift+$’ के बटन को एक साथ दबावें.
26. ₹ के इस चिन्ह को 2010 में उदय कुमार ने बनाया था। इसके लिए इनको 2.5 लाख रूपयें का इनाम भी मिला था।
27. क्या RBI जितना मर्जी चाहे उतनी कीमत के नोट छाप सकती हैं ?
ऐसा नही हैं, कि RBI जितनी मर्जी चाहे उतनी कीमत के नोट छाप सकती हैं, बल्कि वह सिर्फ 10,000₹ तक के नोट छाप सकती हैं। अगर इससे ज्यादा कीमत के नोट छापने हैं तो उसको रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 में बदलाव करना होगा।
28. जब हमारे पास मशीन हैं तो हम अनगणित नोट क्यों नही छाप सकते ?
हम कितने नोट छाप सकते हैं इसका निर्धारण मुद्रा स्फीति, जीडीपी ग्रोथ, बैंक नोट्स के रिप्लेसमेंट और रिजर्व बैंक के स्टॉक के आधार पर किया जाता है।
29. हर सिक्के पर सन् के नीचे एक खास निशान बना होता हैं आप उस निशान को देखकर पता लगा सकते हैं कि ये सिक्का कहाँ बना हैं.
*.मुंबई – हीरा [◆]
*.नोएडा – डाॅट [.]
*.हैदराबाद – सितारा [★]
*.कोलकाता – कोई निशान नहीं.
30. जानिए, एक नोट कितने रूपयें में छपता हैं।
*.1₹ = 1.14₹
*.10₹ = 0.66₹
*.20₹ = 0.94₹
*.50₹ = 1.63₹
*.100₹ = 1.20₹
*.500₹ = 2.45₹
*.1,000₹ = 2.67₹
31. रूपया, डाॅलर के मुकाबले बेशक कमजोर हैं लेकिन फिर भी कुछ देश ऐसे हैं, जिनकी करंसी के आगे रूपया काफी बड़ा हैं आप कम पैसों में इन देशों में घूमने का लुत्फ उठा सकते हैं.
*.नेपाल (1₹ = 1.60 नेपाली रुपया)
*.आइसलैंड (1₹ = 1.94 क्रोन)
*.श्रीलंका (1₹ = 2.10 श्रीलंकाई रुपया)
*.हंगरी (1₹ = 4.27 फोरिंट)
*.कंबोडिया (1₹ = 62.34 रियाल)
*.पराग्वे (1₹ = 84.73 गुआरनी)
*.इंडोनेशिया (1₹ = 222.58 इंडोनेशियन रूपैया)
*.बेलारूस (1₹ = 267.97 बेलारूसी रुबल)
*.वियतनाम (1₹ = 340.39 वियतनामी डॉन्ग).
भारतीय मुद्रा प्रणाली का संशिप्त विवरण
.
OLD INDIAN CURRENCY SYSTEM..
Phootie Cowrie to Cowrie
Cowrie to Damri
Damri to Dhela
Dhela to Pie
Pie to to Paisa
Paisa to Rupya
256 Damri = 192 Pie = 128 Dhela = 64 Paisa (old) = 16 Anna = 1 Rupya
Now u know how some of the indian sayings originated..
ek 'phooti cowrie' nahin doonga...
'dhele' ka kaam nahin karti hamari bahu...
chamdi jaye par 'damdi' na jaye...
'pie pie' ka hisaab rakhna...
.
कैसा लगा आपको ?
👌👌 ~ 👌👌
Friday, July 8, 2016
चेन्नई दर्शन
सुबह ६ बजे माता जी ने जगाया... देख चेन्नई आवत हव.. उठ... मै भी हडबडा के उठा... पूछ ताछ करने पर पता चला की 7 बजे तक पहुचे ही चेन्नई इग्मोर .
सामान ले बाहर निकले यात्रियों के पीछे ही.. मुख्य सड़क पर आते ही एक ऑटो वाले से पूछा.. आसपास
कोई अच्छा होटल.... ऑटो वाले ने पूछा बजट... मैंने १०००-१२०० रुपये बोला AC रूम के लिए... उसने सामान रख ऑटो में बैठा कर पास ही एक होटल में पंहुचा दिया... होटल कुछ पुराने ढंग का था लेकिन करना क्या था.... होटल में एंट्री कर पहुच गए रूम में... चाय मगा कर पिलाया माता श्री को... फिर निचे उतरे आस पास देखने... सुबह का समय था... तो सड़क भी एक दम खाली ही... लेकिन आस पास और भी होटल थे...आधे घंटे के चक्कर लगाने के बाद वापस पहुचे होटल... वहा काउंटर पर लोकल साइड सीन के बारे में पूछा तो पता चला की यहाँ मिनी बस से साइड सीन की
Monday, June 6, 2016
कन्याकुमारी और तिरुअनंतपुरम
(6 May 2016- Friday ) कश्मीर भारत माता का मस्तिष्क है तो कन्याकुमारी चरण। कन्याकुमारी, तमिलनाडु राज्य का एक प्राचीन शहर है। इस शहर का नाम कन्याकुमारी ही क्यों हैं? इस नाम के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है।
एक कहावत के अनुसार बहुत समय पहले बानासुरन नाम का दैत्या हुआ था। उसने भगवान शिव की
तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु कुंवारी कन्या के अलावा किसी से न हो। शिव जी ने उसे मन माँगा वरदान दे दिया। उसी कालक्रम में भारत में ही एक राजा हुए जिनका नाम था भरत। राजा भरत की आठ पुत्रियां और एक पुत्र था। राजा भरत ने अपना साम्राज्य 9 बराबर हिस्सों में बांट दिया। दक्षिण का हिस्सा जहां वर्तमान में कन्या कुमारी है राजा भरत की पुत्री कुमारी को मिला। मान्यता है कि कुमारी को शक्ति देवी का अवतार माना जाता है।
Sunday, June 5, 2016
रामेश्वरम साइड सीन
(5 May 2016- Thursday ) रामेश्वरम मंदिर की एक खास दर्शन है “मणि दर्शन” जो मंदिर में सुबह 4 बजे से 6 बजे के बीच मणि दर्शन कराया जाता है और मणि दर्शन में स्फटिक के शिवलिंग का दर्शन होता है सुबह सात बजे के बाद मणि दर्शन बन्द कर दिये जाते है उनके दर्शन करने के लिये नहा धोकर सुबह पांच बजे ही तैयार होना पडता है जब कहीं जाकर मंदिर में लाइन लगाकर दर्शन होते है, मणि
दर्शन का शुल्क ५०/- है जिसका टिकट मंदिर के अन्दर ही मिलता है तो माता जी ५ बजे जगा दी.. अपने नहा धो के तैयार... फटाफट मै भी सुबह ही नहा धोकर, माता जी ने दूसरा धोती कुर्ता निकाल के रखा था तो तैयार हो मणि दर्शन करने के लिये पहुच गए मंदिर के अन्दर ..मणि दर्शन के लिए भी ५० लोगो की भीड़ थी... लेकिन हमारा नंबर आया ... सफ़ेद स्फटिक के शिवलिंग.. उनके आगे एक ज्योति जल रही थी.... लगा की उस पल को देखने के लिए शायद यही सत्य है... वेद के अनुसार, इस "शेषनाग" के "मणि" है इस लिए इन्हें मणि दर्शन कहा जाता है फिर
Saturday, June 4, 2016
रामेश्वरम यात्रा
(4 May 2016 –Wednesday) सुबह उठकर रामेश्वरम के लिये निकलना था। इसलिये सुबह पाँच
बजे ही उठकर नहा धोकर तैयार भी हो गये। बस वाले ने सुबह 7 बजे का समय दिया था। लेकिन जब सवा 7 बजे तक भी हमें लेने कोई नहीं आया तो मन में खटका कि हमें यही छोड़कर तो नहीं भाग गये? लेकिन शुक्र रहा कि ठीक 7:30 पर हमें लेने के लिये एक आदमी आया हम उसके साथ बस तक चले गये। मदुरै से बिदा.. यहाँ से बस में बैठकर रामेश्वरम के लिये निकलने की तैयारी होने लगी। दूसरी बस कल वाली बस की तरह थी मिनी बस ..। सामान पीछे की डिक्की में डाल दिया और लैपटॉप का बैग हाथ में .. और होटलों से यात्रियों के लेते हुवे बस मदुरै रेलवे स्टेशन वाले मोड़ पर ठीक नौ
बजे ही उठकर नहा धोकर तैयार भी हो गये। बस वाले ने सुबह 7 बजे का समय दिया था। लेकिन जब सवा 7 बजे तक भी हमें लेने कोई नहीं आया तो मन में खटका कि हमें यही छोड़कर तो नहीं भाग गये? लेकिन शुक्र रहा कि ठीक 7:30 पर हमें लेने के लिये एक आदमी आया हम उसके साथ बस तक चले गये। मदुरै से बिदा.. यहाँ से बस में बैठकर रामेश्वरम के लिये निकलने की तैयारी होने लगी। दूसरी बस कल वाली बस की तरह थी मिनी बस ..। सामान पीछे की डिक्की में डाल दिया और लैपटॉप का बैग हाथ में .. और होटलों से यात्रियों के लेते हुवे बस मदुरै रेलवे स्टेशन वाले मोड़ पर ठीक नौ
Friday, June 3, 2016
कोडईकनाल
( 3 May 2016- Tuesday) आज की यात्रा थी तमिलनाडु का हिल स्टेसन “कोडईकनाल” भारत के
तमिल नाडु राज्य में बसा एक शहर है। समुद्र तल से २१३३ मीटर ऊंचा तमिलनाडु का कोडईकनाल हिल रिजॉर्ट अपनी सुन्दरता और शान्त वातावरण से सबको सम्मोहित कर देता है। पाली हिल के बीच बसा यह जगह दक्षिण भारत का बेहद ही सुकून देने वाली हिल स्टेशन है। यहाँ की झीलें, आकर्षण दृश्य और ठंडी वादियां सचमुच किसी स्वप्न से कम नहीं लगती। मदुरै से कोडैकनाल सिर्फ १२० किलोमीटर दूर है
तो माता जी ने कभी हिल स्टेशन नहीं देखा था... इस लिए सोचा की माँ को उधर भी घुमा ले.. सुबह ६ बजे माता जी चिल्लाई उठ... केतने बजे बस आई.. बस फटा फट.. उठा.. २ चाय मगाया... कमरे के
तमिल नाडु राज्य में बसा एक शहर है। समुद्र तल से २१३३ मीटर ऊंचा तमिलनाडु का कोडईकनाल हिल रिजॉर्ट अपनी सुन्दरता और शान्त वातावरण से सबको सम्मोहित कर देता है। पाली हिल के बीच बसा यह जगह दक्षिण भारत का बेहद ही सुकून देने वाली हिल स्टेशन है। यहाँ की झीलें, आकर्षण दृश्य और ठंडी वादियां सचमुच किसी स्वप्न से कम नहीं लगती। मदुरै से कोडैकनाल सिर्फ १२० किलोमीटर दूर हैतो माता जी ने कभी हिल स्टेशन नहीं देखा था... इस लिए सोचा की माँ को उधर भी घुमा ले.. सुबह ६ बजे माता जी चिल्लाई उठ... केतने बजे बस आई.. बस फटा फट.. उठा.. २ चाय मगाया... कमरे के
Wednesday, June 1, 2016
मदुरई साइड सीन
दिन के तीन बजे हम निकले एक मिनी बस से मदुरई के अन्य दर्शनीय जगहों के दर्शन के लिए उस मिनी बस में १२-१४ परिवार था जो सब हिंदी ही बोल रहे थे
मदुरै के टूर के लिए वहा छोटे छोटे ट्रेवल एजेंट है... जो आपके बजट के हिसाब से प्लान बना देते है... और सभी एजेंट अपने अपने यात्रियों को उस रूट के बस पर यात्रिओ को बैठा देते है... जिसमे बस और गाइड की ब्यवस्था होती है...और गाइड घुमाने के एवज में २०-२० रुपये लेता है.. तब हम भी सवार हो चले... साथ ही अन्य एजेंट के भी यात्री के साथ ...
मदुरै के टूर के लिए वहा छोटे छोटे ट्रेवल एजेंट है... जो आपके बजट के हिसाब से प्लान बना देते है... और सभी एजेंट अपने अपने यात्रियों को उस रूट के बस पर यात्रिओ को बैठा देते है... जिसमे बस और गाइड की ब्यवस्था होती है...और गाइड घुमाने के एवज में २०-२० रुपये लेता है.. तब हम भी सवार हो चले... साथ ही अन्य एजेंट के भी यात्री के साथ ...
मदुरई यात्रा
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राजीव शंकर मिश्रा , बनारस वाले
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12:55 PM
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ज्योतिर्लिंग,
धर्म,
माता जी की तीर्थ यात्रा
1
दिनांक : (1 May 2016-Sunday) अब तयारी थी श्री सैलम से मदुरई के लिए, हमारी बस (Andhra Pradesh State Road Transport Corporation ) की दिन के १२.३० पर खुली श्री सैलम बस स्टैंड
से कर्नूल के लिए, ड्राईवर ने बताया की शाम ४.३० तक बस पहुचेगी गर्मी भी ठीक ठाक ही थी, बस की रफ़्तार भी औसत ही थी, लेकिन वहा के सडको की हालत उत्तर भारत से बेहतर ही दिखा, निर्धारित समय पर बस ने कुर्नुल पंहुचा ही दिया हैदराबाद के लिए मदुरई की बस थी जो कर्नूल हो कर गुजरती है इस लिए हमारी बोर्डिंग थी कर्नूल से.. दक्षिण भारत में आराम दायक बस के लिए kpn ट्रेवल ठीक है उनकी Volvo A/C Multi Axle Semi Sleeper (2+2) सीटर बस की यात्रा आरामदायक है कर्नूल से मदुरई के लिए करीब 12:15 Hrs. लगते है.. कुर्नूल, आंध्रप्रदेश राज्य के बड़े शहरों मे एक है। यह तुंगभद्रा नदी के किनारे बसा है। आंध्र प्रदेश के अवरतण के पूर्व कर्नूल नवंबर १, १९५६ तक आंध्र राष्ट्र का राजधानी था।
से कर्नूल के लिए, ड्राईवर ने बताया की शाम ४.३० तक बस पहुचेगी गर्मी भी ठीक ठाक ही थी, बस की रफ़्तार भी औसत ही थी, लेकिन वहा के सडको की हालत उत्तर भारत से बेहतर ही दिखा, निर्धारित समय पर बस ने कुर्नुल पंहुचा ही दिया हैदराबाद के लिए मदुरई की बस थी जो कर्नूल हो कर गुजरती है इस लिए हमारी बोर्डिंग थी कर्नूल से.. दक्षिण भारत में आराम दायक बस के लिए kpn ट्रेवल ठीक है उनकी Volvo A/C Multi Axle Semi Sleeper (2+2) सीटर बस की यात्रा आरामदायक है कर्नूल से मदुरई के लिए करीब 12:15 Hrs. लगते है.. कुर्नूल, आंध्रप्रदेश राज्य के बड़े शहरों मे एक है। यह तुंगभद्रा नदी के किनारे बसा है। आंध्र प्रदेश के अवरतण के पूर्व कर्नूल नवंबर १, १९५६ तक आंध्र राष्ट्र का राजधानी था।Sunday, May 29, 2016
श्रीशैल, श्रीमल्लिकार्जुन, श्रीशैलम (श्री सैलम ) की यात्रा
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राजीव शंकर मिश्रा , बनारस वाले
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10:32 PM
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ज्योतिर्लिंग,
माता जी की तीर्थ यात्रा
6
(29 April 2016- Friday) भगवान तिरुपति के दर्शन से जीवन सफल हुवा.. माता जी भी प्रस्सन थी, तिरुपति की पहाडियों से उतर कर तिरुपति के श्री निवास बस स्टैंड से श्री सैलम के लिए बस पकडनी थी, लेकिन जानकारी तो कुछ थी
नहीं की वहां देखने के लिये क्या क्या है,रुकने की क्या व्यवस्था है, रास्ते में अगर देखने लायक कोई जगह है तो उसके लिये कहां उतरना है …बोले तो कोई जानकारी नही थी। हालांकि इस तरह कही जाने का अपना अलग मजा है। आप झोला उठाइये और जिधर मन आये चल दीजिये। यह सोंचकर, कि जो होगा वो देखा जायेगा। हमारी जिप तिरुपति शहर में पहुच चुकी थी, निवेदन किया की भाई बस स्टैंड तक छोड़ दो, जो पैसे हो ले लेना, तो जिप वाले ने बस स्टैंड के थोडा पहले उतर दिया, हमने भी २५०/- दो लोगो का भुगतान कर दिया, जिप से उतर, सामान लाद चल दिए बस स्टैंड की तरफ, तभी माता श्री को नारियल पानी पिने का मन किया, बस
नहीं की वहां देखने के लिये क्या क्या है,रुकने की क्या व्यवस्था है, रास्ते में अगर देखने लायक कोई जगह है तो उसके लिये कहां उतरना है …बोले तो कोई जानकारी नही थी। हालांकि इस तरह कही जाने का अपना अलग मजा है। आप झोला उठाइये और जिधर मन आये चल दीजिये। यह सोंचकर, कि जो होगा वो देखा जायेगा। हमारी जिप तिरुपति शहर में पहुच चुकी थी, निवेदन किया की भाई बस स्टैंड तक छोड़ दो, जो पैसे हो ले लेना, तो जिप वाले ने बस स्टैंड के थोडा पहले उतर दिया, हमने भी २५०/- दो लोगो का भुगतान कर दिया, जिप से उतर, सामान लाद चल दिए बस स्टैंड की तरफ, तभी माता श्री को नारियल पानी पिने का मन किया, बस तिरुपति बालाजी की कथा और आस पास
तिरुपति बालाजी की कथा :
वराह पुराण में वेंकटाचलम या तिरुमाला को आदि वराह क्षेत्र लिखा गया है। वायु पुराण में तिरुपति क्षेत्र को
भगवान विष्णु का वैकुंठ के बाद दूसरा सबसे प्रिय निवास स्थान लिखा गया है जबकि स्कंदपुराण में वर्णन है कि तिरुपति बालाजी का ध्यान मात्र करने से व्यक्ति स्वयं के साथ उसकी अनेक पीढ़ियों का कल्याण हो जाता है और वह विष्णुलोक को पाता है। पुराणों की मान्यता है कि वेंकटम पर्वत वाहन गरुड़ द्वारा भूलोक में लाया गया भगवान विष्णु का क्रीड़ास्थल है। वेंकटम पर्वत शेषाचलम के नाम से भी जाना जाता है। शेषाचलम को शेषनाग के अवतार के रूप में देखा जाता है। इसके सात पर्वत शेषनाग के फन माने जाते है। वराह पुराण के अनुसार तिरुमलाई में पवित्र पुष्करिणी नदी के तट पर भगवान विष्णु ने ही
भगवान विष्णु का वैकुंठ के बाद दूसरा सबसे प्रिय निवास स्थान लिखा गया है जबकि स्कंदपुराण में वर्णन है कि तिरुपति बालाजी का ध्यान मात्र करने से व्यक्ति स्वयं के साथ उसकी अनेक पीढ़ियों का कल्याण हो जाता है और वह विष्णुलोक को पाता है। पुराणों की मान्यता है कि वेंकटम पर्वत वाहन गरुड़ द्वारा भूलोक में लाया गया भगवान विष्णु का क्रीड़ास्थल है। वेंकटम पर्वत शेषाचलम के नाम से भी जाना जाता है। शेषाचलम को शेषनाग के अवतार के रूप में देखा जाता है। इसके सात पर्वत शेषनाग के फन माने जाते है। वराह पुराण के अनुसार तिरुमलाई में पवित्र पुष्करिणी नदी के तट पर भगवान विष्णु ने ही Saturday, May 28, 2016
भगवान तिरुपति के दर्शन
(28 April 2016 Thursday) भक्तों के ठहरने के लिए वहां धर्मशाला से लेकर कॉटेज तक की पूरी व्यवस्था है...और इनका किराया
महज ५० से १००० रुपए रोज पर आपको यहां धर्मशाला और कॉटेज मिल जाता है, लेकिन इसके लिए इंटरनेट से पहले ही बुकिंग लेनी पड़ती है। लेकिन हमने कोई बुकिंग नहीं की थी... तो drivar के साथ पहुचे कमरा लेने के लिए... उसको बोला एक AC रूम दिलवा दे भाई... बुकिंग आफिस में करीब १५० लोगो की लाइन... हम भी लगे लाइन में... वहा डिस्प्ले के माध्यम से खाली कमरों की सुचना दी जाती है जिसमे AC रूम सिर्फ २ ही थे जो खाली नहीं थे... सिर्फ ५० रुपये वाले ही कमरे.. तो क्या करते ले लिए ५० रुपये में काटेज जिसके लिए ५००/- रुपये कासन मनी जमा करनी पड़ती है जो
महज ५० से १००० रुपए रोज पर आपको यहां धर्मशाला और कॉटेज मिल जाता है, लेकिन इसके लिए इंटरनेट से पहले ही बुकिंग लेनी पड़ती है। लेकिन हमने कोई बुकिंग नहीं की थी... तो drivar के साथ पहुचे कमरा लेने के लिए... उसको बोला एक AC रूम दिलवा दे भाई... बुकिंग आफिस में करीब १५० लोगो की लाइन... हम भी लगे लाइन में... वहा डिस्प्ले के माध्यम से खाली कमरों की सुचना दी जाती है जिसमे AC रूम सिर्फ २ ही थे जो खाली नहीं थे... सिर्फ ५० रुपये वाले ही कमरे.. तो क्या करते ले लिए ५० रुपये में काटेज जिसके लिए ५००/- रुपये कासन मनी जमा करनी पड़ती है जो Thursday, May 26, 2016
माता जी की तीर्थ यात्रा “ भाग २
तो पिछले साल की तरह इस साल भी माता जी को ले निकल पड़े “माता जी की तीर्थ यात्रा “ भाग २ में.. इस बार का थीम था दक्षिण भारत, जहा २ ज्योतिर्लिंग है.... श्री सैलम और श्री रामेश्वरम...
तो इस बार के यात्रा का रूट कुछ ऐसा था.. वाराणसी से तिरुपति होते श्री सैलम से मदुरै के दर्शन के बाद रामेश्वरम से कन्या कुमारी के बाद चेन्नई होते हुवे वाराणसी.. करीब १५ दिन की यात्रा... तिरूपति बालाजी, श्री सैलम (मल्लिकाजरुन ज्योर्तिलिंग), मदुरै के मीनाक्षी मंदिर, पद्मनाभम मंदिर, रामेश्वरम,व कन्याकुमारी का भ्रमण :
Monday, May 23, 2016
Esteban Murillo (बारतोलोमिओ एस्तेबन मुरिलो की पेंटिंग )
अभी सोशल मीडिया पर इस कहानी और फोटो बहुत जोरो से वायरल हो रही है..शायद इस चित्र की आधी सच्चाई आपको बुरी लगे पर पूरी कहानी सुनकर आपका मन जरूर बदलेगा ! समझ नहीं आ रहा इस पर क्या लिखू..।
समाज अपने तरीके से कानून बनाता है। जब उससे हटकर कुछ अलग होता है तो लोगों को आश्चर्य होता है। एक अफ़्रीकी फ़िल्म देखा था एक कबीले के आक्रमण में दूसरा कबीला नष्ट हो जाता है केवल दो कुंवारी लड़कियां और चार बुजुर्ग जीवित बचते है। इन कुँवारी लडकियों से ही वो बुजुर्ग सन्तानोत्तपति करते हैं और अपना कबीला आगे बढ़ाते हैं।
Sunday, May 22, 2016
फ्री सेक्स का होता !!
गुरू !! ई फ्री सेक्स का होता है हमको नहीं पता न पता करने की इक्षा है, हा अभी सोशल मीडिया पर ये मुद्दा उठाया है ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमन एसोसिएशन की सेक्रेटरी और सीपीएम (एमएल) पोलित ब्यूरो
की सदस्य कविता कृष्णन और उनकी मां लक्ष्मी कृष्णन ने। इस पोस्ट में उन्होंने जेएनयू के शिक्षकों को भी निशाने पर लिया है। जेएनयू के शिक्षकों ने २०१५ में एक दस्तावेज तैयार किया था, जिसमें यूनिवर्सिटी के छात्रों को सेक्स और शराब से भरे जीवन के बारे में बताया गया था। पोस्ट में दावा किया गया है कि कविता ने एक टीवी चैनल की डिबेट में कहा कि यह अफसोस की बात है कि कुछ लोग ‘फ्री सेक्स’ (अपनी मर्जी से किसी भी व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाना) से डरते हैं। इए कुल तो बड़े लोगो की बड़ी बाते है मै तो बस इतना ही जानता हूँ कि कुछ लोग बहुत ही सदाचारी होते हैं जो शादी से पहले सेक्स
की सदस्य कविता कृष्णन और उनकी मां लक्ष्मी कृष्णन ने। इस पोस्ट में उन्होंने जेएनयू के शिक्षकों को भी निशाने पर लिया है। जेएनयू के शिक्षकों ने २०१५ में एक दस्तावेज तैयार किया था, जिसमें यूनिवर्सिटी के छात्रों को सेक्स और शराब से भरे जीवन के बारे में बताया गया था। पोस्ट में दावा किया गया है कि कविता ने एक टीवी चैनल की डिबेट में कहा कि यह अफसोस की बात है कि कुछ लोग ‘फ्री सेक्स’ (अपनी मर्जी से किसी भी व्यक्ति से शारीरिक संबंध बनाना) से डरते हैं। इए कुल तो बड़े लोगो की बड़ी बाते है मै तो बस इतना ही जानता हूँ कि कुछ लोग बहुत ही सदाचारी होते हैं जो शादी से पहले सेक्स Thursday, April 14, 2016
बनारस का खाना
बनारस के खान पान पर एक सीरीज़ लिखने की इच्छा बहुत दिनों से थी लेकिन
“जाए दा” के आलस्य के बनारसी
महामंत्र के कारण लिखना संभव नहीं हो पा रहा
था. फिलहाल अचानक आज बनारस बेतरह याद आया और थोड़ा जोड़ तोड़ कर बनारसी
कचौड़ी-जलेबी पर ये पहला आलेख तैयार हो गया. यहां की कचौड़ी, लौंगलता, जलेबा और भांग वाली ठंडई जैसी तमाम खाने-पीने वाली चीजें लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बनारस का पान. बनारस का नाम जुबां पर आते ही सबसे पहले ' बनारसी पान' की तस्वीर सामने आ जाती है।
बनारस का खाना
जिसने न जाना
रह गया बेगाना:
उड़द की दाल की पीसी हुई थोड़ी मसालेदार पीठी को आटे में भर कर बनाई देशी घी से भरे कड़ाहे में नाचती वो
लाल लाल कचौड़ी और थोड़ा हल्का सुगंध का फ्लेवर
लिए मोटा जलेबा. ये है बनारस का राजसी नाश्ता.
कचौरी शब्द बना है कच+पूरिका से। क्रम कुछ यूं रहा- कचपूरिका > कचपूरिआ > कचउरिआ > कचौरी जिसे कई लोग कचौड़ी भी कहते हैं। संस्कृत में कच का अर्थ होता है बंधन, या बांधना। दरअसल प्राचीनकाल में कचौरी पूरी की आकृति की न बन कर मोदक के आकार की बनती थी जिसमें खूब सारा मसाला भर कर उपर से लोई को उमेठ कर बांध दिया जाता था। इसीलिए इसे कचपूरिका कहा गया।
दूसरी और जलेबी मूल रूप से अरबी लफ्ज़ है और इस मिठाई का असली नाम है जलाबिया । यूं जलेबी को विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वाले भी हैं। शरदचंद्र पेंढारकर (बनजारे बहुरूपिये शब्द) में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं। वे रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं जिसमें इस व्यंजन के बनाने की विधि का उल्लेख है। भारतीय मूल पर जोर देने वाले इसे ‘जल-वल्लिका’ कहते हैं । रस से परिपूर्ण होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका रूप जलेबी हो गया। फारसी और अरबी में इसकी शक्ल बदल कर हो गई जलाबिया।
फिलहाल बात करते हैं बनारस की कचौड़ी और जलेबी की!
महामंत्र के कारण लिखना संभव नहीं हो पा रहा
था. फिलहाल अचानक आज बनारस बेतरह याद आया और थोड़ा जोड़ तोड़ कर बनारसी
कचौड़ी-जलेबी पर ये पहला आलेख तैयार हो गया. यहां की कचौड़ी, लौंगलता, जलेबा और भांग वाली ठंडई जैसी तमाम खाने-पीने वाली चीजें लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बनारस का पान. बनारस का नाम जुबां पर आते ही सबसे पहले 'बनारस का खाना
जिसने न जाना
रह गया बेगाना:
उड़द की दाल की पीसी हुई थोड़ी मसालेदार पीठी को आटे में भर कर बनाई देशी घी से भरे कड़ाहे में नाचती वो
लाल लाल कचौड़ी और थोड़ा हल्का सुगंध का फ्लेवर
लिए मोटा जलेबा. ये है बनारस का राजसी नाश्ता. कचौरी शब्द बना है कच+पूरिका से। क्रम कुछ यूं रहा- कचपूरिका > कचपूरिआ > कचउरिआ > कचौरी जिसे कई लोग कचौड़ी भी कहते हैं। संस्कृत में कच का अर्थ होता है बंधन, या बांधना। दरअसल प्राचीनकाल में कचौरी पूरी की आकृति की न बन कर मोदक के आकार की बनती थी जिसमें खूब सारा मसाला भर कर उपर से लोई को उमेठ कर बांध दिया जाता था। इसीलिए इसे कचपूरिका कहा गया।
दूसरी और जलेबी मूल रूप से अरबी लफ्ज़ है और इस मिठाई का असली नाम है जलाबिया । यूं जलेबी को विशुद्ध भारतीय मिठाई मानने वाले भी हैं। शरदचंद्र पेंढारकर (बनजारे बहुरूपिये शब्द) में जलेबी का प्राचीन भारतीय नाम कुंडलिका बताते हैं। वे रघुनाथकृत ‘भोज कुतूहल’ नामक ग्रंथ का हवाला भी देते हैं जिसमें इस व्यंजन के बनाने की विधि का उल्लेख है। भारतीय मूल पर जोर देने वाले इसे ‘जल-वल्लिका’ कहते हैं । रस से परिपूर्ण होने की वजह से इसे यह नाम मिला और फिर इसका रूप जलेबी हो गया। फारसी और अरबी में इसकी शक्ल बदल कर हो गई जलाबिया।
फिलहाल बात करते हैं बनारस की कचौड़ी और जलेबी की!
जब बाकी की दुनिया बेड-टी का इंतजार कर रही होती है, सयाने बनारसी सुबह छह बजे ही गरमा-गरम कचौड़ी
और रसीली जलेबी का कलेवा दाब कर टंच हो चुके होते
हैं। इस रसास्वादन अनुष्ठान के कर्मकांड रात के तीसरे पहर से ही शुरू हो
जाते हैं। भठठी दगाने और कड़ाहा चढ़ाने के बाद चार बजते-बजते शहर के टोले
मुहल्ले भुने जा रहे गरम मसालों की सोंधी खुशबू से मह-मह हो उठते हैं। एक
ऐसी नायाब खुशबू जो नासिका रंध्रों को उत्तेजित कर भूख को आक्रमक बना दे।
इस सुगंध से आप वंचित हैं तो समझिये आप स्वाद के एक भरे पुरे अहसास को मिस
कर रहे हैं। सुबह के पांच बजते न बजते तो खर कचौडि़यों की व्रत डिगा देने
वाली सोंधी गंध, सरसों तेल की बघार से नथुनों को फड़का देने वाली कोहड़े की
तरकारी की झाक और खमीर के खट्टेपन और गुलाबजल मिश्रित शीरे में तर करारी
जलेबियों की निराली गंध से सुवासित आबो हवा स्वाद का जादू जगा चुकी होती
हैं। एक ऐसा जादू जो सोये हुए को जगा दे। जागे हुओं को ब्रश करा कर सीधे
ठीयें तक पहुंचा दे। सात बजते-बजते तो विश्वेश्वरगंज के विश्वनाथ साव,
चेतगंज के शिवनाथ साव, हबीबपुरा के मम्मा,डेढ़सी पुल वाली दोनो दुकानों,
जंगमबाड़ी के बटुकसरदार, लोहटिया में लक्ष्मण भंडार, सोनारपुरा के वीरू और
लंका वाली मरहूम चचिया की दुकान पर नरम-गरम कचौडियों की आठ दस घानी उतर
चुकी होती है।ये कचौड़ी और जलेबी का combination है ....जैसे coke और चिप्स का है ........अब जलेबी तो दुनिया जहां में बिकती है ....पर बनारस की जलेबी की तो बात ही कुछ और है. 'बनारसी हलवाई जलेबी बनाने वाली मैदानी पर बेसन का हल्का-सा फेंट मारते हैं. जलेबियां कितनी स्वादिष्ट बनेंगी, यह फेंटा मारने की समझदारी पर निर्भर करता है. कितनी देर तक और कैसे फेंटा मारना है यह कला बनारसी हलवाई अच्छी तरह जानते हैं.
शहर बनारस का स्वादिष्ट कलेवा खर कचौड़ी और तर जलेबी, आपाधापी के इस दौर में भी मजबूती से अपनी जगह बनाए हुए है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले यह कलेवा झपोलियों में भरकर घर आया करता था। जल्दी भागो के इस दौर में यह नाश्ता भी अब फास्ट फूड से टक्कर लेने लगा है। चार कचौडिय़ों के साथ जलेबी फटाफट मुंह में डाली और चल पड़े अपने काम पर।
हालांकि स्पर्धा की होड़ में बनारस के इस पुराने व्यंजन के साथ अब इडली व डोसा भी टक्कर लेने लगे हैं। बावजूद इसके अपने अनूठे स्वाद के दम पर जलेबी-कचौड़ी की बादशाहत कायम है
यह बात अलग है कि स्वास्थ्य के प्रति सर्तकता बढ़ जाने के कारण कुछ लोग अब नाश्ते की फेहरिस्त में ओट्स और दलिया को प्रमुखता देने लगे हैं। टोस्ट और आमलेट भी जोर आजमाइश में है लेकिन बनारस की जीवन शैली में शामिल हो चुके जलेबी कचौड़ी को अब उसकी जगह से हटाना संभव नहीं है।
आज भी बनारस का आदमी बगल की दुकान पर अल सुबह भूने रहे मसाला की सुगंध से ही जागता है और नित्य काम से निबटने के बाद सीधे कचौड़ी.जलेबी की दुकान पर भागता है। जाड़ा, गर्मी या हो बरसात जतनवर के विश्वनाथ साव भोर में जब कचौड़ी के साथ चलने वाली सब्जी की बघार देते हैं तो पास.पड़ोस के बाशिंदों की नथुने फड़क उठते हैं। इसके बाद तो सारा आलस्य काफूर हो जाता है और लोग कचौड़ी.जलेबी के कतार में लग जाते हैं।
अंत में बनारसी कचौड़ी के बारे में बेढब बनारसी नें अपने हास्य उपन्यास लफ्टन पिगसन की डायरी में जो वर्णन किया है उसे पढ़ लेना भी बनारसी कचौड़ी जलेबी के स्वाद सा मनभावन है!
एक मिठाई की दुकान पर मैंने देखा कि एक आदमी बड़े-बड़े घुँघराले बाल रखे हुए बेलन से आटे की गोल-गोल गेंद बनाकर बेल रहा है और फिर एक कड़ाही में उसे डालता है। कड़ाही में घी खौल रहा था। वह झूम-झूमकर बेलना बेल रहा था। उसके श्यामल मुख पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं जैसे नीलाम्बर नक्षत्र में कभी-कभी तारे आकाश से टूटकर गिरते हैं वैसे ही पसीने की बूँदें नीचे गिरती थीं जो उसी आटे की गेंद में विलीन हो जाती थीं। पूछने पर पता चला कि यह दो प्रकार की होती हैं। एक का नाम पूरी है जिसका अर्थ है कि इसमें किसी प्रकार की कमी नहीं है। इसे खा लेने से फिर भूख में किसी प्रकार की कमी नहीं रह जाती। दूसरी को कचौरी कहते हैं। इसके भीतर एक तह आटे के अतिरिक्त पिसी हुई दाल की रहती है। पहले इसका नाम चकोरी था। शब्दशास्त्र के नियम के अनुसार वर्ण इधर से उधर हो जाते हैं। इसीसे चकोरी से कचोरी हो गया। चकोरी भारत में एक चिड़िया होती है जो अंगारों का भक्षण करती है। कचौरी खानेवाले भी अग्नि के समान गर्म रहते हैं, कभी ठण्डे नहीं होते। गर्मागर्म कचौरी खाने का भारत में वही आनन्द है जो यूरोप में नया उपनिवेश बनाने का
विश्व की प्राचीन नगरी काशी मंदिरों और घाटों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां का रहन-सहन, अक्खड़पन, खुशमिजाजी और सुकून लोगों को काफी पसंद है। बनारस की एक और चीज है, जो लोगों को इस शहर की तरफ खींच लाती है। वो है यहां का खान-पान। बनारसी पान हो या फिर टमाटर चाट, भांग वाली ठंडाई हो या फिर कचौड़ी, जो एक बार यहां के लजीज व्यंजनों का स्वाद चखता है, वो वाराणसी का और भी मुरीद हो जाता है।
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